एक चुटकी सिंदूर की कीमत सुनते ही जो चेहरा याद आता है उसका नाम है राजेश खन्ना। भारतीय सिनेमा का पहला सुपर स्टार।

भारतीय सिनेमा का युग वैसे तो दादा साहब फाल्के और सोहराब मोदी से लेकर पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार से होता हुआ यहां तक पहुंचा है लेकिन अभी को जनता द्वारा व्यापक समर्थन मिलने के बावजूद किसी को सुपर स्टार नहीं कहा गया।

ये है 1942 में जन्मा एक ऐसा कलाकार मुंबई पहुंचा जिसकी हेयर स्टाइल और पैंट्स के उपर कुर्ता पहनना एक ट्रेंड बन गया। उस कलाकार को दुनिया राजेश खन्ना के नाम से जानती है। उनके देहावसान के दिन की व्यथा विनोद छाबड़ा के शब्दो मे।


आज से आठ साल पहले, आज ही के दिन. हम टीवी के सामने बैठे थे. रिमोट हाथ में था. एक चैनल से दूसरा चैनल. और फिर तीसरा और चौथा चैनल. सरफिंग कर रहे थे. हाथ नहीं रुक रहा था. हर चैनल पर एक ही ख़बर थी - सुपर स्टार राजेश खन्ना - स्मृति शेष.

हम इस उम्मीद में थे कि शायद कोई चैनल बता दे - नहीं, ये गलत खबर है. ये तो रंगमंच है. एक शो खत्म, अब दूसरा शो शुरू होगा.  लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमने माथा पीट लिया. अमां, ये भी कोई वक़्त है जाने का. 

... हमारे सामने वो नज़ारा बार बार तैरने लगा जब राजेश खन्ना की कोई फिल्म रिलीज़ नहीं हुई थी. हम उनके साथ बैठ कर बंबई के फेमज सिनेलैब में 'राज' का प्रीव्यू देख रहे थे. तब हम महज़ सत्रह बरस के थे. शो खत्म हुआ तो उन्होंने हमसे हाथ मिलाया था और पूछा था - कैसे लगे हम? 

अब कोई सामने से पूछ रहा है कि हम कैसे लगे? तो हम क्या कहते? तारीफ़ ही करनी थी  - बहुत अच्छे लगे. 

एक खास अदा से उन्होंने हमें मुस्कुरा कर शुक्रिया कहा था. उसी दिन से वो हमारी आंखों में ही नहीं दिल और दिमाग पर भी काबिज़ हो गए थे. हमने उनकी हर फिल्म देखी. कई फ़िल्में तो बार-बार....  

टीवी पर उनकी मौत की ख़बर देखते हुए बीच बीच में हमारी आंखें बार बार कलम को देख रही थीं. हम उन पर कुछ लिखना चाहते थे. लेकिन कलम उठ नहीं रही थी. पिछले तक़रीबन बारह साल से हमने एक भी आर्टिकल नहीं लिखा था.

लेखन की दुनिया से संपर्क भी टूट चुका था. घर से दफ्तर और दफ्तर से घर. बाबूगिरी करते रहे. फाईलों पर क़लम घिसते रहे. रिटायर हुए भी डेढ़ साल हो चुका था. मूवमेंट के नाम पर घर से बैंक तक. ज्यादा ब्याज के फेर में इस बैंक से पैसा निकाला और दूसरे बैंक में डाल दिया. तय कर चुके थे कि कभी नहीं लिखेंगे, बस पढ़ेंगे और टहलेंगे

.  लेकिन इस राजेश खन्ना नामक शख्स की मौत ने हमें बहुत अंदर तक हिला दिया. हम कुछ लिख कर उनके आख़िरी सफ़र के हिस्सेदार बनना चाहते थे.

आख़िरकार उठ ही गई क़लम. लिख डाला 42 साल पहले के उस मंजर को, जब हमने उनको पहली बार देखा था. 'हिन्दुस्तान' के दफ़्तर पहुंचे. शाम छह बजे थे. व्यस्त संपादक नवीन जोशी ने लेख देखा और बोले - ठीक टाईम पर आये हैं. 

दूसरे दिन छप गया लेख. उन्हे कई फ़ोन आये. एक ने कहा - बधाई. बहुत अच्छा लगा कि तुम अख़बारों की दुनिया में लौट आये.  
हमने कहा - काहे की बधाई? हम तो जाने वाले के ग़म में डूबे हैं. 

