यदि दक्षिण भारत को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान में सिर ढकना आदर और अदब माना जाता रहा है। टोपियों का इतिहास !

वैसे तो सदियों से उत्तर भारत की सभ्यताओं में विध्यांचल से लेकर हिंदुकुश तक सिर ढकना सम्मान एवम् संस्कृति का हिस्सा रहे है लेकिन पहले पगड़ी के नाम पर लंबा कपड़ा लपेट लिया जाता था फिर टोपियां प्रचलन में आई जिनके विभिन्न प्रकार प्रचलन में हैं। उसी की रोचक जानकारी एवम् इतिहास।

दिल्ली से क़रीब दो सौ बरस पहले एक मुग़ल शहज़ादा दो पल्ले की मसलिन की टोपी लगाकर लखनऊ आया और दोपलिया टोपी पर लखनऊ फ़िदा हो गया।लखनऊ ने जो दोपलिया टोपी बनानी शुरू की वो हाथ की सिली हुई चिकनकारी की सूती दोपलिया टोपियाँ थीं जो बिल्कुल हल्की थीं और टोपी पर हाथ का चिकनकारी का काम था।इन टोपियों पर सोने के तारों और चांदी के तारों से भी कशीदाकारी होती।दोपलिया टोपी नुक्केदार भी होती थी जो बीच में से ज़रा सी दबी होती थी और आगे-पीछे कोने उठे होते थे।पहले लखनऊ की दोपलिया टोपी नमाज़ पढ़ने की इस्लामी टोपी नहीं थी,हिंदू हो या मुसलमान,सब लखनऊ की पहचान दोपलिया टोपी को सिर पर धारण करते।बाद में मुसलमानों से ये टोपी जुड़ गई,वजह कि हिंदुओं ने टोपी लगाना छोड़ दिया और मुसलमानों ने नमाज़ पढ़ने की वजह से टोपी को अपनाये रखा।

लखनऊ में दोपलिया टोपी आने से पहले चौकोर चौगोशा टोपी का चलन था जो उज़बेकिस्तान के फ़रग़ना से बाबर की सेना के साथ आयी और लखनऊ में ऐसी मशहूर हुई कि हर सिर पर चौगोशा टोपी देखी जाती।नवाब वाजिद अली शाह ने एक टोपी ईजाद की थी जो कार्डबोर्ड से बनती और विशेष रूप से नवाब जिसका सम्मान करते उसे वो टोपी पहना देते,उस टोपी का नाम आलमपसंद टोपी था।

ख़ैर,मुसलमानों की टोपियों की बात की जाए तो रामपुर रियासत की टोपी भी बहुत मशहूर थी जो वेल्वेट की होती।वेल्वेट को उस दौर में ख़ास सम्मान हासिल था,वेल्वेट की काली टोपियाँ देखने में भली लगतीं और बहुत नर्म होतीं।

जब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था और ख़िलाफ़त मूवमेंट का दौर आया तो तुर्की टोपी मुसलमानों के बीच बहुत मशहूर हुई जो लाल रंग की होती और उसके पीछे एक फु़ंदना लगा होता।हैदराबाद रियासत में और लखनऊ के शिक्षित और एलीट मुसलमानों के बीच तुर्की टोपी का चलन ज़्यादा था।हैदराबाद रियासत ने तो इस टोपी को एक तरह से अपनी राजकीय टोपी का दर्जा दिया हुआ था क्योंकि वहाँ के कर्मचारियों को ऐसी टोपी पहनाना अनिवार्य था।जोश मलीहाबादी जब हैदराबाद में नौकरी करने गए तो उनसे भी तुर्की टोपी धारण करने के लिए कहा गया,जोश ने मना किया तो कहा गया कि नौकरी करनी है तो टोपी पहननी पड़ेगी,लिहाज़ा जोश ने मजबूरी में तुर्की टोपी पहन ली,क्योंकि उन्हें नौकरी करनी थी।मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने तुर्की टोपी पर जब अपने यहाँ रोक लगायी तो धीरे-धीरे तुर्की टोपी चलन से बाहर हो गई।

