गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। बैल हमारा बाप है, इज्जत देना पाप है ! ।

भारत एक देश जिसकी प्रतिभाओं को नासा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर पूरी दुनिया में पहचाना जाता था और दुनियां कद्र करती थी कि भारतीय किसी भी पद पर कार्य करते हो या अपना कारोबार या सर्विस सेक्टर में हो अपना काम बुद्धिमानी और मेहनत से करते है।

फिर धीरे धीरे ब्रेन ड्रेन शुरू हुआ और सबसे पहले पंजाब फिर अन्य राज्यों से युवा विदेशो में जाने लगे, विदेशी सरकारें भी जानती थी कि विकास के लिए भारतीयों को बसाना घाटे का सौदा नहीं है लेकिन खुद भारत वासी भूल गए कि जब सभी चले जाएंगे तो यहां बाकी क्या रहेगा ?

पंजाबी में कहावत है कि लस्सी के उपर से मक्खन निथार लो तो छाछ ही बचती हैं जिसका एकमात्र उपयोग पहले कढ़ी पकाने में होता था और उसका कोई मूल्य लेना बहुत निकृष्ट समझा जाता था क्योंकि थोथ दा की मूल पैना ? 

समय बदल गया और इसी के साथ भारत में पढ़ाई का स्तर तो नहीं बदला लेकिन परीक्षाएं पास करने के तरीके बदल गए तभी करनाल के एसडीएम आयुष सिन्हा जैसे आईएएस अफसर आने लगे जिन्हे अपने अधिकार की मर्यादा और सीमाएं ही मालूम नहीं होती इंसानियत तो बहुत दूर की चीज है।

पिछले दिनों राजस्थान हाईकोर्ट के एक जस्टिस साहब ने कहा था कि मोरनी मोर के आंसुओ से प्रजनन क्षमता प्राप्त करती हैं कुछ ऐसा ही कल उत्तर प्रदेश राज्य के इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यादव ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव देकर खुद को चर्चा का विषय बना दिया।

इस सम्बन्ध मे द हिन्दू अखबार ने भी लिखा है।

सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करें : इलाहाबाद हाईकोर्ट

कोर्ट चाहती है कि गोरक्षा मौलिक अधिकार हो।

गाय को भारतीय संस्कृति का प्रतीक मानते हुए और इस संस्कृति के लिए खतरों की बात करते हुए, न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की एक खंडपीठ ने लोगों को चेतावनी भी दी कि उन्हें तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के अधिग्रहण को नहीं भूलना चाहिए।

अदालत ने कहा कि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि "जब भी हम अपनी संस्कृति को भूल गए, विदेशियों ने हम पर हमला किया और हमें गुलाम बना लिया और अगर हमें चेतावनी नहीं दी गई, तो हमें तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर बेलगाम हमले और कब्जे को नहीं भूलना चाहिए"।

जस्टिस यादव ने कहा कि वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि गाय ही एकमात्र ऐसा जानवर है जो ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है। उन्होंने हिंदी में 12 पन्नों के आदेश में कई बिंदुओं पर पौराणिक कथाओं का जिक्र किया।

अदालत ने जोर देकर कहा कि गाय "हमारी संस्कृति का आधार" थी और पुराणों, शास्त्रों, रामायण और महाभारत में एक महत्वपूर्ण स्थान पर कब्जा कर लिया था, यहां तक ​​​​कि यह गायों के आर्थिक मूल्य को खेती की "रीढ़" के रूप में इंगित करता था। और दैनिक जीवन में अन्य उपयोग।

न्यायमूर्ति यादव ने यह भी कहा कि गोहत्या के आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए संसद को एक कानून बनाना चाहिए। उन्होंने गायों को हिंदू आस्था और संस्कृति का प्रतीक बताया और दावा किया कि देश के अधिकांश मुसलमान भी गौहत्या पर देशव्यापी प्रतिबंध के पक्ष में हैं।