यह दुनिया वाकई रंगमंच है. हंसी भी और ग़म भी. दोनों साथ साथ. है न ट्रेजडी! वो तो ब्रह्मलीन हो गए, लेकिन जाते-जाते हमें जगा गए. तब से हम लगातार लिख ही रहे हैं. और इस बीच शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रा हो जब सबने राजेश खन्ना को दिल से याद न किया हो. 

News Number परिवार ऐसे महान कलाकार की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
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बद से बदनाम बुरा और जब किसी सरकार पर संस्थानों और शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगने लगे तो उसके नेता का इकबाल खत्म हो जाता है।

भारत या कोई भी लोकतांत्रिक देश हो वहां सरकारों के अतिरिक्त अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी होती हैं और व्यवस्था स्थापित करने के लिए कई स्वतंत्र विभाग भी होते है जिससे सभी के सभी काम ईमानदारी से चलते रहे एवम् जम कल्याण तथा विकास कार्यों में कोई बाधा न हो। ...

कूटनीति, मोदी सरकार और दुशांबे सम्मिट ! SCO बैठक का विश्लेषण एवम् भारतीय प्रधानमंत्री का संबोधन।

आज समाप्त होने वाली शंघाई सहयोग संगठन की शिखर मीटिंग में भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा वर्चुयल संबोधन प्रसारित किया गया। संगठन एवम् कूटनीति का अपने विचारो के अनुसार विश्लेषण करने का प्रयास। ...

कनाडा और भारत दुनियां के दो ऐसे देश है जहां बहुत सी सभ्यताएं बसती हैं और साथ साथ चलती हैं दूसरी समानता यह है कि पंजाबियों ने अपने खान पान से सबको प्रभावित किया है।

भारत बेशक विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का संगम है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत ( विशेषकर गौ पट्टी क्षेत्र ) को खाने की विविधता और स्वाद पंजाब ने ही दिया है। ...

गणपति बप्पा मोरया । आजकल भारत में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है जिसे आज़ादी के संग्राम के समय पब्लिक मीटिंग्स के लिए बहाने के तौर पर शुरू किया गया था।

गणपति बप्पा मोरया । आजकल भारत में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है जिसे आज़ादी के संग्राम के समय पब्लिक मीटिंग्स के लिए बहाने के तौर पर शुरू किया गया था। लेकिन कालांतर में यह धार्मिक आयोजन और आस्था का अटूट अंग बन गया। क्योंकि दक्षिण एशिया की संस्कृति में भावनात्मकता का पुट अधिक होता है और सदियों तक आश्रित रहने वाली नस्लों को हमेशा किसी चमत्कारिक लाभ की उम्मीद रहती हैं इसीलिए पीर फकीर से लेकर विभिन्न आस्थाओं का बोलबाला है। गणेश चतुर्थी जो कभी महाराष्ट्र में मनाई जाती थी अब उत्तर भारत के अधिकांश बड़े शहरों में मनाया जा रहा है। यहां तक कि पंजाबी समुदाय भी अब गणेश प्रतिमा स्थापित करने लगा है बेशक गणपति के पीछे का दर्शन ना जानते हो। ...

सुधा मूर्ति ! यदि इंफोसिस फाउंडेशन का नाम सुना होगा तो उसकी चेयर पर्सन को भी जरूर जानते होंगे ! आज उनके पिता को जानिए।

इंफोसिस फाउंडेशन भारत की शान कहीं जा सकती और इसकी चेयर पर्सन मैडम सुधा मूर्ति की समाज सेवा एवम् विद्धता को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है लेकिन इसके पीछे निसंदेह उनके पारिवारिक संस्कार है जो उन्हे उनके पिता से मिले होंगे। मैडम सुधा मूर्ति के पिता डॉक्टर रामचंद्र कुलकर्णी के जीवन की एक घटना। ...

पंजाबी भाषा की फिल्मों में नानक नाम जहाज है का रेकॉर्ड आज तक कायम है और उसके साथ ही "पासा पुट्ठा पै गया" डायलॉग भी याद होना चाहिए।

हिन्दी सिनेमा के अतिरिक्त पंजाबी भाषा में भी कई फिल्में बनी और उस कड़ी में नानक नाम जहाज है नामक फिल्म की सफलता ने जो झंडे फहराए वो आज तक किसी दूसरी फिल्म के भाग्य में नहीं आया। उस फिल्म के मोहम्मद रफी की आवाज़ के गाए गए शब्द आज भी आत्मिक सुख देते हैं लेकिन एक चरित्र और याद आता है जिसका "पासा पुट्ठा पै गया" बोलना कभी नहीं भूलता। ...

