मोहम्मद रफी तुम बहुत याद आए....। मन तरसत हरी दर्शन को आज .... एक चमत्कार - मोहम्मद रफी !

मन तरपत हरी दर्शन को आज ....

मितर प्यारे नू......( फिल्म नानक नाम जहाज है)

कुछ ऐसे गायकी के चमत्कार है जिसे किसी ने कभी सुना ना हो, ऐसा हो नहीं सकता और दुनिया में कोई ऐसा भी नहीं हो सकता जिसे गीत संगीत में रुचि हो और उसने रफी साहब का नाम न सुना हो।उन्हीं रफी साहब की पुण्यतिथि पर उनके जीवन के कुछ रहस्य विनोद छाबड़ा जी की जुबानी।

दो राय नहीं हो सकती कि पुरुष गायकों में सबसे ज्यादा फैन क्लब सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफ़ी के नाम हैं. ये प्रमाण है कि वो बेहिसाब मक़बूल थे. अमृतसर के पास एक गांव कोटला सुल्तानपुर में 24 दिसंबर 1924 को जन्मे रफ़ी साब का निधन आज ही के दिन 1980 को हुआ था.

उस दिन बम्बई (आज मुंबई) में भयंकर बारिश हो रही थी. लेकिन उनके प्रशंसकों के सैलाब को ये बारिश नहीं रोक सकी. कहते हैं, रफ़ी की गायकी की बारीकियों के बारे में बात करना सूरज को दिया दिखाने के समान है. वो बेमिसाल थे. हर तरह के गाने गा सकते थे. चाहे क्लासिकल हो या वेस्टर्न. गंभीर हो या कॉमेडी. उनकी आवाज़ का फ़लक़ बेहिसाब था. उनकी स्वर के बारे में अनेक मिसालें हैं. अगर फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो ग्रन्थ तैयार हो जाए. अगर उन्हें मालूम होता था कि उनका गाना फलां कलाकार पर फ़िल्माया जाना है तो फिर कहने ही क्या. वो खुद अदाकार बन जाते और किरदार को खुद में ढाल लेते. धीर-गंभीर दिलीप कुमार हों या चुलबुले जानी वॉकर या फिर विद्रोही स्टार शम्मी कपूर. वो उनकी आवाज़ बन जाते. प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार और देवानंद की भी रफ़ी बरसों स्थायी आत्मा बने रहे. 

अदाकारी की निचली पायदान माने जाने वाले बिस्वाजीत (पुकारता चला हूँ मैं.…) और जॉय मुखर्जी (आँचल में छुपा लेना कलियां…) सरीखे अभिनेताओं के बारे में कहा जाता था कि वो अगर फ़िल्मों में खड़े हो पाये तो उन पर फिल्माए रफ़ी के गानों की वज़ह से.

रफ़ी के बारे में ज़िक्रे आम है कि वो जितने बेहतरीन गायक थे उतने ही बेहतरीन इंसान भी. किसी भी नए कलाकार को अपनी आवाज़ देने में कोई संकोच नहीं था उनमें. कॉमेडियन को भी आवाज़ को आवाज़ देकर इज़्ज़त बख़्शने वाले रफ़ी साहब पहले थे. इस श्रंखला में जॉनी वॉकर का नाम टॉप पर रहा.  

मुफ़लिसी के दौर से गुज़र रहे संगीतकार निसार बज़मी की 'खोज' के लिए रफ़ी ने एक रूपये में गाया. उन दिनों बज़्मी साब को कोई घास नहीं डालता था. बाद में बज़्मी मायूस होकर पाकिस्तान चले गए और वहां बहुत बड़े संगीतकार बन गए.

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को भी शुरुआती दौर में पैर ज़माने में रफ़ी साहब ने बहुत मदद की. उनकी पहली फिल्म 'छैला बाबू' के लिए पहला गाना बिलकुल मुफ़्त में गाया. उन्हें नई फिल्मे भी दिलायीं. 'दोस्ती' में रफ़ी के गाये 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…गाने से लक्ष्मी-प्यारे कहां से कहां पहुंच गए. इसके लिए रफ़ी साब को बेस्ट सिंगर का फिल्मफेयर पुरुस्कार भी मिला.

संगीतकार रोशन के पुत्र राकेश रोशन की पहली फिल्म 'आपके दीवाने' के लिए रफ़ी साहब ने सिर्फ एक रुपए मेहनताना लिया था. दुनिया जानती है कि बतौर निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन ने अपने दौर में खासी बुलंदी अर्जित की. 

