दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है।

मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ?

अफगानिस्तान के नामालूम तथ्य

कल से सोशल मीडिया पर बहुत लोग अफगानिस्तान में हुई उथल पुथल पर तालिबान को खाप वाले कहे जा रहे है जबकि तालिबान एक धार्मिक सिस्टम है ना अफगानिस्तान का सामाजिक सिस्टम ।

अब अगर आपको अफगानिस्तान को थोड़ा बहुत भी समझना है तो खाली अफगानिस्तान ही नहीं इस इलाके के बहुत सारे देशों के इतिहास पर नजर डालनी होगी , ये सारे देश एक ही तरीके के थे ।

ये है अफगानिस्तान , ईरान , बलोचिस्तान , खैबर पख्तूनख्वा , उज्बेकिस्तान , तुर्कमेनिस्तान , तजाकिस्तान , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान ,मंगोलिया। इसके अलावा इनका असर इराक , अज़रबैजान और भारत की इंडस वैली के इलाकों पर भी नजर आता है । इतिहास में ये इलाके कई बार एक ही शासन के अधीन रहे है पर ये तब तब था जब इस्लाम का इन पर प्रभाव नही था ।

आज का अफगानिस्तान तो अब्दाली के समय सामने आया पहले ये कई शक्ल के रूप में रहा । यहाँ फारस , हुन , कुषाण ( बहुत लोग कुषाणों को भारत का कह देते है , उनका राज्य राजस्थान तक था मगर वे आये चीन की तरफ से थे ) मौर्य ,अरबो और सिक्खों के अधीन रहा । यहाँ यूनानी भी आये । इस्लाम से पहले यहाँ फारस के धर्म और बौद्ध का प्रभाव था और ये इन सभी देशों में था ।

अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमा पर उज्बेकिस्तान के अंदर तरमेज के इलाके में बौद्ध धर्म के एक बहुत बड़े मठ के अवशेष है । ये अफगानिस्तान सीमा से मात्र एक दो km की दूरी पर है और इसी कारण वहां कोई जाता नहीं है हालांकि जपान ने मदद की है वहाँ । इन सभी देशों में फारस के धर्मो के अवशेष आज भी है । 

 बहुत सारे लोग भारत पर हमला करने वाले तैमूर और बाबर को अफगानिस्तान का मानते है मगर ये दोनों के इलाके उज्बेकिस्तान में है । बाबर समरकंद का था और तैमूर जिसने भारत मे बहुत मारकाट मचाई थी वो तो उज्बेकिस्तान में राष्ट्रीय नायक है , ताशकंद में बहुत बड़ी मूर्ति है उसकी ।

अब इन इलाकों का पिछले ढाई हजार साल का इतिहास देखे जब इस्लाम भी नही था तो यहाँ जीवन यापन का मुख्य तरीका लूट रही है । कई कई कबीले मिलकर एक ग्रुप बना कर बड़ी दूर दूर तक लूट कर के आते थे और ऐसे ही कई देश और धर्म बनते रहे और बिगड़ते रहे । अफगानिस्तान कभी गंधार तो कभी पख्तूनख्वा तो कभी किसी और नाम से जाना गया ।

7 , 8वी सदी में यहां इस्लाम आया और बौद्ध धर्म खत्म हो गया । अब ये कुषाणों की तरह हिंदू कुश की पहाड़ियों को पर कर गंगा के मैदानों तक लूट करने लगे । लूटते कोई गवर्नर लगाते और वापिस चले जाते । 

  मगर 20 सदी में बहुत बदलाव हुए इन इलाकों में एक बड़े भूभाग को रूस ने सोवियत संघ में मिला लिया ।

जो इलाके सोवियत संघ के प्रभाव में आये खासकर उज्बेकिस्तान , तजाकिस्तान , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान वो अपनी लूट करने की प्रवृत्ति छोड़कर सामान्य जीवन जीने लगे , उन पर यूरोप का असर बहुत आया । इन देशों में सुन्नी मुस्लिम ज्यादा है मगर वहाँ औरतों बच्चो को पूरी आजादी है । तजाकिस्तान ने तो अब हिजाब पहनने पर पाबंदी हटा दी है । अब ये सभी देश पर्यटन को बढ़ावा दे रहे है । 

  अफगानिस्तान में भी रूस आया मगर यहाँ कुछ समय तक ठीक रहने के बाद फिर पुरानी परंपरा पर चल पड़े। यूरोपियन को खुद अफगानों ने सिक्खों के खिलाफ एंट्री करवाई थी तब से इनका यही हाल है। अफगानिस्तान में खेती कारोबार कुछ नहीं है और इसलिए जो गुट हावी होता है उसी के साथ बन्दूक लेकर चल पड़ते है क्योंकि इन सब ने पेट पालना है ।

  अफगानिस्तान में भारत की तरह कई बोलिया और कई समुदाय है , इनमें पख्तून सबसे ज्यादा है मगर उसके साथ तुर्कमान , उज्बेक , हजारा , ताजिक और बलोच भी है। इन हजारा कबीला ही शिया मुस्लिम है और पिछली तालिबान सरकार के वक़्त हजारा काफी बड़ी संख्या में मार दिये गए थे । अफगानों को पिछले डेढ़ सदी से एक बहुत बड़ा मलाल भी है जिसे वो आज तक नही पचा पाए और वो है पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा का इलाका जिसका पेशावर गढ़ था ।

इस इलाके को अफगानिस्तान से जीत कर महाराजा रणजीत सिंह केसरी निशान साहिब ( जिस पर 26 जनवरी को दिल्ली में लाल किले पर विवाद हुआ था ) के अधीन खालसा राज में शामिल कर लिया था । ये अफगानिस्तान के बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण इलाका था मगर सिक्खों की वजह से आज अफगानों के पास नही है।

तालिबान ने पिछली खैबर पख्तूनख्वा के इलाके में अपने लड़ाके भेजे थे और तब यहाँ हिन्दू सिक्ख हसन अब्दाल के पंजा साहिब गुरुद्वारा में शरण ले गए थे और पाकिस्तान सरकार ने सुरक्षा का प्रबंध किया था मगर इस इलाके में आज भी पाकिस्तान सरकार का कोई खास प्रभाव नही है । इमरान खान इसी खैबर पख्तूनख्वा इलाके से आते है और वो पख्तून है ।

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