जिस प्रकार प्रत्येक शहर की पहचान के साथ किस न किसी भवन से बताई जाती है वैसे ही दिल्ली को कुतुब मीनार और लोट्स टैम्पल से पहचाना जाता है।

प्रत्येक शहर की पहचान के साथ वहां के किसी न किसी भवन को जोड़कर देखा जाता है जैसे आगरा को ताजमहल और दिल्ली को कुतुब मीनार तथा लोटस टैंपल से पहचाना जाता है। लेकिन लोटस टैंपल देखने जाने वाले विजीटर्स के मन में यह विचार अवश्य आता होगा कि यह कैसा मन्दिर है जिसमे देखने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि यह बहाई संप्रदाय का पूजा स्थल है। बहाई संप्रदाय के सम्बन्ध मे मनीष सिंह की रिपोर्ट। ...

Dismentaling Global Hindutva ! अमेरिका में 50 विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विवाद क्यो हुआ ?

10 सितम्बर से 12 सितम्बर तक तीन दिन का एक वर्चुअल सम्मेलन आयोजित किया गया जिसे C oHNA ने Dismentaling Global Hindutva के नाम से आयोजित किया। वाशिंगटन पोस्ट तथा अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस सम्मेलन पर व्यापक रिपोर्टिंग करते हुए कई आलेख प्रकाशित किए यद्धपि भारत में इसकी चर्चा भी नहीं हुई। ...

जुल्फिकार अली भुट्टो! दक्षिण एशिया का ऐसा राजनेता जिसके नाम पर आज भी राजनीति होती हैं बेशक उसकी सोच से कोई सहमत हो या न हो।

जिवें सिंध ते जीवें भुट्टो के नारे के साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी आज तक राजनीति करती हैं बेशक जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया था और बीबी बेनजीर भुट्टो को शहीद कर दिया गया था। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान टूटने के बाद अपने देश को भुट्टो ने नई दिशा दी और मनोबल टूटने नहीं दिया। ...

हिन्दी दिवस! भाषा की आड में संस्कृति बदलने की कवायद।

14 सितम्बर जिसे हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है और इससे अधिक हास्यास्पद क्या होगा कि वो सभी हैप्पी हिंदी डे बोलने लगते है जिन्हे उन्यासी और नवासी का अंतर भी मालूम नहीं होता तथा जो अपने बच्चो को कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए जमीन आसमान एक किए रहते है बेशक वहां हिंदी बोलने की सख्त मनाही हो। ...

क्रान्ति होती हैं, जनता द्वारा की जाती है लेकिन उस क्रांति को खड़ा करने और लक्ष्य तक पहुंचाने के पीछे जनता नहीं होती।

क्रांतियां होती हैं और आज के अधिकांश देशों के निर्माण के साथ किसी न किसी क्रांति का नाम जुड़ा हुआ है तथा साथ ही क्रांति लाने वाले नेता का भी। किन्तु उन क्रांतियों के पीछे कोई सार्थक उद्देश्य रहे थे और उनका नेतृत्व किसी सक्षम व्यक्ति के हाथ में था। परन्तु यदि भीड़ के लिए कोई अराजकता खड़ी करनी हो तो योजनाकार क्या करते हैं ? ...

पीचे देखो पीचे , पीचे तो देखो उधर भी आग लगी है और उसकी चिंगारी बी नुकसान पहुंचा सकती है।

एक महीने से अधिक हो चुका है जब काबुल से तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी देश से भाग गए थे और तालिबान ने काबुल फतेह कर लिया था। उसके बाद से आजतक भारतीय मीडिया एवम् विचारक केवल अफगानिस्तान केंद्रित खबरे तथा विश्लेषण कर रहे है। ...

9/11 जिसे आतंकी घटना से लेकर यूएस अंडर अटैक बोला गया एक कभी ना सुलझने वाली उलझन है।

बीस साल पहले अचानक दुनियां भर को दहलाने वाली खबरे चलने लगी और उसे इतिहास 9/11 के नाम से जानती है, इसी घटना के बाद इराक़ हमला हुआ, अफगानिस्तान पर कार्पेट बंबिंग हुई और नाम मिला वार अगेंस्ट टेरर किन्तु जो सवाल खड़े हुए वो आज भी जवाब मानते है।। ...

हम बेईमान क्यो कहलाते है ? क्योंकि हमारे नेता, हमारे अधिकारी और हम खुद बतौर एक वोटर, ईमानदार नहीं है।

यकीनन किसी भी भारतीय के मन में अपने इर्दगिर्द के माहौल को देखकर यह सवाल पूछने का मन करता होगा " हम बेईमान क्यों है" ...