अपने कैरियर के आख़िरी सालों में कुछ विवाद उठने के कारण रफ़ी साब अवाम में नहीं फिल्म इंडस्ट्री में अलोकप्रिय भी हुए. लता जी से उनके झगड़े की कई कहानियां अफ़वाह फ़ैक्टरी में बनायीं गयी. लेकिन रिकॉर्ड में यह है कि उनका झगड़ा फिल्मों में गाने की रॉयल्टी को लेकर हुआ. लताजी गाने के लिए मेहनताने के साथ-साथ रॉयल्टी भी चाहती थी. प्रोड्यूसर इसके विरुद्ध थे और रफ़ी उनका पक्ष लेते थे।. इस मुद्दे पर बात इतनी गर्म हुई कि रफ़ी साहब ने ऐलान किया कि वो लता जी के साथ नहीं गाएंगे.

यही स्टैंड लता जी ने भी लिया. यह भी एक डिस्प्यूट है कि पहले किसने गाने से मना किया. कुछ फिल्म इतिहासकार बताते हैं कि 'माया' में एक गाने (तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है.…) की चंद पंक्तियों के कारण संबंध ख़राब हुए थे. संगीतकार सलिल चौधरी ने लता का साथ दिया. एक इंटरव्यू में उषा तिमोती ने बताया था कि ये सब तो बहाने थे. असल वज़ह थी कि रफ़ी जी अपनी आदत के अनुसार हमेशा नए गायक को प्रमोट करते थे. इसी कड़ी में उन्होंने सुमन कल्याणपुर को प्रमोट किया. लताजी को ये बात पसंद नहीं आई. यों लता जी संगीतकार शंकर-जयकिशन के शंकर के साथ गायिका शारदा को प्रमोट करने के मुद्दे को लेकर भी नाराज़ हुई थीं. उस ज़माने में लोगों को हैरानी होती थी कि आख़िर रिश्तों में इतनी खटास क्योंकर आ गयी कि एक-दूसरे को भाई-बहन मानने वाले रफ़ी और लता एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाते दिखे.

संगीतकार जयकिशन ने 1967 में रफ़ी और लता की सुलह करा दी. अच्छी गायकी के चाहने वालों ने दिल खोल कर स्वागत किया. इसके बाद दोनों के कई गाने रिकॉर्ड हुए. कालांतर में फिर विवाद खड़ा हो गया. लता जी ने एक समारोह में बताया कि रफ़ी साहब ने उनसे लिखित माफ़ी मांगी थी. जबकि रफ़ी के बेटे शाहिद रफ़ी का कहना है कि माफ़ी नहीं मांगी गयी थी और अगर ऐसा था तो लता जी माफ़ीनामा दिखाएँ. वो माफ़ीनामा अभी तक पेश नहीं हो सका है. बहरहाल, इन तमाम विवादों के बावजूद रफ़ी साब की गायकी का कद कम नही हुआ. दुनिया उन्हें एक ऐसे गायक के रूप में याद रखती है जिसका कोई सानी नहीं है.  

रफ़ी साहब एक सच्चे मददगार होने के अलावा बेहद भावुक इंसान भी थे. मन तड़पत हरी दर्शन को आज.… और बाबुल की दुआएं लेती जा.…के लिए कई कई दिन तक रियाज़ किया. बताया जाता है वो इन गानों की रिकॉर्डिंग पर फूट फूट कर रोये थे.

सर्वश्रेष्ठ गायन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड में रफ़ी 21 बार नॉमिनेट हुए और छह बार वो जीते. एक बार राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला - क्या हुआ तेरा वादा वो क़सम वो इरादा... (हम किसी से कम नहीं). उनकी अमर आवाज़ आज भी कानों में गूंजती हैं - सुहानी रात ढल चुकी…ओ दुनिया के रखवाले…हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए.…देखी ज़माने की यारी, बिछुड़े सभी बारी बारी…मिली ख़ाक में मोहब्बत …मधुवन में राधिका नाचे रे.…मैं ज़िंदगी में हरदम रोता ही रहा हूं.…सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए.…तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना…और कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों…मेरी आवाज़ सुनो प्यार का राग सुनो…ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे…हर शोक को हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया... बहुत लम्बी फ़ेहरिस्त है. जब तक फ़िज़ा है रफ़ी रहेंगे. अमर आवाज़ें कभी ख़त्म नहीं होती. 