आजकल जो जालीदार टोपी मुसलमानों के सिर पर दिखती है उस टोपी का नाम तकियाह है,ये अरब से आयी टोपी है।पहले बकरी के बाल से ये जालीदार टोपी बिनी जाती और इस दौर में धागे से बुनी जाती है।

तुर्की से लाल ख़िलाफ़त टोपी आने से सदियों पहले एक टोपी मुग़लिया दौर में आयी थी जो अक्सर मुग़ल बादशाहों के सिर पर भी रहती और क्योंकि राजपूतों का मुग़लों के साथ राजकाज में संबंध था तो उन्होंने भी इस टोपी को धारण किया,वो टोपी नज़र टोपी कहलाती,एक तरह की बनी-बनाई पगड़ी जैसी होती और उसमें आगे नीले रंग का नगीना लगा रहता।

मौलाना रूम के अनुयायियों ने सिक्के-कुलाह नाम की लंबी टोपी को मुस्लिम वर्ल्ड में प्रचलित किया और वो टोपी हिंदोस्तान भी आयी,उस टोपी को ख़ासतौर से सूफ़ी अपने सिर पर धारण करते,मौलाना रूम की टोपी तीन-चार बालिश्त तक ऊँची होती।मिर्ज़ा ग़ालिब जैसी नुकीली टोपी लगाते वो मध्य एशिया में पहनी जाने वाली टोपी थी।जाड़े के मौसम में कारकुली टोपी लगाने का चलन पुराने दौर से है,ये वही टोपी है जैसी पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह लगाते थे और फ़ारूक अब्दुल्ला लगाते हैं।कारकुली टोपी कश्मीरी टोपी होती है लेकिन ये उज़्बेकिस्तान के कारकुल शहर से आयी जो बुख़ारा के इलाक़े में है,कारकुल एक भेड़ की प्रजाति है और उसी प्रजाति के नाम पर उस शहर का नाम कारकुल है,कारकुली टोपी उसी भेड़ के बाल से बनी टोपी होती जो कश्मीर में आकर दूसरे किस्म के भेड़ों के बाल से बनने लगी।

हिंदोस्तान में सिर्फ़ पुरूष ही टोपी धारण करते हैं लेकिन तुर्कमेनिस्तान समेत कई देशों में महिलाएं भी सिर पर नमाज़ की टोपी लगाती हैं जो पुरूषों की टोपी से भिन्न होती है,यहाँ महिलाओं की टोपी चलन में नहीं आ सकी,पुराने दौर में बस कव्वाली के मुक़ाबलों में कव्वाल महिलाएं टोपी लगाया करतीं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने एक नई टोपी ईजाद की और वो टोपी थी शेरवानी के साथ की टोपी जो उसी रंग की और उसी कपड़े की होती है जिस रंग की शेरवानी होती है,इस टोपी की सिलाई रामपुरी वेल्वेट की टोपी की तरह होती है।जो खद्दर की गाँधी टोपी है उसे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हकीम अजमल ख़ान चलन में लाए,हकीम अजमल ख़ान रामपुरी टोपी लगाते थे,उन्होंने पहली बार रामपुरी टोपी जैसी खद्दर की टोपी बनवायी और पहनी जो गाँधीजी को पसंद आयी और खद्दर की टोपी का चलन कांग्रेस में हो गया।

दक्षिण भारत के मुसलमानों में ओमानी टोपी का चलन ख़ूब है जो हाथ के काम की गोल टोपियाँ होती हैं,क्योंकि समुद्री मार्ग से पुराने दौर में दक्कन में व्यापार होता और ओमान के व्यापारी ख़ूब आते लिहाज़ा उनके द्वारा पहनी जाने वाली ओमानी टोपी दक्षिण में ख़ूब प्रचलित हुई।बहरहाल,मुसलमानों में सिर पर धारण करने की टोपियाँ बहुत हैं,कई टोपियाँ तो फ़िरक़े के हिसाब से भी होती हैं और सब में ज़रा-ज़रा सा अंतर होता है।

