पीचे देखो पीचे , पीचे तो देखो उधर भी आग लगी है और उसकी चिंगारी बी नुकसान पहुंचा सकती है।

एक महीने से अधिक हो चुका है जब काबुल से तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी देश से भाग गए थे और तालिबान ने काबुल फतेह कर लिया था।

उसके बाद से आजतक भारतीय मीडिया एवम् विचारक केवल अफगानिस्तान केंद्रित खबरे तथा विश्लेषण कर रहे है। बेशक सरकार द्वारा कोई भी निर्णायक कदम उठाने से परहेज़ किया जा रहा हो यहां तक कि कोई ठोस बयान भी जारी नहीं किया गया।

आज़ादी के बाद से ही समझा जाने लगा कि भारत का एकमात्र शत्रु पश्चिमी सीमा पर स्थित पाकिस्तान है और यदि भारत को कोई खतरा सम्भावित हो सकता है तो वो पाकिस्तान से ही हो सकता है इसीलिए तमाम नीतियां एवम् सेना का गठन भी उसी दृष्टिकोण से किया गया।

वैसे देखा जाए तो चीन से दुर्गम पहाड़ों के कारण प्राकृतिक सुरक्षा थी और पूर्वी पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बना दिया था जिससे अच्छे सम्बन्ध भी थे और तब वो आर्थिक रूप से भी बहुत पिछड़ा हुआ था। नेपाल, भूटान जैसे मित्र देश दुनियां की नजरों में भारत के उपनिवेश जैसे समझे जाते थे।

किन्तु जब चीन ने विकास और विस्तार की योजना बनाई तो भारत के नीति निर्धारकों ने इसे गम्भीरता से लिया एवम् लुक ईस्ट पॉलिसी पर विचार किया गया, जिसके अंतर्गत चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना के सामने भारत ने इंडोनेशिया, मयानमार्, बांग्लादेश होते हुए पुरानी जी टी रोड से जोड़कर पेशावर, कंधार, ईरान होते हुए एक सड़क की परिकल्पना पर काम शुरू किया जो अफगानिस्तान से अरब देशों और यूरेशिया तक को सड़क मार्ग से जोड़ सकती थी। डॉ मनमोहन सिंह जी के कार्यकाल तक इस योजना पर काफी काम होता रहा।।

इसमें दूसरा अहम हिस्सा जिस पड़ोसी देश का था उसे कभी बर्मा के नाम से जाना जाता था। बर्मा एक ऐसा देश जिसका सही इतिहास मार्कोपोलो के बाद से ही मिलता है क्योंकि उससे पहले यह जनजातियों द्वारा शासित लगभग 500 हिस्सो में बांटा हुआ क्षेत्र था ।

इरावती नदी के साथ बसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस क्षेत्र को 1754 में अलोंगपा ने एक देश बनाया और बरमी जनजाति का शासन स्थापित किया जो 19 वीं शताब्दी तक चला।

क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी को चीन में सुगमता से प्रवेश के लिए एक मार्ग चाहिए था तो 1826 में प्रथम एंग्लो बर्मा वार में ब्रिटिशर्स ने इसके दक्षिण भाग पर कब्ज़ा कर लिया जिसे 1886 में पूरा जीत कर ब्रिटिश इंडिया का स्वायत्त राज्य घोषित कर दिया लेकिन 1936 - 37 में इसे इंडिया से अलग करके ब्रिटेन का उपनिवेश बना लिया।।

1945 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की INA के सहयोग से जापान ने बर्मा पर कब्ज़ा कर लिया जो बाद में आन सांग के नेतृत्व में ब्रिटिश आर्मी के सहयोग से हटा दिया गया इसी कारण से आन सांग को बर्मा के राष्ट्रपिता के रूप में सम्मान दिया जाता है हालांकि उनके शासन से छह माह पहले ही उनकी हत्या कर दी गई थी, उन्हीं की बेटी आन सांग सू ची भारी बहुमत से निर्वाचित होने के बाद जेल से रिहा हुई थी।

एक बार फिर सेना द्वारा वहां की निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट कर सु ची को गिरफ्तार कर लिया गया और सेना ने सत्ता संभाल ली। वैसे तो यहां 1948 से आज़ादी के बाद से ही 50 वर्षो तक सेना का शासन रहा है लेकिन इस बार जनता द्वारा व्यापक विरोध किया गया जो फिलहाल कुछ शांत लगता है। हालांकि एक निर्वासित सरकार के गठन की घोषणा के साथ ही पुनः दंगे फसाद शुरू होने के समाचार मिल रहे हैं और यूएस द्वारा नए प्रतिबन्ध भी लगा दिए गए हैं।