News Number परिवार ऐसे महान कलाकार को सादर स्मरण करता है।

बद से बदनाम बुरा और जब किसी सरकार पर संस्थानों और शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगने लगे तो उसके नेता का इकबाल खत्म हो जाता है।

भारत या कोई भी लोकतांत्रिक देश हो वहां सरकारों के अतिरिक्त अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी होती हैं और व्यवस्था स्थापित करने के लिए कई स्वतंत्र विभाग भी होते है जिससे सभी के सभी काम ईमानदारी से चलते रहे एवम् जम कल्याण तथा विकास कार्यों में कोई बाधा न हो। ...

कूटनीति, मोदी सरकार और दुशांबे सम्मिट ! SCO बैठक का विश्लेषण एवम् भारतीय प्रधानमंत्री का संबोधन।

आज समाप्त होने वाली शंघाई सहयोग संगठन की शिखर मीटिंग में भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा वर्चुयल संबोधन प्रसारित किया गया। संगठन एवम् कूटनीति का अपने विचारो के अनुसार विश्लेषण करने का प्रयास। ...

कनाडा और भारत दुनियां के दो ऐसे देश है जहां बहुत सी सभ्यताएं बसती हैं और साथ साथ चलती हैं दूसरी समानता यह है कि पंजाबियों ने अपने खान पान से सबको प्रभावित किया है।

भारत बेशक विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का संगम है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत ( विशेषकर गौ पट्टी क्षेत्र ) को खाने की विविधता और स्वाद पंजाब ने ही दिया है। ...

गणपति बप्पा मोरया । आजकल भारत में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है जिसे आज़ादी के संग्राम के समय पब्लिक मीटिंग्स के लिए बहाने के तौर पर शुरू किया गया था।

गणपति बप्पा मोरया । आजकल भारत में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है जिसे आज़ादी के संग्राम के समय पब्लिक मीटिंग्स के लिए बहाने के तौर पर शुरू किया गया था। लेकिन कालांतर में यह धार्मिक आयोजन और आस्था का अटूट अंग बन गया। क्योंकि दक्षिण एशिया की संस्कृति में भावनात्मकता का पुट अधिक होता है और सदियों तक आश्रित रहने वाली नस्लों को हमेशा किसी चमत्कारिक लाभ की उम्मीद रहती हैं इसीलिए पीर फकीर से लेकर विभिन्न आस्थाओं का बोलबाला है। गणेश चतुर्थी जो कभी महाराष्ट्र में मनाई जाती थी अब उत्तर भारत के अधिकांश बड़े शहरों में मनाया जा रहा है। यहां तक कि पंजाबी समुदाय भी अब गणेश प्रतिमा स्थापित करने लगा है बेशक गणपति के पीछे का दर्शन ना जानते हो। ...

सुधा मूर्ति ! यदि इंफोसिस फाउंडेशन का नाम सुना होगा तो उसकी चेयर पर्सन को भी जरूर जानते होंगे ! आज उनके पिता को जानिए।

इंफोसिस फाउंडेशन भारत की शान कहीं जा सकती और इसकी चेयर पर्सन मैडम सुधा मूर्ति की समाज सेवा एवम् विद्धता को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है लेकिन इसके पीछे निसंदेह उनके पारिवारिक संस्कार है जो उन्हे उनके पिता से मिले होंगे। मैडम सुधा मूर्ति के पिता डॉक्टर रामचंद्र कुलकर्णी के जीवन की एक घटना। ...

पंजाबी भाषा की फिल्मों में नानक नाम जहाज है का रेकॉर्ड आज तक कायम है और उसके साथ ही "पासा पुट्ठा पै गया" डायलॉग भी याद होना चाहिए।

हिन्दी सिनेमा के अतिरिक्त पंजाबी भाषा में भी कई फिल्में बनी और उस कड़ी में नानक नाम जहाज है नामक फिल्म की सफलता ने जो झंडे फहराए वो आज तक किसी दूसरी फिल्म के भाग्य में नहीं आया। उस फिल्म के मोहम्मद रफी की आवाज़ के गाए गए शब्द आज भी आत्मिक सुख देते हैं लेकिन एक चरित्र और याद आता है जिसका "पासा पुट्ठा पै गया" बोलना कभी नहीं भूलता। ...

