काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए।

उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ।

30 अगस्त 2021 की अर्द्ध रात्रि या 31 अगस्त का आगाज़ होते ही अंतिम अमेरिकी सैनिक को काबुल स्थित यूएस राजदूत ने विदाई दी तथा इसे राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा अपने वायदे पर पूरा उतरना बताया।

अफ़गान तालिबान ने असंख्य गोलियां चलाकर इस घटना का स्वागत किया एवम् एयरपोर्ट पर अपने कब्जे की सूचना अपनी जनता को दे दी।

यद्धपि इसके अतिरिक्त हज़ारों की संख्या में बिना वर्दी वाले अमेरिकी सैनिक तथा उनके सहयोगी पाकिस्तान के इस्लामाबाद, क्वेटा, पेशावर आदि शहरों में भी अस्थाई रूप से रुकने के लिए आए हैं।

क्योंकि पाकिस्तान सरकार द्वारा 5 सितारा होटलों से लेकर सरकारी स्कूलों तक में इन्हे रोकने का प्रबन्ध किया गया है तो समझा जा सकता है कि रुकने वालो का स्तर उच्च अधिकारियों से लेकर पैदल सैनिक तक का होगा और अंतिम क्ष्ण तक उन्हे ना निकाला जाना यूएस का प्रयास रहा होगा कि शायद फिर से रुकना पड़ सकता है।

अन्तिम विदाई से पहले तक दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को घुड़कियों का दौर जारी रहा दुर्भाग्य से अमेरिकी ड्रोन द्वारा अंतिम हस्ताक्षर के रूप में सिविलियन की हत्या प्राप्त हुई जिसमे 6 छोटे छोटे मासूम बच्चे थे।

बेशक बाद में अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर इसके लिए खेद प्रकट किया लेकिन जाने वाले तो लौट कर नहीं आ सकते चाहे कोई जान से गया हो या जहान से।

पुनः मुख्य प्रश्न की ओर आते है कि क्या इसी के साथ अफ़गान समस्या की समाप्ति और शांति स्थापित होने की आशा की जा सकती हैं तो इसका उत्तर नकारात्मक होगा क्योंकि जिस प्रकार दो साल की लंबी अवधि और अत्यधिक प्रयासों के बावजूद भारत में कश्मीर समस्या समाप्त न होकर और बड़ी हुई हैं वैसे भी अफगानिस्तान के सम्बन्ध मे आशंका जताई जा सकती हैं।

क्योंकि अफगानिस्तान के अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों पर सबकी गिद्ध दृष्टि लगी हुई हैं और कोई माने या ना माने किन्तु तालिबान की हमदर्दी भी अमेरिका से रही है साथ ही तालिब नेता सदैव पेंटागन के सम्पर्क में रहे हैं तो वो अमेरिकी हितों की अनदेखी भी नहीं करेंगे।

इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि कल ही तालिबान प्रमुख मुल्ला हैबतुल्लह की उपस्थिति का खुलासा करते हुए पिछले दस सालों से उसके कंधार में ही छिपे होने की जानकारी दी गई है। बताया गया है कि वो अपनी लाइब्रेरी में ही रहता था।

( इसी के साथ डोनाल्ड ट्रंप का मज़ाक याद करे जो उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी को लेकर बनाया था जिसने बार बार "लाइब्रेरी" शब्द बोला गया था )

आशंका यह है कि क्या अमेरिका ने अफ़गान युद्ध प्राइवेट डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर को सौंप दिया है ? क्या इसका भारत पर भी कोई असर होना निश्चित है ? क्या अमेरिका द्वारा साउथ ईस्ट एशिया पर ध्यान केंद्रित करने की घोषणा के साथ ही भारत को सचेत हो जाना चाहिए कि भविष्य के खतरे पश्चिमी सीमाओं के साथ साथ पूर्वी और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों से भी सम्भव है ?

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