भारतीय सिनेमा की प्लेबैक सिंगर की फेहरिस्त में एक नाम जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

भारतीय सिनेमा जगत ने एक से बढ़कर एक नायाब सितारों से खुद को सजाया है और उन्हें तो विशेष रूप से याद रखना चाहिए जिन्होंने समाज को चुनौती देते हुए अपना मुकाम हासिल किया।गीतादत्त - मैं प्रेम में सब कुछ हार गयी

मेरा सुंदर सपना बीत गया...(दो भाई), 

और 1946 में बंगाल के फरीदपुर में जन्मी गीता दत्त का आज ही के दिन 1972 में सपना बीत गया था।

तकदीर से बिगड़ी हुई तदबीर बना ले...(बाज़ी), आज सजन मोहे अंग लगा ले...(प्यासा), जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी...(प्यासा), हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो...(प्यासा), हवा धीरे धीरे आना...(सुजाता), वक़्त ने किया क्या हसीं सितम...(कागज़ के फूल), जानूं जानूं रे काहे खनके है तोर कंगना...(इंसान जाग उठा), बाबू जी धीरे चलना प्यार में ज़रा संभलना...(आर-पार), ठंडी हवा काली घटा...(मिस्टर एंड मिसेस 55), ए दिल है मुश्किल जीना यहां...(सीआईडी), मेरा नाम है चिन चिन चूं बाबा चिन चूं...(हावड़ा ब्रिज), जाता कहाँ है दीवाने...(सीआईडी), न जाओ सैंयां छुड़ा के बहिंयां कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी...(साहिब बीवी और गुलाम), मदभरी हैं प्यार की पलकें...(फैशन), न ये चाँद होगा न तारे रहेंगे मगर हम सदा तुम्हारे रहेंगे... (शर्त), पिया ऐसो जीया में समाय गयो रे...(साहिब बीवी और गुलाम), ऐ दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया है...(भाई भाई), तू मेरा चाँद मैं तेरी चांदनी...(दिल्लगी), मुझे जां न कहो मेरी जान ...(कनु रॉय), मैं तेरे प्यार में क्या क्या न बना दिलबर, मैं घटा प्यार भरी तू है मेरा बादल...(ज़िद्दी), मैं तो तेरी प्रेम दीवानी.. मैं तो गिरधर के घर जाऊं... (जोगन), आँखों ही आँखों में ईशारा हो गया.. .(डीआईडी), जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी...(मिस्टर एंड मिसेस 55), एलो मैं हारी पिया... (आरपार), रिमझिम के तराने लेके आयी बरसात...(काला बाजार), सुन सुन ए ज़ालिमा...(आरपार), वक़्त ने किया क्या हसीं सितम...(कागज़ के फूल), बालम से मिलन होगा अरमान के दिन आये...(चौदहवीं का चाँद)

अनगिनत नग़मे हैं जो आपने सुने हैं, कभी सोलो तो कभी डुएट. इनमें जो आवाज़ है वो गीता रॉय की है या गीता दत्त कह लीजिये. एक ही बात है. गुरुदत्त से शादी के बाद वो मिसेस दत्त हो गयीं थीं.

गीता के बारे में मशहूर था कि वो दर्द भरे गाने ही गाती है या फिर भजन-कीर्तन. लेकिन ये सच नहीं है, बीसियों गाने हैं जिसमें चुलबुलापन है, रोमांच है. लोरियां भी हैं. गीता की खासियत थी वो दिल से गाती थीं, उनकी आवाज़ आत्मा से सीधे मिला देती थी. उनके जैसा कोई नहीं गा सकता था. उनकी बेटी नीना मेमन ने किसी को एक इंटरव्यू में बताया था, मेरी मां बहुत नटखट थी, कभी खाली नहीं बैठती थी, हारमोनियम लेकर कुछ न कुछ गुनगुनाती रहतीं.

गुरुदत्त की छोटी बहन ललिता लाज़मी अपनी भाभी गीता की क्रिएटिविटी की चर्चा करते हुए उनकी खूबसूरती के बारे में भी ज़रूर बताती थीं, अजंता की पेंटिंग जैसी थीं, डार्क एंड ब्यूटीफुल. शायद यही वज़ह थी कि जब गुरुदत्त ने उन्हें 'बाज़ी' के लिए गाने की रिकॉर्डिंग करते हुए देखा तो रीझ गए. खूबसूरती और टैलेंट का संगम थीं वो. उस समय वो रिकॉर्ड कर रहीं थीं - हे हे हे हे तदबीर से बिगड़ी हुई तदबीर बना ले...हीरो को रिझाने वाला गाना था ये.

