छद्म विश्व युद्ध का एशियाई थियेटर और भारत सरकार की नीतियां !

वर्तमान स्थितियों में चल रहे छद्म विश्व युद्ध के मैच में फिलहाल कोशिश की जा रही है कि गेंद दूसरे के पाले में कैसे धकेली जाए और कैसे नए सहयोग संगठन खड़े किए जाए जिनका अंत इस क्षेत्र में भारत में ही होने की सम्भावना है।

सबसे पहला प्रश्न तो यही उठता है कि विश्व युद्ध की परिभाषा क्या है ? क्या जिस प्रकार प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध हुए क्या उसी प्रकार फिर महाशक्तियों के नेतृत्व में सेनाए बम बारूद से इंसानों की बलि लेंगी या किसी अन्य बहानों से लक्ष्य पूरे किए जाएंगे ? अपनी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बेशक कुछ भी हो किन्तु कारण केवल आर्थिक थे और आर्थिक ही रहेंगे।

अभी गत दिनों की हलचल का विश्लेषण किस ओर इशारे करता है और इसका भारत पर या इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ने जा रहा है ? अमेरिका तथा नाटो फोर्सेज द्वारा बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के अफगानिस्तान से निकलना और अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्ज़ा ही फिलहाल परिस्थितियों का निर्माण कर रहे है।

इसके अतिरिक्त तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे में विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्री का बयान तथा उज़्बेकिस्तान में दो दिन की दक्षिण एशिया से सेंट्रल एशिया सम्मिट एवम् तालिबान द्वारा युद्ध विराम की शर्तो का खुलासा।

असामान्य स्थितियों की शुरुआत अफगानिस्तान से ही होती हैं जहां अफ़गान तालिबान द्वारा दावा किया जा रहा है कि उन्होंने देश के अधिकांश हिस्सों पर शासन संभाल लिया है लेकिन उनके द्वारा अफगानिस्तान के प्रवेश द्वारों या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर कब्जे की पुष्टि तो हो चुकी हैं जिसका नवीनतम समाचार पाकिस्तान का चमन बॉर्डर है।

इन्हीं सब घटनाओं के बीच भारत द्वारा अपने काउंसलेट ऑफिस बंद करने की खबरे प्राप्त हुई किन्तु कंधार के काउंसलेट ऑफिस में तालिबान का कब्ज़ा करके उसे आग लगा देने के वीडियो भारत के पक्ष मे नहीं जाते। इसी दौरान भारत सरकार पर अपने नागरिकों को निकालने के लिए भेजे गए विमानों से हथियारों की सप्लाई के आरोप भी भारत के विरूद्ध ही जाते है।

भारतीय विदेश मंत्री द्वारा किए गए ट्वीट मे उन्होने चीनी विदेशमंत्री से अपनी मुलाकात तथा शंघाई सहयोग सम्मेलन में अफगानिस्तान के सन्दर्भ में बिना नाम लिए पड़ोसी देशों द्वारा आतंकी सहयोग की चर्चा की है जो संकेत देता है कि भारत अभी तक अफ़गान तालिबान को आतंकी संगठन मानता है बेशक खुद अमेरिका ने उनसे समझौता किया है।

क्योंकि अफगानिस्तान में चीन और रूस का निवेश लगा हुआ है तो यदि भारत अफ़गान शांति की सफलता हेतु प्रयास नहीं करता तो इसे रूस और चीन का विरोध समझा जा सकता है जिसमें पाकिस्तान को चीन का ही हिस्सा समझना चाहिए।

पिछले दो दिनों में पाकिस्तान में घटित आतंकी घटनाओं के लिए भी भारत समर्थक शक्तियों को आरोपित किया जा रहा है जैसा कि इस क्षेत्र की परम्परा है और भारत एवम् पाकिस्तान ही एक दूसरे पर इल्ज़ाम तराशी करते रहते है।

इनका नकारात्मक प्रभाव क्या सम्भव है ? क्योंकि भारत की अफगानिस्तान से कोई सीमा नहीं मिलती तथा अफगानिस्तान लैंड लॉक देश है तो भारत के लिए व्यवहारिक तौर पर सम्भव नहीं लगता कि वहां किसी प्रकार की सैनिक दखल करना सम्भव होगा।

अफगानिस्तान के निकटवर्ती देशों में उज़्बेकिस्तान और तजाकिस्तान इतने सक्षम नहीं हैं कि रूस के हितों के विरूद्ध कोई कदम उठा सके, बाकी पाकिस्तान और ईरान में से पाकिस्तान तो भारत के समर्थन में तालिबान के विरूद्ध जा नहीं सकता और ईरान की भी सम्भावना कम लगती हैं।

यद्धपि अभी तालिबान द्वारा घोषणा की गई है कि वो तीन माह तक युद्धविराम समझौता कर सकते है यदि उनके 5000 कैदी रिहा कर दिए जाए तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा उन पर लागू प्रतिबन्ध हटा लिए जाए।

मूल प्रश्न वही खड़ा है कि यदि तालिबान सत्ता में आते हैं और भारतीय विदेश नीति निर्माता इसी नीति पर चलते हैं तो क्या यह भारत को नुकसान पहुंचा सकता है ?

बेशक ! भारतीय हितों में नहीं है कि भारत अपने विरूद्ध कोई शत्रु खड़ा करे विशेषतः जब कश्मीर और उत्तर पूर्व में विदेशी सहयोग से कोई चुनौती मिलने की आशंका हो। सम्भव है कि रूस के दबाव में ताजिकिस्तान अपने यहां दो भारतीय सैनिक अड्डों को बंद करने के लिए भी कह दे !

इसके अतिरिक्त उज़्बेकिस्तान में चलने वाली दो दिवसीय बैठक को भी ध्यान में रखा जा सकता है जिसमे पाकिस्तान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यह समझ लेना चाहिए कि दक्षिण एशिया के रास्ते सेंट्रल एशिया के देशों का सम्बन्ध दुनियां मे आर्थिक प्रगति की गारंटी है।

अफगानिस्तान एवम् इन विषयों पर News Number की ओर से लगातार अपडेट प्रकाशित की जाती रही है जो अभी तक के अनुभवों के आधार पर सत्य सिद्ध हुई हैं। इसी कड़ी में माना जाना चाहिए कि भारतीय विदेश मंत्री को पूर्वाग्रहों को छोड़कर देश हित में निर्णय लेने चाहिए।