हिरोशिमा, नागासाकी ! इंसानियत के विरूद्ध या इंसानियत को बचाने के लिए ? एक नई बहस !

6 अगस्त 1945 सुबह के समय जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर तथा पहले धमाके के साथ ही एक एटम बम धमाका इंसानों और इंसानी बस्ती को राख में बदल देता है।

लेकिन क्या यह कृत्य उस वक्त की जरूरत था या इंसानियत के विरूद्ध किया गया अपराध ? एक नई बहस जन्म ले रही हैं और शायद निकट भविष्य में इसे सही सिद्ध करने वाले विचार भी सामने आ जाए।

आज ही के दिन दिनांक 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर एटम बम गिराया था।

Paul Warfield Tibbets , यह उस पायलट का नाम है जिसने दुनिया का पहला परमाणु बम जापान के हिरोशिमा नगर पर दिनांक 6 अगस्त 1945 को गिराया था और लगभग 135000 नागरिक तत्काल ही मारे गये थे तथा कई वर्षों तक कैसर और दूसरी बीमारियों से रेडियोधर्मि विकिरण के प्रभाव से जूझते रहे । 

पॉल टिब्बेटस ने अपनी उस समय की मनःस्थिति और भावनाओं को कुछ वर्षों पहले वर्णन किया था ।

दिनांक 6 अगस्त 1945 की सुबह लगभग तीन बजे वह अपने B-9 प्लेन जिसका नाम उन्होंने अपनी मॉ इनोला गे के नाम पर रखा था को Tinian बेस से उड़ान भरी । हिरोशिमा तक की दूरी लगभग 6 घंटे की थी । विमान में Little Boy नाम का एक बम था जिसका वजन 4500 किलोग्राम था और यह एटम बम था । विमान के साथ दो और प्लेन भी उड़ रहे थे। जैसे जैसे मंज़िल नज़दीक आ रही थी पायलट का दिमाग़ तेज़ी से दौड़ रहा था । उनका पूरा ध्यान मिशन की कामयाबी पर लगा हुआ था और रह रहकर ख़्याल आ रहा था कि बम के गिरते ही अनगिनत लोग मारे जायेगे जो सैनिक भी नहीं है पर यह सोचना मेरा काम नहीं है । मेरा काम आदेश का पालन करना है और मैं फायटर पायलट हूँ और मेरा काम बम गिरा कर टार्गेट को तबाह करना है ।

जैसे ही उनका प्लेन मंज़िल के उपर पहुँचा तो एक बार फिर वह सोचने लगे और नतीजे पर पहुँचे कि नैतिकता के बारे में सोचना उनका काम नहीं है और जिन्होंने बम गिराने का आदेश दिया है यह सोचना उनका काम है । वैसे भी युद्ध में नैतिकता नहीं देखी जाती और उनका काम दुश्मन पर कठोर प्रहार करना है और वह वहीं करने जा रहे है । मुझे सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है और कुछ नहीं सोचना है ।

यह सब सोचते सोचते वह समय आ गया जब बम को गिराना था । सुबह के नौ बज रहे थे , लोग बाग दैनिक कामों से बाहर निकले हुऐ थे और तभी उपर से ‘ लिटिल बवाय ‘ को छोड़कर तीनों प्लेन यू टर्न लेकर वापस लौट चले । क़रीब पचास सेकंड बाद बम फटा ।हिरोशिमा पर अनदेखी तबाही का बेहद चमकीला,रंगीन भीमकाय मशरूम खिल उठा। परमाणु विस्फोट से हज़ारों टन ऊर्जा प्रवाहित हुई । आग और ग़ुबार का बवंडर चल पड़ा। एक के बाद एक कई धमाकों से हिरोशिमा तबाह हो गया । कुछ धमाकों की आवाज़ और धमक हिरोशिमा से 15 मील दूर जा चुके प्लेन में बैठे पॉल टिबेटस और उनके साथियों ने सुनी ।

हिरोशिमा पर बम गिराने के तीन बाद नागासाकी पर भी फ़ैट मैन नाम का एटम बम गिराया गया जिसमें भी वैसी ही तबाही हुई और लगभग 66000 लोग तत्काल ही मर गये थे । इन हमलो से जापान टूट गया और आत्म समर्पण कर दिया । इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध का अंत हुआ। 

पॉल टिबेटस को तत्कालीन अमेरिकी प्रेसिडेंट हैरी एस ट्रमैन ने मिलने के बुलाया और पूछा कि वह क्या सोचते हैं तो पॉल टिबेटस ने जवाब दिया कि वह सिर्फ़ वहीं सोचते हैं जो उनसे करने के लिये कहा गया और उन्होंने सिर्फ़ आदेशो का पालन किया था।

अगली कड़ी में प्रेसिडेंट हैरी trueman की बात करे तो उनके अनुसार इंसानियत के विरूद्ध लगातार चल रहे विश्वयुद्ध को समाप्त करने का यही एकमात्र विकल्प था तथा यदि ऐसा ना किया जाता तो आने वाले दशकों तक भी सेकंड वर्ल्ड वार को खत्म नहीं किया जा सकता था।

इस घटना का समर्थन चीन द्वारा भी किया गया था क्योंकि जापानियों द्वारा लंबे समय तक चीन का शोषण तथा चीनी जनता पर अत्याचार वो नहीं भूले थे, शायद इसके बाद ही जापानी सामाज अतिशय ढंग से न केवल विनम्र हो गया अपितु अपने आर्थिक विकास के लिए केंद्रित हो गया और आजतक अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की कॉलोनी की तरह ही काम करता है।

Harry Trueman का व्यक्तित्व भी अपने आप में अनोखा है और इन्हे प्रेसिडेंट by luck के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इनके उपराष्ट्रपति बनने तक इन्हे कोई पहचानता भी नहीं था जिसके कारण आज भी अमेरिकी समाज में Who Harry नामक मुहावरा लोकप्रिय है ।

यहां तक कि जब प्रेसिडेंट रूजवेल्ट से उनके उपराष्ट्रपति के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने भी कहा " Who Harry" Harry Trueman एक साधारण सैनिक थे तथा रिटायरमेंट के बाद जनता के बीच इसी पहचान से गए थे कि वो आम आदमी है और उन्ही के बीच से उठकर आए हैं न कि कोई राजनेता या धनपति। जनता ने इन्हे जीता दिया फिर राष्ट्रपति रूजवेल्ट की मृत्यु के बाद ये प्रेसिडेंट बन गए तथा हिरोशिमा नागासाकी कांड कर दिया।

गलत किया या नहीं एक बार फिर यह बहस का विषय बन गया है। ऐतिहासिक खोज के लिए जनाब आर के जैन  के सहयोग का धन्यवाद।