ये पचास के सालों की शुरुआत थी. तब तक गीता पहले से ही कई गाने गा चुकी थी, बांग्ला और हिंदी. ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी रही थी. महँगी-महँगी कारों में घूमती थी. गुरूदत्त तब स्ट्रगलर की तरह थे. मगर थे बहुत गुणी. उनके मन में हमेशा उथल-पुथल रहती थी, ज़िंदगी से हमेशा मुचैटा लेते रहने वाला विद्रोही जीव और तेवर. वो इसे सैल्यूलाइड पर ज़िंदा पेश करने की जुगत में जुटे रहते.

वास्तव में उनके अंतर्मन को जानना बहुत मुश्किल काम था. गीता को ऐसा ही आदमी पसंद था, इंटेलीजेंट, अंतर्मुखी. गीता में हर पल साथ-साथ बाँध कर चलने की ख्वाईश जगी, वो चाहती थी कि गुरू उसका अटूट हिस्सा बन कर रहे. वो गुरुदत्त को आँखों के रास्ते दिल में बसा बैठी. गीता ने गुरुदत्त के घर जाना शुरू कर दिया. उनके परिवार से ऐसे घुल-मिल गयीं जैसे वो उसी का हिस्सा हो. तीन साल चली उनकी प्रेम कहानी का अंत हुआ   शादी के सूत्र में बंध गए.

मगर इसी के साथ शुरू हुई ज़िंदगी, पार्ट - टू, जो बहुत ही दुखद और डरावनी रही. प्रेम विरोधियों को मुंह खोलने का जैसे मौका मिल गया. उनकी शादी एक दुखांत फिल्म की तरह ग्यारह साल तक चली. ये प्रेम करने वालों को आज भी डराती है. इसका ख़ात्मा बहुत ही ट्रैजिक रहा. गुरुदत्त की मृत्यु हो गयी,

असायमिक, 39 साल की कम उम्र में. उन्होंने नींद की गोलियों की ओवरडोज़ ले ली थी. आज भी रहस्य है कि वो एक्सीडेंट था या आत्महत्या. मगर ये तय है कि दोनों का वैवाहिक जीवन बहुत ही डिस्टर्ब था. इस बीच उनके तीन बच्चे भी हुए, दो बेटे और एक बेटी. ट्रेजेडी की विरासत आगे परिवार में भी गयी. दोनों बेटे आज दुनिया में नहीं हैं. एक बेटे तरुण ने सुसाइड कर ली और दूसरा अरुण भी नहीं रहा, वो भी असमय ही गया. बेटी नीना मेमन का जीवन सुखी है, पॉप सिंगर है. डायरेक्टर इस्माइल मेमन से शादी हुई उसकी. 

गीता और गुरुदत्त के दरम्यान तनाव की वज़ह क्या रही? ठीक ठीक कोई नहीं बता सका. दोनों ही अंतर्मुखी रहे. वही बता रहा हूं जो आमतौर पर बताया जाता है. शादी के बाद गीता घर में बंध गयीं. गुरू चाहते थे कि वो गृहस्थी संभाले. लेकिन टैलेंटेड इंसान घर में बंध कर नहीं रह सकता, खासतौर पर जब वो क्रिएटिव हो. गीता को घर में घुटन होने लगी. तब गुरू ने उसे गाने की इजाज़त दे दी,

लेकिन सिर्फ अपनी ही फिल्मों के लिए. गीता खुश हो गयी. लेकिन ये ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं रही. गीता को भनक लगी कि गुरू अपनी नयी खोज वहीदा रहमान में कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी ले रहे हैं. गीता स्वभाव से बहुत पज़ेसिव थीं, अपने पति को किसी दूसरी औरत के साथ बांटना उन्हें बर्दाश्त नहीं था. और शायद कोई भी औरत नहीं बाँट सकती. हालांकि गुरू गीता के सामने वहीदा के साथ अफेयर से इंकार करते रहे, लेकिन साथ ही साथ उसे फिल्म दर फिल्म रिपीट भी करते रहे. कुछ तो था दोनों के बीच. 