यद्धपि पंजाब में पर्सियन संस्कृति का प्रभाव ज्यादा रहा लेकिन फिर भी वहां टोपी का प्रचलन पगड़ी का स्थान नहीं ले पाया बेशक वृहद पंजाब के हरियाणा से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक आज भी पगड़ी सम्मान का प्रतीक है और सिख समुदाय के लिए तो पगड़ी गुरु का आशीर्वाद स्वरूप होती जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।

शायद सिर ढकने के पीछे इंसान को यह अहसास कराना रहा होगा कि उसके सिर पर कर्तव्यों का बोझ है और उस वजन से उसका सिर नीवां ते मत उच्चि रहनी चाहिए ।

Exile of peace ! शान्ति की धुरी भारत लेकिन यदि भारत सरकार विश्व शांति की नीतियां लागू करे तो !

यदि याद हो तो पहले चाबी से चलने वाली घड़ियां होती थी जिनका अहम पुर्जा एक्सिल कहलाता था। यद्धपि एक्सिल को हिंदी में धुरी कहा जाता है लेकिन घड़ी में इसी पुर्जे से समय की गति तय होती थी और इसमें लगे स्प्रिंग को चाबी भरकर चलने की शक्ति मिलती थी। ...

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वैश्विक शक्तियों की कठपुतली बनते दक्षिण एशिया में अशांति की लहर आने की आशंका !

मिडल ईस्ट के तेल भंडार, तानाशाही सल्तनत के नाम पर काबिज परिवार और सीरिया, लेबनान, यमन से लेकर मिस्र तक फैली अशांति एवं गृह युद्ध या गृह युद्ध जैसे हालात। ...

जलेबी का सिरा और वर्तमान भारत सरकार की विदेश नीति एकदम सीधी होती हैं लेकिन नजर नहीं आती।

दक्षिण एशिया में शायद सबसे अधिक बिकने वाली मिठाई का नाम "जलेबी" हैं जिसे फनल स्वीट भी कहा जाता है और फ़नल का अर्थ यदि गलत नहीं है तो पाइप जैसा कुछ होता है जिसमे घुसने के बाद वापिस मुड़ना आसान नहीं होता और निकलने के लिए दूसरे सिरे तक खुद को धकेलना मजबूरी होती हैं। ...

गुरु रामदास सह होई सहाय । चौथे नानक और श्री अमृतसर साहब के निर्माता गुरु रामदास जी के प्रकाश उत्सव दिया लख लख बधाइयां।

गुरु रामदास सह होई सहाय। सिख परम्परा के चौथे गुरु श्री गुरु रामदास जी के गुरु पर्व पर विशेष। ...

Failure State ! कश्मीर से लेकर दिल्ली बॉर्डर तक भारत सरकार की विफलता का सबूत ?

लगभग एक साल होने को है और भारत सरकार द्वारा खेती कानूनों का विरोध कर रहे भारत के ही किसानों को दिल्ली की सरहदों पर रोक कर उन्हे वहां मोर्चा लगाने के लिए मजबूर किया हुआ है। ...

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भारतीय पंजाब को कश्मीर बनाने की साज़िश या किसी अनहोनी की आशंका !

अचानक लिए गए निर्णय के अनुसार भारतीय पंजाब के सीमा से 50 किमी रेडियस में बीएसएफ को अतिरिक्त शक्तियां देते हुए अधिकार दिए गए हैं जिसके अनुसार बीएसएफ कर्मी/अधिकारी किसी को भी गिरफ्तार कर सकते है, तलाशी ले सकते हैं और जांच पड़ताल कर सकते है। ...

ज्यूं ज्युं तेरा हुक्म है ......

1923 का हिंदुस्तान और जबर ब्रिटिश साम्राज्य ! रियासत नाभा के रीपुदमन सिंह को गद्दी से हटाने के विरूद्ध गंगसर जैतो में मोर्चा लगा और सरकारी ट्रेन से अहिंसक आंदोलन कर रहे सिखो को कुचल दिया गया कुछ ऐसे ही जैसे थार और फॉर्चूनर गाड़ियों के नीचे लखीमपुर के किसानों को कुचला गया है। ...

