अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है।

यद्धपि सेंटकॉम और पेंटागन द्वारा बहुत पहले ही यह तय कर लिया गया था कि न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के साथ साथ दुनियां भर में चल रहे युद्धों से अमेरिका को बाहर निकलना चाहिए और इसके लिए ओबामा काल में नीति बनाई गई किन्तु निर्णय लेने का सम्मान डोनाल्ड ट्रंप को मिला।

जो बाइडेन ने उसी योजना को लागू किया बेशक अफगानिस्तान से एक्जिक्यूशन करने में कुछ गफलत हो गई और उससे अमेरिका की महाशक्ति वाली छवि को धक्का लगा दूसरा यूरोपियन देशों को भी भरोसे मे नहीं लिया गया जिसका दुष्प्रभाव अमेरिका पर पड़ना तय था।

ट्रंप ने सैनिकों की वापसी के लिए अफ़गान तालिबान से वार्ता की और दोहा में एक सहमति बनी लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि समझौता हुआ जबकि कोई लिखित समझौता नहीं हुआ क्योंकि औपचारिक हस्ताक्षर के लिए तुर्की में संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में होने वाली बैठक कभी हो ही नहीं पाई।

फिर भी अमेरिकी प्रतिनिधि जल्में खलीलजाद और तालिबान एक बिंदु पर राजी हो गए थे जिसे युद्ध विराम समझा जा सकता है बाकी वायदे यूएस ने पूरे करने थे।

अमेरिकी सैनिकों के निकलने के साथ साथ तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना प्रशासन शुरू कर दिया जिसे कह सकते हैं कि कब्ज़ा करना शुरू कर दिया और कथित अशरफ गनी सरकार तथा उसकी आधिकारिक फौज द्वारा उनका कोई विरोध नहीं किया गया अपितु खुद राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गए।

उपराष्ट्रपति सालेह ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया जिसे विश्व समुदाय ने कोई तरजीह नहीं दी सिवाय ताजिकिस्तान के क्योंकि अब्दुल सालेह भी ताजिक समुदाय से हैं। उसने पंचशीर में विरोध करने की कोशिश की किन्तु उसे भी अंततः ताजिकस्तान भाग कर छिपना पड़ा।

इसी बीच तालिबान पर दुनियां की निगाहें टिकी हुई थी कि ये कब्जे के बाद कैसी सरकार का गठन करते है और किन लोगो को शामिल करते है क्योंकि अधिकांश देशों ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि सभी समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया गया तभी तालिबान सरकार को मन्यता दी जाएगी।

आज तालिबान ने अस्थाई कार्यवाहक सरकार की घोषणा कर दी जिसमे 33 सदस्यों के नाम घोषित किए गए हैं। जैसा कि News Number पर पहले भी रिपोर्टिंग की गई थी और हुआ भी वैसा ही है तो इसमें सभी मुख्य स्थान तालिबान ने अपने समर्थको को दिए हैं एवम् पूर्व में 96 से 2001 तक की तालिबानी सरकार से जुड़े रहे या पिछले बीस साल से उनके सहयोगियों को तरजीह दी गई है।

जैसा कि प्रचार किया जाता हैं कि तालिबान के आने का अर्थ अमेरिका के शत्रुओं की सरकार का आना है वैसा असलियत में नहीं है क्योंकि कूटनीति में जो होता है वो दिखता नहीं और जो दिखता है वो होता नहीं।

सुप्रीम लीडर हिबतुल्लह अखूंजादा बहुत पढ़े लिखे व्यक्ति हैं और बीस साल तक अमेरिकी समर्थक सरकार एवम् पुलिस के बीच ही कंधार में अपनी लाइब्रेरी में रहकर तालिबान तथा अमेरिका के बीच कड़ी का काम करते रहे हैं हालांकि इसे कोई स्वीकार नहीं करेगा।

प्रधानमन्त्री मुल्ला उमर के सहयोगी रहे हैं तथा उपप्रधानमंत्री मुल्ला बिरादर भी मुल्ला उमर के सहयोगी रहे हैं।

बाकी भारत के दृष्टिकोण से जिन मंत्रियों का उल्लेख करना चाहिए उनमें गृहमंत्री हक्कानी, एवम् उप विदेशमंत्री स्तंजई हैं।

हक्कानी को गृहमंत्रालय मिलना एक प्रकार से पाकिस्तानी आईएस आई प्रमुख की काबुल यात्रा का परिणाम है जिसे भारत के हित में नहीं माना जा सकता, रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब मुल्ला उमर के बेटे है और इन्हे भी भारत के पक्ष मे नहीं समझा जा सकता।

भारतीय मीडिया द्वारा अनर्गल प्रचार का एक दुखद परिणाम यह रहा कि अब्दुल्ला स्तांजाई को अप विदेशमंत्री बनाया गया वैसे भी ये पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी तथा जाल्मे खालिलजाद के क्लासमेट रहे है और उनके साथ ही अमेरिका में शिक्षा प्राप्त की है साथ ही भारत की सैनिक एकेडमी से प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

कुल मिलाकर लगता कुछ ऐसा है जैसे अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए अमेरिका ने किसी गोपनीय समझौते के तहत अफगानिस्तान को चीन के हाथो बेच दिया है बेशक पहले डोर अशरफ गनी के हाथो पैरो मे बंधी थी और अब तालिबान के बंधी है।।

शायद सबसे बड़ा लूजर भारत ही कहलायेगा

अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

तालिबान अफगानिस्तान के बढ़ते कदम पाकिस्तान और ईरान के लिए एक बड़ा खतरा !

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अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

एक ओर तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर सभी पक्ष अपनी अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित है। ...

दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

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