भारत पाक विभाजन कुछ अनकही कहानी ! विश्व की सबसे बड़ी त्रासदी जिसे दोनों देशों के राजनेताओं ने अपने अंदाज में बयान किया।

1947 एक लंबे संघर्ष और कुर्बानियों के बाद हिंदुस्तान ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से आजाद हुआ लेकिन इस आज़ादी के साथ ही बटवारा भी परोस दिया गया और उसका सबसे दुखद पहलू आबादी की अदला बदली था।

यद्धपि साक्ष्य तो यही कहते हैं कि महात्मा गांधी न केवल इस बटवारें के विरोधी थे अपितु किसी भी कीमत पर आबादी की अदला बदली के पक्ष में नहीं थे हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना के बयान भी आबादी बदलने के पक्ष में नहीं थे।

लेकिन जब वक्त खराब होता है तो इंसान बेबस हो जाता है और शायद उस समय बड़े बड़े नेताओं के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। फिर इन घावों को भूलने की कोशिश शुरू हुई जिसके कारण दोनों ओर की सरकारों ने बहुत से तथ्य जनता के सामने उजागर नहीं होने दिए। फिल्में भी अपने अपने हिसाब से बनाई जैसे भारत में जुल्म का शिकार वहां से पंजाबी दिखाए जाते है तो पाकिस्तान में मुहाजिरों को विक्टिम बताया जाता हैं।

यद्धपि इस विषय पर कई शोध भी हुए किन्तु अभी भी बहुत से सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब मिलना बाकी हैं। भारत पाक बटवारा और इसके जख्मों को हरा करने के प्रयास में भारत सरकार ने 14 अगस्त को विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की घोषणा की तो उसी संदर्भ में कुछ शोध पत्रो पर आधारित विवरण पंकज चतुर्वेदी ने साझा किया।

विभाजन दिवस के लिए सामग्री

1937 में अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के सम्मेलन में द्विराष्ट्र का सिद्धांत पहली बार पेश किया गया था जिसकी अध्यक्षता वीर सावरकर ने की थी। इसके बाद 1938 में मुस्लिम लीग की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव पारित किया गया था। 

1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गए और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए. पंजाब और लाहौर ने सबसे ज़्यादा दर्द सहा.आंकड़ों की मानें तो इस बंटवारे में 20 लाख लोगों की जान गई. 

मुखर्जी ने चलाया था विभाजन के पक्ष में एक आंदोलन, संघ की पत्रिका में छपा लेख।

5 वर्ष के एक अनुसंधान में यह चाैंकाने वाली जानकारी सामने आई थी कि भारतीय जन संघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी खुद उस बंगाल विभाजन के पक्ष में थे, जिसे इतिहास में भारत-पाकिस्तान विभाग की बुनियाद माना जाता है।

यह अनुसंधान किसी वामपंथी या जेएनयू ने नहीं, बल्कि स्वयं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दिल्ली में झंडेवालान स्थित बाबा साहब आपटे स्मृति भवन केशव कुंज ने अपनी इतिहास संकलन योजना के इतिहास दर्पण के में प्रकाशित किया था। 

यह अनुसंधान उदयपुर के एफके कपिल और भानु कपिल का है। कपिल यहां बीएन कॉलेज में इतिहास विभागाध्यक्ष हैं। बंगाल का द्वितीय विभाजन शीर्षक वाले इस अनुसंधान लेख में कहा गया है : मुखर्जी ने 1947 में बंगाल के कांग्रेसजनों से अपील की कि वे राष्ट्रीय हितों में बंगाल विभाजन का समर्थन करें।

विभाजन के लिए मुखर्जी ने उन दिनों कई दौरे किए। मुखर्जी ने बंगाल के सभी क्षेत्रों में एक हिन्दू सम्मेलन किए। मुखर्जी का विचार था कि बंगाल पाकिस्तान में चला गया तो मुस्लिम प्रभुत्व वाले प्रांत में हिंदुओं पर आघात बढ़ जाएंगे। डॉ. मुखर्जी ने विभाजन का निश्चय किया तो वे पूरी शक्ति से जनमत को जागृत करने में जुटे। मुखर्जी की विभाजन में समर्थन के बाद हिंदुओं ने आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

अनुसंधानमें सामने आए ये तथ्य : मुखर्जीके आग्रह पर अप्रैल 47 में अमृत बाजार पत्रिका ने एक जनमत संग्रह करवाया, जिसमें 98% हिंदू विभाजन के पक्ष में थे।

बंगाल कांग्रेस का बहुमत भी विभाजन के पक्ष में था। 3 जून 47 को ब्रिटिश सरकार ने विभाजन की घोषणा की। पंजाब के टुकड़े हुए और इसी तरह पूर्वी बंगाल पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल भारत में रहा। शेष| पेज 11

विभाजनके पक्ष में मुखर्जी के तर्क आैर और नेहरू से उनका आमना-सामना : विभाजनके बाद नेहरू ने डॉ. मुखर्जी पर विभाजन में भागीदारी का आरोप लगाया। इसपर डॉ. मुखर्जी ने स्पष्ट किया कि जब कांग्रेस, लीग और ब्रिटिश सरकार के विभाजन के पक्ष में हो गए और हम इसे रोकने में असमर्थ थे तब मैंने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग की।

मुखर्जी ने सफाई दी कि उन्होंने पाकिस्तान में संपूर्ण बंगाल और पंजाब के विलय के विरुद्ध और उनके विभाजन के लिए कार्य किया है ना कि देश के विभाजन के लिए।

एक बार फिर भारत में बढ़ती अलगाव वाद और नफरत की आग के बीच जरूरत है कि उचित समय पर ही आवाज़ बुलंद की जाए जिससे ऐसा माहौल बने जिससे  कभी कल्पनाओं में भी किसी इंसान को शरणार्थी ना होना पड़े।

भारत तो क्या हिंदुस्तान ( अविभाजित हिंदुस्तान ) की जनता के बारे में ऐसा सोचना भी कल्पना से उपर की बात है लेकिन तर्को के आधार पर झुठलाया भी नहीं जा सकता।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला हिन्दुस्तानी समाज बुद्ध, महावीर, नानक, गांधी और अपने पीर पैगम्बर की शिक्षाएं भुलाकर रवांडा की तरह अपने ही बहन भाइयों और बच्चो के खून से रंगे हाथ लेकर उत्सव मनाने की मानसिकता रख सकता है ? ...

शहीदों की चिताओं पर भी खड़े होंगे झमेले, ये तो कभी सोचा भी ना था !

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यहीं आखिर निशान होगा ! बहुत सुनते थे हाल ए दिल मगर काटा तो कतरा ए खू ना निकला। कुछ ऐसे ही शब्दो के साथ अपनी आबरू के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक शहीदों की आत्मा चीत्कार रही होगी जब मालूम पड़ेगा कि 1972 से उनके बलिदान के सम्मान में निरन्तर जल रही अमर जवान ज्योति को भारत सरकार ने बुझाने का निर्णय लिया है। ...

नेजेबंदी अर्थात टेंट पेगिंग ! घोड़े की पीठ पर बैठकर खेला जाने वाला प्राचीन खेल जो पंजाब में आज भी लोकप्रिय है।

यद्धपि विश्व में घोड़े की पीठ पर बैठकर खेले जाने वाले खेलों में पोलो अधिक प्रसिद्ध हैं लेकिन आज भी पंजाब विशेषकर पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) में नेजेबंदी अपनी लोकप्रियता कायम रखे हुए है। ...