इसी घटना क्रम में रोहिंग्या भी याद रखने चाहिए जो वहां के अराखान राज्य में रहते थे लेकिन उनकी नागरिकता समाप्त करके उन्हे स्टेट लेस बना दिया गया और अधिकांश बांग्लादेश के काक्स बाजार की ओर शरणार्थी बनकर रहने लगे।।

अब वर्तमान में आते है जो अधिक महत्वपूर्ण है-----*

क्योंकि भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों एवम् मयनमार की भूमि में बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन, थोरियम भण्डार तथा प्राकृतिक गैस होने की सम्भावना है तो चीन की वक्र दृष्टि पड़नी भी स्वाभाविक थी। और जब चीन का विस्तार होगा तो अमेरिका को कैसे स्वीकार हो सकता था इसीलिए सु ची के पक्ष मे जनमत तैयार किया गया, उन्हे नोबेल पुरस्कार मिला किन्तु फिर बाजी पलट गई।।

चीन क्योंकि निकटतम पड़ोसी है और उसका प्रभाव एवम् सम्बन्ध सभी पक्षों से है तो चीन द्वारा हथियारों से सभी गुटों की मदद की जाती हैं। मयनमार से जिन देशों की सीमाएं मिलती हैं उनमें चीन, भारत तथा बांग्लादेश मुख्य कहे जा सकते हैं और तीनों सीमाएं घने जंगलों के कारण उचित रूप से निर्धारित नहीं है।।

क्योंकि चीन यह समझता है कि अमेरिका चीन को भारत के माध्यम से ही रोकने की कोशिश करेगा और क्षेत्र में केवल भारत ही इतना बड़ा तथा सक्षम हैं कि चीन से टकरा सके तो भारत को घाव देने के लिए चीन द्वारा इन क्षेत्रों एवम् यहां के बागियों को दुरुपयोग किया जा सकता है।

मयन्मार में जितनी अराजकता बढ़ेगी इतने ही शरणार्थी भारत के मिजोरम आदि क्षेत्रों में आएंगे और निसंदेह चीन उन्हे आतंक फैलाने के लिए मदद करेगा।

क्योंकि वर्तमान सरकार द्वारा आरएसएस के राष्ट्रवाद का इतना शोर मचाया जा चुका है कि अब यही राष्ट्रवाद गले की हड्डी ना बन जाए यह डर लगने लगा है। 

इनके साथ ही रोहिंग्या शरणार्थियों के युवकों का विभिन्न आतंकी संगठनों जैसे अल कायदा या आइसिस का सदस्य बनने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

अभी हाल ही में असम और मिजोरम सीमा पर दो अलग देशों की तरह हुई फायरिंग तथा बंकर बनाने की घटनाओं को तो गम्भीरता से लेना ही चाहिए साथ ही त्रिपुरा में गृह युद्ध जैसे हालात भी चिंता का कारण होना चाहिए।

निसंदेह भारत सरकार भी इन सबसे अनजान नहीं होगी किन्तु कोई उचित एवम् निर्णायक कदम उठाए जाने का समाचार नहीं मिल रहा।।

तो क्या यह आशंका जताई जा सकती है कि भारत की अखंडता और संप्रभुता को इस बार नॉर्थ ईस्ट से ज्यादा खतरा है या भविष्य का बड़ा शत्रु अब पाकिस्तान के स्थान पर चीन, बांग्लादेश एवम् म्यांमार संयुक्त रूप से होंगे ?

वैसे भी चीन द्वारा ओल्ड सिल्क रूट को पुनर्जीवित करने का स्वप्न तभी साकार हो सकेगा जब भारत के उत्तर पूर्वी राज्य तथा सिक्किम की जमीन भी साथ हो।

क्योंकि यूएस द्वारा अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया से ध्यान हटा कर केवल इंडो पेसिफिक पर केंद्रित करने पर जोर दिया जा रहा है और वर्तमान भारत सरकार अमेरिका के प्रभाव में है तो किसी भी आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।।

वैसे भी सचेत रहना चाहिए क्योंकि "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी"

भारतीय उपमहाद्वीप में नफ़रत और साम्प्रदयिकता की विषबेल का जिम्मेदार कौन ?

1857 सल्तनत ए हिन्द और बादशाह सलामत बहादुर शाह ज़फ़र जिन्हे खैबर से लेकर बर्मा तक की रियासतों, राजो, राजवाड़ों ने सम्राट घोषित कर दिया था जिनमे बहुसंख्यक गैर मुस्लिम कथित महाराजा थे। ...