इस बीच गुरू ने गीता को खुश करने के लिए फ़िल्म बनानी शुरू कर दी - गौरी जिसकी नायिका थी गीता. लेकिन गीता को इससे संतुष्टि नहीं मिली. जान-बूझ कर शूटिंग से गायब हो जाती थी, देर से आना. वो शराब भी पीने लगी. नतीजा गौरी की शूटिंग कुछ दिन बाद बंद हो गयी. शायर कैफ़ी आज़मी ने दोनों के दिल के दर्द को समझा और शायद इसी लिए 'कागज़ के फूल' (1959) में लिखा 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम तुम रहे तुम हम रहे न हम...' गीता ने इसे जब गाया तो लगा दिल का दर्द बयां कर रही है. लेकिन पर्दे पर वहीदा गा रही थीं. 'चौदहवीं का चाँद' में गुरू ने वहीदा के हुस्न को बिखेरा तो गीता का जलना स्वाभाविक ही था. गुरू पर्दे पर वहीदा से रोमांस करते हैं, चौदवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो...

गीता इसे सचमुच देखती है. औरत के अंतर्मन को वही औरत समझती है जो उसमें इन्वॉल्व हो. बाकी के लिए बहुत कठिन काम है. 

गीता की कुंठा की एक वज़ह यह भी थी कि गायन की दुनिया में बहुत सीनियर थीं, लता मंगेशकर से भी कहीं ज़्यादा. लता उनके सामने ही आयी और कहाँ से कहाँ पहुँच गयी और गीता घर-गृहस्थी में उलझी रही. वक़्त किसी का इंतज़ार नहीं करता. जब वो विद्रोह करके घर से निकलीं, तो ज़माना बहुत आगे निकल चुका था. लता से मुकाबला को रूल आउट था. 1958 के आसपास सचिन देव बर्मन का लता जी से मनमुटाव हो गया. ओपी नय्यर तो वैसे भी लता जी से नहीं गवाते थे.

दोनों ने गीता को एक बार फिर चांस दिया. लेकिन गीता को ग़म ग़लत से कभी फुर्सत ही नहीं मिली. रियाज़ ही नहीं करती थीं. उन दोनों ने गीता को छोड़ उन जैसी गले वाली आशा भोंसले को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. 

इधर वहीदा इस कदर गीता के दिलो-दिमाग नागिन की तरह बैठ छा गयी कि उन्होंने फैसला सुना दिया कि वो वहीदा को प्लेबैक नहीं देंगी. साहिब बीवी गुलाम और चौदहवीं का चाँद में गीता के गाने रिकॉर्ड हुए, लेकिन वहीदा के लिए नही. बताया जाता है कि एक प्रोग्राम हुआ. ए टू ज़ेड सिंगर जुटे,

नए, वर्तमान और पुराने भी. गीता भी थीं उसमें, लेकिन उन्हें वो त्वज़ो नहीं मिली जो लता-आशा को मिली. क्या गीता किसी मायने में लता-आशा से कम थीं? यक़ीनन बिलकुल नही. लेकिन फ़िल्मी दुनिया है ही ऐसी, उगते सूरज को सलाम, डूबते का देख कर टाईम खोटी मत करो. बहरहाल, वहीदा को लेकर गुरुदत्त-गीता के बीच तकरार बहुत बढ़ गयी थी. गुरू ने 'साहिब बीवी और गुलाम' में लीड मीना को दी, वहीदा सेकंड लीड में और वो भी बस ऐवें ही थीं.

मगर सवाल उठा कि टॉप ग्रेड में पहुँचने के बाद भी वो सेकंड लीड के लिए तैयार कैसे हुईं? शायद गुरू के प्रति उनकी श्रद्धा थी, उनके उपकार का बदला. ये बात वहीदा ने कहीं कही भी थी. गीता इतना तो समझती ही थीं. सुना गया, गीता बच्चों को लेकर घर छोड़ गयी. दुःखी गुरू और भी दुखी हो गए. इधर वहीदा भी गुरू को छोड़ गयी.

शायद वो अपना आशियाना बनाने के लिए किसी दूसरे का घर तोड़ना नहीं चाहती थीं. या गुरू ने छोड़ दिया. 'बहारें फिर भी आएँगी' में 'वो' नहीं थीं. घर को बचाने की शायद ये आख़िरी कोशिश रही होगी. मगर कोई फर्क नहीं पड़ा. क्रिएटिव आदमी के साथ यही दिक्कत होती है, घर-बाहर उसे शांति चाहिए होती है. गीता भी क्रिएटिव थीं. वो ज़रूर समझती होंगी ये सब. मगर ये पज़ेसिवनेस बहुत बुरी बलां है. एक से बढ़ एक जीनियस को बर्बाद होते देखा गया है. 

10 अक्टूबर 1964 को गुरू दुनिया छोड़ गए. गीता का सब कुछ ख़त्म हो गया. वो गहरे अवसाद में चलीं गयी. जब थोड़ा होश आया तो पता चला, सिर्फ पति ही नहीं खोया, सब कुछ चला गया है. माली हालात भी ख़राब थी. खुद से ज़्यादा उन्हें बच्चों की फ़िक्र हुई. स्टेज पर गाने लगी. प्राइवेट डिस्क कटवाने लगी.

