कुर्बानियों के कुछ निशान जिन्हे न सरहदों में बांटा जा सकता है ना ही छुपाने की कोशिश कामयाब हो सकती हैं।

धन गुरु नानक देव, बाबा बुल्लेशाह, शेख फरीद, महाराजा रणजीत सिंह, भगत सिंह, सर गंगाराम सहित कभी खत्म न होने वाली लिस्ट बन सकती है जिन्हे भारत पाकिस्तान की सरहदों में नहीं बांटा जा सकता।

इसी प्रकार ननकाना साहिब, करतारपुर, हसन अब्दाल, लायलपुर, लाहौर, अमृतसर, दिल्ली, अजमेर जैसे बहुत से शहर है जो इस पार से उस पार दिलों में परवाज़ करते रहते है क्योंकि आंखो का वीज़ा नहीं लगता।

अंग्रेजी साम्राज्य के विरूद्ध आज़ादी की लड़ाई वैसे तो 1857 में ही शुरू हो गई थी लेकिन बीसवीं शताब्दी में इसने जोर पकड़ लिया और बेशक इसमें सबसे ज्यादा कुर्बानियां देने वाली कोई कौम थी तो वो पंजाबी थे बेशक उनकी आस्थाएं या धर्म कुछ भी हो।

मानव इतिहास और सभ्य समाज में जब भी सत्ता के ज़ुल्म और निरीह निहत्थे नागरिकों पर ज़ुल्म की दास्तान लिखी जाएगी तो उसने अमृतसर का जलियांवाला बाग़ कांड बेशक सर्वोपरि होगा।

जनरल डायर का अपनी गारद को हुक्म देना कि गोलियां नीचे नहीं उपर निशाना लगाकर चलाओ तथा मौत से दो चार होते निरीह निहत्थे नागरिकों की चींख पुकार अभी तक सुनाई देती थी जब जलियांवाला बाग़ के छोटे से गलियारे से गुजरते हुए दर्शको को बताया जाता था कि चारो और से बंद इस स्थान पर जाने आने के लिए यही एकमात्र रास्ता होता था।

उस रास्ते को अभी तक पुरानी अवस्था में ही संजो कर रखा गया था वैसे भी पुरातत्व विभाग के संरक्षण में आने वाले इस स्थान में कानूनन कोई भी बदलाव नहीं किया जा सकता।

लेकिन जिस दिन भारत के हरियाणा राज्य के करनाल शहर में सरकारी आदेशों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे किसानों के सिर फोड़े जा रहे है ( करनाल भी संयुक्त पंजाब की रियासत थी ) जिसकी वीडियो भी वायरल हुई हैं जिसमे आयुष सिन्हा आईएएस साफ सुनाई दे रहा है और पुलिस कर्मियों को आदेश दे रहा है कि किसानों के सीधे सिर पर लाठी मारनी है।

उसी दिन लगभग वैसी ही घटना के बाद भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जलियांवाला बाग़ के नए स्वरूप का उद्घाटन किया गया जिसकी तैयारी पर्दे के पीछे काफी समय से चल रही थी।

संकरे रास्ते के पुराने माहौल को बदल कर पत्थर की दीवारों पर मूर्तियां बनवा दी गई है जिससे दुखद शहादत का गवाह रहा गलियारा किसी प्रदर्शन स्थल या आर्ट गैलरी जैसा लगने लगा है।

इसकी भारत में तो सोशल मीडिया पर भृत्सना हो ही रही है, यहां तक की कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी न केवल निंदा की है अपितु इसे अंग्रेज़ो के ज़ुल्मो को छिपाने की घृणित सोच का नाम दिया है वहीं पाकिस्तानी मीडिया में भी इसकी आलोचना हो रही है।

सम्भावना है कि पाकिस्तान सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर इसका विरोध दर्ज कराया जा सकता है क्योंकि उनके अनुसार उस समय लाहौर तथा अमृतसर जुड़वां शहर थे एवम् शहीद होने वालों में बड़ी संख्या में लाहौर के निवासी भी थे।

वैसे तो चर्चा में यह भी है कि जिस कुवें में कूद कर लोगो ने अपनी जान बचाने की कोशिश की थी उसे या तो पाट दिया गया है या यह योजना में शामिल हैं जिससे दीवारों पर अंकित गोलियों के निशान भी खत्म हो सकते है।

इसके अतिरिक्त वहां शुरू किया गया लाइट एंड साउंड का कार्यक्रम भी आलोचना का विषय बन गया है क्योंकि मरते हुए इंसानों की चीख पुकार कोई मानसिक विक्षिप्त ही सुन सकता है या पसंद कर सकता है किसी सामान्य इंसान से यह उम्मीद नहीं रखी जा सकती ( दूसरे के दर्द से आंनद प्राप्त करने का एक मानसिक रोग भी होता है )

बहरहाल वर्तमान मोड़ी सरकार द्वारा खुद ऐसे निर्णय लिए गए हैं जिनकी आलोचना होना स्वाभाविक है किन्तु आशा नहीं है कि माननीय प्रधान मंत्री जी को ऐसी उल्टी सलाह देने वाले सलाहकारों तथा अधिकारियों के विरूद्ध कोई कार्यवाही होगी।