रेखा भारतीय फिल्म जगत का जीता जागता करिश्मा ! जन्मदिन पर विशेष बेशक इनके लिए ही कहा जाता है कि उम्र सिर्फ गिनती भर है।

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शीर्षक है कि क्या भारतीय विदेशनीति अपनी आज़ादी किसी बाहरी शक्ति के इशारों पर नाचने लगी है या क्या वर्तमान सरकार विदेशी मामलों में कोई दृढ़ एवम् स्पष्ट निर्णय लेने में अक्षम साबित हो रही हैं। ...

भारत की बिगड़ती कानून व्यवस्था एवम् मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होने के बावजूद बीजेपी सरकार तथा नौकरशाही द्वारा किया जा रहा अमानवीय व्यवहार।

यद्धपि News Number आमतौर पर सनसनी फैलाने वाली या अपराधिक घटनाओं की विवेचना से परहेज़ करता है लेकिन कभी कभी कुछ वाकयात जब दिल दिमाग को झिंझोड़ते हैं तो साझा करना पत्रकारिता का धर्म बन जाता हैं। ...

इक चतुर नार, करके सिंगार, मेरे दिल के द्वार ओ घुसत जात......... भारतीय सिने जगत के अनमोल सितारे महमूद को जन्मदिन मुबारक।

कलाकार की कला से कला और कलाकार को सम्मान देने की परम्परा भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का एक प्रशंसनीय कदम रहा है। हीरो, हीरोइन, विलेंस की लंबी फेहरिस्त में कुछ नाम ऐसे भी हुए हैं जो फिल्मों के नहीं अपितु फिल्में उनके लिए बनती थी। ...

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अल्लाह अल्लाह खैर सल्लाह और इसी के साथ 2021 का संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली का अधिवेशन सम्पूर्ण हुआ लेकिन अपने जीवन काल के अंतिम चरण में भविष्य के बहुत से संकेतो को स्पष्ट कर गया जिन्हे भारत पाकिस्तान या उपमहाद्वीप की शांति, सुरक्षा के दृष्टिकोण से समझना जरूरी हैं। ...

तेजी से बदलती भारतीय राजनीति या वैश्विक राजनीति के अनुसार नई दिशाएं एवम् नए बदलाव !

द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही न्यू वर्ल्ड ऑर्डर लागू हुआ, दुनियां को दो हिस्सों में बांट दिया गया जिसमे जो भी मार्शल कौम थी उन्हे भी संस्कृति को नजरंदाज करते हुए टुकड़ों में बांट दिया गया बेशक वो पंजाबी हो या कुर्द, अज़री, बलोच या मुस्लिम। ...

पटियाला राजघराने के कैप्टन अमरिंदर सिंह और कांग्रेस द्वारा इन्हे सम्मान दिए जाने का छुपा कारण !

1947 अंग्रेज़ो को हिंदुस्तान से जाना पड़ा और तीन शर्तो के साथ ब्रिटिश इंडिया को आज़ादी प्राप्त हुई जिसमे एक तो मुल्क का बटवारा था और दूसरा लगभग 600 प्रिंसली स्टेटस को निर्णय लेने का अधिकार कि वो चाहें तो भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बने या आज़ाद रहे। ...

भगतसिंह ! साजिशों का शिकार रहा अद्भुत व्यक्तित्व।

लेनिन, चे ग्वेरा, मार्क्स से लेकर किसी भी क्रांतिकारी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए बिना किसी किसी परंतु के कहा जा सकता है कि भगत सिंह के विचार और कुर्बानी इनसे सबसे बहुत ऊंची थी क्योंकि भगत सिंह वो विराट नाम है जिसमे गांधी भी बसता था और गांधी को भी अपने दिलों दिमाग में भगत सिंह को बसाना पड़ा। ...