श्रावण मास और उत्तर भारत की कांवड़ यात्रा जिसपर सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया है।

बेशक हिंदुस्तान विविधताओं का देश है लेकिन भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू के अनुसार यह मूर्खताओं का भी देश है और यहां की 95% जनता को उसी श्रेणी में रखना चाहिए।

निसंदेह किसी की भी आस्था और विश्वास पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए किन्तु किसी भी चली आ रही परम्परा को अंधभक्ति की तरह स्वीकार करना भी पाखंड ही मानना चाहिए और यदि ऐसा न होता तो इस जमीन पर बाबा बुल्लेशाह, नानक और कबीर जन्म ना लेते।

शक संवत् के श्रावण मास में उत्तर भारत में अक्सर कांवड़ यात्रा निकलती थी जिसके कारण किसी छोटे देश की जनसंख्या के बराबर या अधिक जनता सड़को पर हरिद्वार से अपने इच्छित मन्दिर तक जल लेकर जाते दिखाई देते थे।

उससे भी अधिक जनसंख्या एक प्रकार से अपने घरों में कैद होने के लिए मजबूर हो जाती थी क्योंकि प्रशासन किसी भी प्रकार की गुंडा गर्दी, दंगा फसाद जैसी स्थिति से बचाव के लिए यातायात प्रतिबन्ध लगा देता था जिसे अघोषित कर्फ्यू भी कह सकते हैं जिसमे एम्बुलेंस भी नहीं चल सकती थी।

इस यात्रा की शुरुआत कहां से हुई और क्यों हुई यह शोध का विषय होना चाहिए था किन्तु इसके बजाय यह देखा गया कि इस यात्रा में निरन्तर वृद्धि क्यों होती रही एवम् किन वर्गो के युवा इसमें अधिकतम हिस्सा लेते रहे।

माइथोलॉजी के अनुसार रावण कैलाश पर्वत से शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था तो रास्ते में बैजनाथ धाम ( देवघर ) भारत का झारखंड राज्य में रुका लेकिन लघुशंका के लिए जाते समय ब्राह्मण रूपी विष्णु जी को वो शिवलिंग सौंप दिया और उन्होंने वहीं स्थापित कर दिया जिसके कारण वह द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक माना जाता है।

दूसरा ऐतिहासिक स्थल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ के निकट स्थित पुरा महादेव ( बिलोनी कस्बे के साथ ) मन्दिर बताया जाता था जिसके साथ कहानी जुड़ी हुई है कि परशुराम ने अपने पिता के कहने पर अपनी माता की हत्या कर दी थी क्योंकि हस्तिनापुर का राजा सहस्त्रबाहु परशुराम के पिता से कामधेनु गाय और उनकी पत्नी चुरा कर ले गया था किन्तु जब ऋषि पत्नी वापिस आई तो उसके पति ने चरित्र पर संदेह करते हुए स्वीकार करने से मना कर दिया।

तीसरा मुख्य स्थल हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का बैजनाथ मन्दिर है जिसे पांडवो द्वारा निर्मित बताया जाता हैं और कथा है कि गंगा नदी का उदगम स्थल यहीं से तय किया गया था किन्तु कार्य प्रारम्भ होने के समय किसी सुनार की स्त्री ने छींक मार दी जिससे गंगा जी गायब हो गई और वर्तमान उत्तराखंड राज्य से निकली। यहां भी प्राचीन शिवलिंग स्थापित है।

उत्तर प्रदेश के परशुराम वाली कथा के साथ हिंडन नदी का जल अर्पित करने की मान्यता रही है जिसे वहां पंचतीर्थों कहा गया है और स्थापित शिवलिंग भी जमीन के अंदर से प्राप्त बताया गया है किन्तु यदि ऐसा है तो कब ब्राह्मण समुदाय से ओबीसी वर्ग द्वारा अंगीकृत कर लिया गया, कब हिंडन के स्थान पर हरिद्वार से गंगा जल जुड़ गया और ऐसा क्यों हुआ इसका कोई उत्तर उपलब्ध नहीं हैं।

बैजनाथ धाम झारखंड के सम्बन्ध मे अनुमान लगाया जा सकता है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण शायद जल, जंगल जमीन से उनके लगाव ने किसी सामाजिक परम्परा को जन्म दिया हो जिससे जल विहीन क्षेत्रो मे पानी की उपलब्धता एवम् महत्व सुनिश्चित किया जा सके।

यदि प्राचीन शिव मंदिरों की बात की जाए तो वर्तमान पाकिस्तान का कटासराज तथा काठमांडू नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर भी याद रखना चाहिए और वहां ऐसी किसी परम्परा का उल्लेख नहीं मिलता।

संभवतः यह परम्परा आदि शंकराचार्य ने शुरू कराई हो क्योंकि उनसे पहले शैव्य एवम् वैष्णव समुदायों के बीच झगड़े फसाद होने के सम्बन्ध मे अक्सर बताया जाता है और इतिहास में रामेश्वरम में वैष्णव द्वारा किसी बड़े हमले तथा नरसंहार का उल्लेख भी मिलता हैं। शायद दोनों समुदायों में एकता तथा सौहार्द कायम करने के लिए कोई ऐसा उद्यम प्रारम्भ किया गया हो।

जिनकी आस्था इस वार्षिक कार्यक्रम से जुड़ी हुई है इस बार उनसे सवाल किया जा रहा है कि जब सिनेमा हॉल खुल गए हैं, दिल्ली में मेट्रो तथा सार्वजनिक वाहन 100% क्षमता से चलाने के आदेश दिए जा चुके है तो कांवड़ यात्रा पर रोक क्यों लगाई गई है ?

इसी के साथ ही लगातार दूसरे साल अमरनाथ यात्रा पर भी रोक जारी रखी गई है और इस प्रकार कह सकते है कि ढाई अमरनाथ यात्राएं भारत सरकार द्वारा रोकी गई है।

यदि कोई सरकार धार्मिक आस्थाओं को देखते हुए धार्मिक यात्राएं भी नियमानुसार आयोजित कराने में सक्षम न हो तो उसके लिए और उसकी कार्य क्षमता के लिए क्या कहना चाहिए इसका निर्णय वो स्वयं करे।