हिंदुस्तान ! धरती का एक ऐसा हिस्सा जिसे multi wonder land कहना ज्यादा ठीक होगा।

हिंदुस्तान या भारतीय उपमहाद्वीप ? दक्षिण में कन्या कुमारी से लेकर हिंदुकुश पर्वतमाला तक फैला हुआ असंख्य बोलियों, आस्थाओं और संस्कृतियों का संगम। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी अतुलनीय। इतिहास का परिचय कराने वाली इस श्रंखला की शुरुआत करते हैं राजस्थान के उदयपुर स्थित दुर्ग कुंभलगढ़ से जिसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती ...

भारत और पाकिस्तान एक ही देश के दो टुकड़े और परम्परागत युद्ध के साझीदार ।

भारत और पाकिस्तान दो संप्रभु देश है बेशक कुछ समय पहले तक एक ही भूभाग और एक ही देश होते थे। एक बार जनरल अयूब खान ने नेहरू जी के आगे प्रस्ताव रखा था कि दोनों देश चाहें तो संयुक्त सेना रख सकते है जिससे काफी बचत होगी, उनके जवाब में नेहरू जी ने कहा कि यदि ऐसा हुआ तो फिर युद्ध किससे होगा ? बेशक आम जनता युधोंमाद में एक दूसरे को शत्रु समझने लगती हैं लेकिन प्रोफेशनल आर्मी के लिए लड़ाई लडना भी एक कार्य है बाकी तो जनता के लिए भावनात्मक नारे लगाए हैं। आज पाकिस्तान सेना दिवस मना रहा है, इसी अवसर पर एक भारतीय सैनिक की कहानी जिसका अपना अलग ही रेकॉर्ड बना था ...

NRC भारत सरकार द्वारा लागू अधिनियम और इसी के साथ आसाम राज्य में फैली अराजकता। दो साल बाद एक बार फिर चर्चा में है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस विषय पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अचानक एक आंदोलन खड़ा हो गया था जिसमे कहा गया कि भारतीय उत्तर पूर्व के राज्य आसाम में लाखो बांग्लादेशी नागरिक घुस चुके है और वहां की डेमोग्राफी तथा आर्थिक हालात पर असर डाल रहे है। राजीव गांधी के कार्यकाल में आसाम के आंदोलन कर रहे छात्रों तथा भारत सरकार के बीच एक सहमति बनी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नेशनल सिटिज़न रजिस्टर बनाने की रूपरेखा तैयार की गई। ...

फिल्मी दुनिया के seven wonders की बात की जाए तो उसमें एक नाम घूंघट की बीनाराय का जरूर आएगा।

वास्तु शिल्प से लेकर अलग अलग क्षेत्रो में कुछ ना भूलने लायक पहलू होते है जैसे भारत का ताजमहल जिसको शब्दो मे परिभाषित करना सम्भव ही नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ ऐसे ही चेहरे हुए हैं जिन्हे कभी भुलाया नही जा सकता और यदि फिल्म जगत के seven wonders की बात होगी तो निश्चित रूप से उसमे बीनाराय का नाम जरूर आएगा। ...

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं।

ले के पहला प्यार और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का.... कुछ आवाजें दिल की गहराई तक संगीत का अहसास करा देती हैं एक ऐसी ही गायिका जो लाहौर में जन्मी और मुंबई में अंतिम आरामगाह में सो गई। ...

किसान आंदोलन एक नई करवट लेता हुआ जिसके बाद शायद बहुत कुछ बदल सकता है।

यदि पंजाब से उठे किसान आंदोलन को भी जोड़ दिया जाए तो किसानों को घरों से निकल कर सरकार के आगे आंदोलन करते हुए लगभग एक साल हो चुका है और यह भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा किए गए पगड़ी सम्भाल जट्टा आंदोलन का भी रेकॉर्ड तोड़ चुका है। ...

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। बैल हमारा बाप है, इज्जत देना पाप है ! ।

भारत एक देश जिसकी प्रतिभाओं को नासा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर पूरी दुनिया में पहचाना जाता था और दुनियां कद्र करती थी कि भारतीय किसी भी पद पर कार्य करते हो या अपना कारोबार या सर्विस सेक्टर में हो अपना काम बुद्धिमानी और मेहनत से करते है। फिर धीरे धीरे ब्रेन ड्रेन शुरू हुआ और सबसे पहले पंजाब फिर अन्य राज्यों से युवा विदेशो में जाने लगे, विदेशी सरकारें भी जानती थी कि विकास के लिए भारतीयों को बसाना घाटे का सौदा नहीं है लेकिन खुद भारत वासी भूल गए कि जब सभी चले जाएंगे तो यहां बाकी क्या रहेगा ? ...