फिल्मी दुनिया के seven wonders की बात की जाए तो उसमें एक नाम घूंघट की बीनाराय का जरूर आएगा।

वास्तु शिल्प से लेकर अलग अलग क्षेत्रो में कुछ ना भूलने लायक पहलू होते है जैसे भारत का ताजमहल जिसको शब्दो मे परिभाषित करना सम्भव ही नहीं है।

फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ ऐसे ही चेहरे हुए हैं जिन्हे कभी भुलाया नही जा सकता और यदि फिल्म जगत के seven wonders की बात होगी तो निश्चित रूप से उसमे बीनाराय का नाम जरूर आएगा।

अनारकली भी और मुमताज भी, बीनाराय 

हिंदी सिनेमा में ख़ूबसूरती को लेकर कई मत हैं. कोई मधुबाला को नंबर वन पर रखता है तो किसी की नज़र में श्यामा के चुलबुलेपन का जवाब नहीं था.

हेमा मालिनी को ड्रीम गर्ल मनवाने में जनता का नहीं मीडिया का बहुत बड़ा हाथ रहा. लेकिन आल टाइम खूबसूरती का जब ज़िक्र होता है तो बीनाराय को छोड़ दिया जाता है, जबकि पचास के सालों में उनकी खूबसूरती के चर्चे जन-जन की ज़ुबां पर थे. उन्हें रीयल ब्यूटी भी कहा जाता था. 

13 जुलाई 1932 को लाहोर में जन्मी कृष्णा सरीन उर्फ़ बीनाराय का शुरुआती जीवन कानपुर में गुज़रा. लेकिन पढ़ाई आईटी कॉलेज लखनऊ में हुई. यहीं उन्होंने एक विज्ञापन देखा जिसमें किशोर साहू को अपनी फ़िल्म 'काली घटा' के लिए एक खूबसूरत चेहरे की तलाश थी और साथ में पच्चीस हज़ार का ईनाम भी.

बीना ने अपनी तस्वीर भेज दी जिसे पसंद कर लिया गया. लेकिन परिवार ने मना कर दिया. बीना ने भूख हड़ताल कर दी. आख़िरकार परिवार को झुकना पड़ा. 

'काली घटा'(1951) में हीरो खुद किशोर साहू थे. फ़िल्म फ्लॉप हो गयी लेकिन फिल्मिस्तान के नंदलाल जसवंतलाल को बीना के रूप में 'अनारकली' (1953) मिल गयी, ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया...सुपर हिट हुई ये. लगा अनारकली होती तो बीना जैसी ही दिखती. हालांकि इस मिथक को बाद में मधुबाला ने मुगले आज़म में तोड़ा.

इसी दौर में उनकी ज़िंदगी में प्रेमनाथ मल्होत्रा आये, जो उस दौर में एक बड़ा नाम थे. उन्होंने बीना के साथ हॉलीवुड की सुपर हिट 'सेमसन एंड डिलेला' का हिंदी संस्करण बनाया

'औरत'(1953), जो चली भले नहीं, लेकिन उनका रोमांस ज़रूर परवान चढ़ा. झट-पट शादी भी हो गयी. प्रेमनाथ और बीना की जोड़ी ने शगूफा, प्रिज़नर ऑफ़ गोलकुंडा, समुंद्र और चंगेज़ खान में काम किया. लेकिन रीयल लाइफ रोमांस परदे पर फ्लॉप रहा. 

जैमिनी की 'इंसानियत'(1955) में वो दिलीप कुमार और देवानंद के साथ दिखीं. मगर आश्चर्य की बात है कि बीना के 'अनारकली' के हीरो प्रदीप कुमार के साथ उनकी सभी फ़िल्में हिट रहीं, दुर्गेश नंदनी, हिल स्टेशन, घूंघट और ताजमहल (1963) जिसमें वो मुमताज़ महल थीं, पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी...ज़ुल्मे उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं...सुपर हिट के बावज़ूद बीना इसके बाद गायब ही हो गयीं. सिर्फ़ तीन फ़िल्में आयीं, दादी मां(1966), रामराज्य (1967) और अपना घर अपनी कहानी (1968). लगभग सत्रह साल के कैरीयर में सिर्फ इक्कीस फ़िल्में. कुछ अन्य यादगार फ़िल्में हैं, मैरीन ड्राइव, वल्लाह क्या बात है, शोले, सरदार और मद भरे नैन. 

'घूंघट' (1960) में उन्हें शानदार एक्टिंग के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड मिला. लेकिन इस पर विवाद भी खूब उठा. दरअसल मुद्दा ये था कि 'मुगले आज़म' की मधुबाला पीछे कैसे छूट गयी? दो राय नहीं कि मधुबाला ने बहुत मेहनत की थी. लेकिन अवार्ड बांटने वाले पैनल के अपने कुछ पूर्वाग्रह होते हैं. लायक पीछे छूट जाता है. हर क्षेत्र में होता रहता है ऐसा. 

बताया जाता है कि बीना-प्रेमनाथ की निजी ज़िंदगी में हर वक़्त सब ठीक-ठाक कभी नहीं रहा. लेकिन अच्छी बात ये हुयी कि उन्होंने कभी घर नहीं टूटने दिया.

बीनाराय के बेटे प्रेमकिशन ने 'दुल्हन वही जो पिया मन भाये' में डेब्यू किया, जो सुपर हिट हुई लेकिन प्रेमकिशन नहीं चल पाया. पोती आकांक्षा को दूसरी बीनाराय बता कर लांच किया गया, लेकिन वो भी नहीं चली. पोता सिद्धार्थ मल्होत्रा टीवी की दुनिया में एक्टिव है. 2004 में उसने डॉक्टरों की ज़िंदगी पर सीरियल 'संजीवनी' बनाया था.

पति प्रेमनाथ की 1992 में मृत्यु के बाद बीना अधूरी रह गयीं थीं. 06 दिसंबर 2009 को 78 साल की आयु में खूबसूरती का पर्याय रही बीना बड़ी ख़ामोशी से इस फानी दुनिया से रुखसत हो गयीं. 

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