उन्होंने कहा, "जब देश की आस्था और संस्कृति को चोट लगती है, तो देश कमजोर हो जाता है।

इस आदेश मे भी मोर के असुओं की तरह बताया गया है कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती हैं वैसे तो यह वैज्ञानिक तथ्य नहीं है और किसी पढ़े लिखे व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का उदाहरण देना भारतीयों की बौद्धिक क्षमता पर सवाल जरूर खड़े कर देता है।

वैसे यदि सभी वैज्ञानिक आधार छोड़कर आस्था या सनक के चलते गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित भी कर दिया जाए तो क्या गाय को माता मानने वाला समूह उसे पशु कहना स्वीकार करेगा ?

उत्तर प्रदेश सहित कार्यरत स्लॉटर हाउस बंद करने पड़ेंगे जिनमे नेताओ की हिस्सेदारी की भी चर्चा होती हैं और उनकी ओर से राजनीतिक दलों को मोटा चंदा भी दिया जाता हैं।

क्योंकि राष्ट्रीय पशु घोषित होने के बाद उस पर किसी प्रकार की चोट पहुंचाना या बांध कर रखना दंडनीय अपराध होगा तो किसान या दूध उत्पादक कैसे डेयरी फार्म बना सकेंगे ?

सड़क पर आवारा घूमती और कूड़े में अपना खाना तलाश करती गाय यदि ट्रेफिक हवलदार द्वारा हटाई जाती हैं तो उसकी तो नौकरी गई और यदि नहीं हटाता तो ट्रेफिक व्यवस्था गई !

सबसे बड़ी दिक्कत उत्तर पूर्व के राज्यों तथा गोवा से आ सकती है क्योंकि वहां बीफ भोजन का अहम हिस्सा है, गोबर का उपयोग केरल, गोवा अथवा उत्तर पूर्व में नहीं होता।

बहरहाल जब जस्टिस यादव ने कहा है तो कुछ सोच कर ही कहा होगा और क्योंकि वो वैसे भी उत्तर प्रदेश राज्य से है तो किसी प्रकार का संशय बाकी भी नहीं रहना चाहिए।

जय श्री गौ माता "जी" की .......! 

 

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एक खामोशी में बहुत से सवालों के जवाब होते है और उन्ही जवाबो में इतिहास की क्रूर कलम होती हैं जो सम्मानित या कलंकित करते समय केवल शुभ कर्मन के तराजू पर तोलती है कि किसको गांधी लिखना है और किसको गोडसे। ...

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एक ओर संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली का अधिवेशन चल रहा है और दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के क्वाड गुट के सदस्य देशों के प्रमुखों को विशेष आमंत्रण पर भारतीय प्रधानमंत्री ने वाशिंगटन डी सी में अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात की। ...

नारायण ! नारायण ! यदि नई पीढ़ी को नारद मुनि नाम लिया जाए तो अचानक जो चेहरा सामने आता है उसको "जीवन" के नाम से पहचान मिली।

दक्षिण एशिया की नस्लों में एक सांस्कृतिक समानता या मानवीय विशेषता है कि यहां प्रतीकों को महत्व दिया जाता है जैसे एक पूरी पीढ़ी को रामायण सीरियल वाले अरुण गोविल में राम नजर आते थे। ...

कनाडा चुनावों में जस्टिन ट्रुडो की जीत में भारतीय मूल के नागरिकों का सहयोग और विश्व में फैले भारतवंशी।

शावा चरखा चनन दा से लेकर चिट्टा कुकड़ बनेरे ते जैसे पंजाबी लोकगीत बेशक भारतीय और पाकिस्तानी पंजाब की संगीत महफिलों से गायब हो रहे हो लेकिन सात समुंदर पार कनाडा, यूके से लेकर दुनियां भर में फैले हिन्दुस्तानियों ने अभी भी जीवित रखे हुए है। ...