जिस प्रकार प्रत्येक शहर की पहचान के साथ किस न किसी भवन से बताई जाती है वैसे ही दिल्ली को कुतुब मीनार और लोट्स टैम्पल से पहचाना जाता है।

प्रत्येक शहर की पहचान के साथ वहां के किसी न किसी भवन को जोड़कर देखा जाता है जैसे आगरा को ताजमहल और दिल्ली को कुतुब मीनार तथा लोटस टैंपल से पहचाना जाता है। लेकिन लोटस टैंपल देखने जाने वाले विजीटर्स के मन में यह विचार अवश्य आता होगा कि यह कैसा मन्दिर है जिसमे देखने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि यह बहाई संप्रदाय का पूजा स्थल है। बहाई संप्रदाय के सम्बन्ध मे मनीष सिंह की रिपोर्ट। ...

Dismentaling Global Hindutva ! अमेरिका में 50 विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विवाद क्यो हुआ ?

10 सितम्बर से 12 सितम्बर तक तीन दिन का एक वर्चुअल सम्मेलन आयोजित किया गया जिसे C oHNA ने Dismentaling Global Hindutva के नाम से आयोजित किया। वाशिंगटन पोस्ट तथा अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस सम्मेलन पर व्यापक रिपोर्टिंग करते हुए कई आलेख प्रकाशित किए यद्धपि भारत में इसकी चर्चा भी नहीं हुई। ...

जुल्फिकार अली भुट्टो! दक्षिण एशिया का ऐसा राजनेता जिसके नाम पर आज भी राजनीति होती हैं बेशक उसकी सोच से कोई सहमत हो या न हो।

जिवें सिंध ते जीवें भुट्टो के नारे के साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी आज तक राजनीति करती हैं बेशक जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया था और बीबी बेनजीर भुट्टो को शहीद कर दिया गया था। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान टूटने के बाद अपने देश को भुट्टो ने नई दिशा दी और मनोबल टूटने नहीं दिया। ...

हिन्दी दिवस! भाषा की आड में संस्कृति बदलने की कवायद।

14 सितम्बर जिसे हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है और इससे अधिक हास्यास्पद क्या होगा कि वो सभी हैप्पी हिंदी डे बोलने लगते है जिन्हे उन्यासी और नवासी का अंतर भी मालूम नहीं होता तथा जो अपने बच्चो को कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए जमीन आसमान एक किए रहते है बेशक वहां हिंदी बोलने की सख्त मनाही हो। ...

क्रान्ति होती हैं, जनता द्वारा की जाती है लेकिन उस क्रांति को खड़ा करने और लक्ष्य तक पहुंचाने के पीछे जनता नहीं होती।

क्रांतियां होती हैं और आज के अधिकांश देशों के निर्माण के साथ किसी न किसी क्रांति का नाम जुड़ा हुआ है तथा साथ ही क्रांति लाने वाले नेता का भी। किन्तु उन क्रांतियों के पीछे कोई सार्थक उद्देश्य रहे थे और उनका नेतृत्व किसी सक्षम व्यक्ति के हाथ में था। परन्तु यदि भीड़ के लिए कोई अराजकता खड़ी करनी हो तो योजनाकार क्या करते हैं ? ...

पीचे देखो पीचे , पीचे तो देखो उधर भी आग लगी है और उसकी चिंगारी बी नुकसान पहुंचा सकती है।

एक महीने से अधिक हो चुका है जब काबुल से तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी देश से भाग गए थे और तालिबान ने काबुल फतेह कर लिया था। उसके बाद से आजतक भारतीय मीडिया एवम् विचारक केवल अफगानिस्तान केंद्रित खबरे तथा विश्लेषण कर रहे है। ...

9/11 जिसे आतंकी घटना से लेकर यूएस अंडर अटैक बोला गया एक कभी ना सुलझने वाली उलझन है।

बीस साल पहले अचानक दुनियां भर को दहलाने वाली खबरे चलने लगी और उसे इतिहास 9/11 के नाम से जानती है, इसी घटना के बाद इराक़ हमला हुआ, अफगानिस्तान पर कार्पेट बंबिंग हुई और नाम मिला वार अगेंस्ट टेरर किन्तु जो सवाल खड़े हुए वो आज भी जवाब मानते है।। ...

हम बेईमान क्यो कहलाते है ? क्योंकि हमारे नेता, हमारे अधिकारी और हम खुद बतौर एक वोटर, ईमानदार नहीं है।

यकीनन किसी भी भारतीय के मन में अपने इर्दगिर्द के माहौल को देखकर यह सवाल पूछने का मन करता होगा " हम बेईमान क्यों है" ...