संगीतकार कानू रॉय ने बासु भट्टाचार्य की 'अनुभव' (1971) में गाने की पेशकश की. डूबते को तिनके का सहारा. मेरी जां मुझे जां न कहो...कोई चुपके से आके...मेरा दिल जो मेरा होता...मस्त गाने. फिर चर्चा में आ गयी गीता. लगा सुनहरे दिन लौट आये हैं. लेकिन निगोड़ी बोतल न छूटी. उस दिन रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया गया. जवाब मिला, तबियत ख़राब है. और अगले ही दिन 20 जुलाई को वो चल बसीं. बताया गया कि उन्हें लीवर की लाईलाज बीमारी थी. तब तक वो 42 की भी नहीं हुईं थीं. क्रिएटिव आर्टिस्टों का यों प्री-मच्योर गुज़र जाना बहुत बड़ी ट्रेजेडी ही होती है, दिल बेचैन हो उठता है. 

गीता दत्त ने आज ही के दिन 1972 में अपना सफ़र पूरा किया ऐसी नायाब गायिका को News Number परिवार उनकी पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

बद से बदनाम बुरा और जब किसी सरकार पर संस्थानों और शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगने लगे तो उसके नेता का इकबाल खत्म हो जाता है।

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यकीनन किसी भी भारतीय के मन में अपने इर्दगिर्द के माहौल को देखकर यह सवाल पूछने का मन करता होगा " हम बेईमान क्यों है" ...

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NRC भारत सरकार द्वारा लागू अधिनियम और इसी के साथ आसाम राज्य में फैली अराजकता। दो साल बाद एक बार फिर चर्चा में है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस विषय पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अचानक एक आंदोलन खड़ा हो गया था जिसमे कहा गया कि भारतीय उत्तर पूर्व के राज्य आसाम में लाखो बांग्लादेशी नागरिक घुस चुके है और वहां की डेमोग्राफी तथा आर्थिक हालात पर असर डाल रहे है। राजीव गांधी के कार्यकाल में आसाम के आंदोलन कर रहे छात्रों तथा भारत सरकार के बीच एक सहमति बनी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नेशनल सिटिज़न रजिस्टर बनाने की रूपरेखा तैयार की गई। ...

फिल्मी दुनिया के seven wonders की बात की जाए तो उसमें एक नाम घूंघट की बीनाराय का जरूर आएगा।

वास्तु शिल्प से लेकर अलग अलग क्षेत्रो में कुछ ना भूलने लायक पहलू होते है जैसे भारत का ताजमहल जिसको शब्दो मे परिभाषित करना सम्भव ही नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ ऐसे ही चेहरे हुए हैं जिन्हे कभी भुलाया नही जा सकता और यदि फिल्म जगत के seven wonders की बात होगी तो निश्चित रूप से उसमे बीनाराय का नाम जरूर आएगा। ...

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं।

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं एक ऐसी ही गायिका जो लाहौर में जन्मी और मुंबई में अंतिम आरामगाह में सो गई। ...

किसान आंदोलन एक नई करवट लेता हुआ जिसके बाद शायद बहुत कुछ बदल सकता है।

यदि पंजाब से उठे किसान आंदोलन को भी जोड़ दिया जाए तो किसानों को घरों से निकल कर सरकार के आगे आंदोलन करते हुए लगभग एक साल हो चुका है और यह भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा किए गए पगड़ी सम्भाल जट्टा आंदोलन का भी रेकॉर्ड तोड़ चुका है। ...

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। बैल हमारा बाप है, इज्जत देना पाप है ! ।

भारत एक देश जिसकी प्रतिभाओं को नासा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर पूरी दुनिया में पहचाना जाता था और दुनियां कद्र करती थी कि भारतीय किसी भी पद पर कार्य करते हो या अपना कारोबार या सर्विस सेक्टर में हो अपना काम बुद्धिमानी और मेहनत से करते है। फिर धीरे धीरे ब्रेन ड्रेन शुरू हुआ और सबसे पहले पंजाब फिर अन्य राज्यों से युवा विदेशो में जाने लगे, विदेशी सरकारें भी जानती थी कि विकास के लिए भारतीयों को बसाना घाटे का सौदा नहीं है लेकिन खुद भारत वासी भूल गए कि जब सभी चले जाएंगे तो यहां बाकी क्या रहेगा ? ...