हिंदुस्तान ! धरती का एक ऐसा हिस्सा जिसे multi wonder land कहना ज्यादा ठीक होगा।

हिंदुस्तान या भारतीय उपमहाद्वीप ? दक्षिण में कन्या कुमारी से लेकर हिंदुकुश पर्वतमाला तक फैला हुआ असंख्य बोलियों, आस्थाओं और संस्कृतियों का संगम। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी अतुलनीय। इतिहास का परिचय कराने वाली इस श्रंखला की शुरुआत करते हैं राजस्थान के उदयपुर स्थित दुर्ग कुंभलगढ़ से जिसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती ...

भारत और पाकिस्तान एक ही देश के दो टुकड़े और परम्परागत युद्ध के साझीदार ।

भारत और पाकिस्तान दो संप्रभु देश है बेशक कुछ समय पहले तक एक ही भूभाग और एक ही देश होते थे। एक बार जनरल अयूब खान ने नेहरू जी के आगे प्रस्ताव रखा था कि दोनों देश चाहें तो संयुक्त सेना रख सकते है जिससे काफी बचत होगी, उनके जवाब में नेहरू जी ने कहा कि यदि ऐसा हुआ तो फिर युद्ध किससे होगा ? बेशक आम जनता युधोंमाद में एक दूसरे को शत्रु समझने लगती हैं लेकिन प्रोफेशनल आर्मी के लिए लड़ाई लडना भी एक कार्य है बाकी तो जनता के लिए भावनात्मक नारे लगाए हैं। आज पाकिस्तान सेना दिवस मना रहा है, इसी अवसर पर एक भारतीय सैनिक की कहानी जिसका अपना अलग ही रेकॉर्ड बना था ...

NRC भारत सरकार द्वारा लागू अधिनियम और इसी के साथ आसाम राज्य में फैली अराजकता। दो साल बाद एक बार फिर चर्चा में है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस विषय पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अचानक एक आंदोलन खड़ा हो गया था जिसमे कहा गया कि भारतीय उत्तर पूर्व के राज्य आसाम में लाखो बांग्लादेशी नागरिक घुस चुके है और वहां की डेमोग्राफी तथा आर्थिक हालात पर असर डाल रहे है। राजीव गांधी के कार्यकाल में आसाम के आंदोलन कर रहे छात्रों तथा भारत सरकार के बीच एक सहमति बनी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नेशनल सिटिज़न रजिस्टर बनाने की रूपरेखा तैयार की गई। ...

फिल्मी दुनिया के seven wonders की बात की जाए तो उसमें एक नाम घूंघट की बीनाराय का जरूर आएगा।

वास्तु शिल्प से लेकर अलग अलग क्षेत्रो में कुछ ना भूलने लायक पहलू होते है जैसे भारत का ताजमहल जिसको शब्दो मे परिभाषित करना सम्भव ही नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ ऐसे ही चेहरे हुए हैं जिन्हे कभी भुलाया नही जा सकता और यदि फिल्म जगत के seven wonders की बात होगी तो निश्चित रूप से उसमे बीनाराय का नाम जरूर आएगा। ...

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं।

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं एक ऐसी ही गायिका जो लाहौर में जन्मी और मुंबई में अंतिम आरामगाह में सो गई। ...

किसान आंदोलन एक नई करवट लेता हुआ जिसके बाद शायद बहुत कुछ बदल सकता है।

यदि पंजाब से उठे किसान आंदोलन को भी जोड़ दिया जाए तो किसानों को घरों से निकल कर सरकार के आगे आंदोलन करते हुए लगभग एक साल हो चुका है और यह भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा किए गए पगड़ी सम्भाल जट्टा आंदोलन का भी रेकॉर्ड तोड़ चुका है। ...

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। बैल हमारा बाप है, इज्जत देना पाप है ! ।

भारत एक देश जिसकी प्रतिभाओं को नासा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर पूरी दुनिया में पहचाना जाता था और दुनियां कद्र करती थी कि भारतीय किसी भी पद पर कार्य करते हो या अपना कारोबार या सर्विस सेक्टर में हो अपना काम बुद्धिमानी और मेहनत से करते है। फिर धीरे धीरे ब्रेन ड्रेन शुरू हुआ और सबसे पहले पंजाब फिर अन्य राज्यों से युवा विदेशो में जाने लगे, विदेशी सरकारें भी जानती थी कि विकास के लिए भारतीयों को बसाना घाटे का सौदा नहीं है लेकिन खुद भारत वासी भूल गए कि जब सभी चले जाएंगे तो यहां बाकी क्या रहेगा ? ...