बिना दर्द हुए दर्द महसूस करने और उसे बेखौफ होकर अल्फ़ाज़ देने का दूसरा नाम इस्मत चुग़ताई ही हो सकता है।

इंसान और इंसानियत वहीं है जो दर्द का अहसास तब भी कर सके जब उसे खुद को दर्द न हो रहा हो। हिंदुस्तान ने कला के क्षेत्र में दुनियां को बहुत से अज़ीम सितारों से नवाजा है और जब उनकी गिनती शुरू होती हैं तो प्रगतिशील लेखकों की सूची में इस्मत चुग़ताई जिन्हे सब इस्मत आपा के नाम से बुलाते थे, अपना अलग ही मुकाम रखती हैं।।

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बदायूं शहर में जन्मी इस्मत आपा का सफ़र यूं तो मुंबई में मुकम्मल हो गया था लेकिन इनकी कृतियों में वही दर्द और अहसास था ।

इस्मत चुग़ताई - खुद बदनामियां झेल कर औरत को उसका हक़ दिलाया 

लखनऊ में तारीख़ 14 अगस्त 2015 को मशहूर उर्दू लेखिका इस्मत चुग़ताई के जन्म शताब्दी समारोह के सिलसिले में इप्टा, लखनऊ ने 'महत्व इस्मत चुग़ताई'  हिंदी संस्थान में आयोजित कार्यक्रम की यादों के सहारे इस्मत आपा की जिंदगी के कुछ लम्हे।

 इस्मत आपा के अफ़साने 'लिहाफ़' ने अदबी दुनिया में ज़बरदस्त हलचल पैदा की. ये अफ़साना औरत की आज़ादी की बात तो करता ही है, पूरे समाज का रचनात्मक आत्मलोचन भी करता है.…उन पर उनके भाई अज़ीम बेग चुग़ताई का और उनके लेखन का ख़ासा असर था. लेकिन इस्मत ने अज़ीम बेग को पार करके उर्दू अदब में खुद को स्थापित किया.  ख़ुद अज़ीम बेग को भी इसका डर था. इस्मत कहती थीं कि क़लम मेरे हाथ में जब आ जाती है तो मैं लिखती ही जाती हूं.…वो 1947 में मुल्क़ की तक़सीम से पैदा हुए फ़सादात से गुज़रीं. तक़सीम मुल्क़ की ही नहीं हुई बल्कि अवाम के दिलों की भी हुई.…वो कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और सआदत अली मंटो की कड़ी हैं. प्रोग्रेसिव लेखन की अगुवा रहीं. उनका लेखन ऑटोबायोग्राफ़िकल रहा है. उनके अफ़साने बताते हैं वो किसी से भी बात कर लेती हैं. चाहे वो धोबी हो या मोची या सफ़ाई वाला या कामवाली बाई या अस्तबल का साइंस…

एक बार मंटो से किसी ने पूछा था कि अगर मंटो की शादी इस्मत से हो गयी होती तो? मंटो ने जवाब दिया था कि निक़ाहनामे पर दस्तख़त करते-करते उनमें इतनी लानत-मलानत होती कि यह वहीं टूट जाती.  

करामात हुसैन डिग्री कॉलेज की पूर्व प्रिसिपल और उर्दू की वरिष्ठ लेखिका सबीहा अनवर ने इस्मत आपा के साथ वक़्त वक़्त पर बिताये दिनों को भावुक अंदाज़ से याद किया. इस्मत आपा की राय बेहद बेबाक होती थी. उन्होंने दिखावटी बात नहीं की. प्रैक्टिकल, मुंहफट और आज़ाद ख़्याल. उन्हें दुनिया में होने वाली हर घटना की जानकारी लेने की फ़िक्र रहती. उस पर अपना नज़रिया ज़ाहिर करती…वो जब कभी लखनऊ आतीं तो मेरे घर ज़रूर आती, क़याम भी फ़रमाती. जब भी मिलीं बड़े ख़लूस से मिलीं. उन्हें मिलने, देखने और सुनने वालों का सिलसिला सुबह से शाम चला किया. भीड़ लगी रहती. वो बेबाक बोलने से बाज़ न आयीं

 कभी. उनकी शैली व्यंग्यात्मक रही. एक बार बोलीं कि मेरी मां को उसके दसवें बच्चे ने बिलकुल तंग नहीं किया क्योंकि वो पैदा होते ही मर गया....कोई न कोई कंट्रोवर्सी वाला बयान दे देतीं और फंस जातीं.

अख़बारनवीसों को तो इसी का इंतज़ार रहता था. एक दिन कह बैठीं कि मरने के बाद दफ़न करने के बजाये मुझे जलाया जाए.…जब मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा सोचा-समझ कर बयान दिया करें तो उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे जैसी समझदार नहीं हूं. जो दिल में है वही कहूँगी. मैं सच कहने से डरती नहीं…बहुत ज़िद्दी थीं वो. बोलने पर आतीं तो बेलगाम हो जातीं.

यादों का कभी ख़त्म न होने वाला ख़जाना था उनकी झोली में. अपने मरहूम शौहर शाहिद लतीफ़ और भाई अज़ीम बेग का बहुत ज़िक्र करतीं थीं. लेकिन दुःख साझे नहीं करतीं थीं.…'जुनून' की शूटिंग में मिलीं. मैंने पूछा कहां एक्टिंग में फंस गयीं.  तो बोलीं क्या जाता है मेरा? फ़ाईव स्टार होटल और शानदार खाना है. मौज मस्ती है.…चटपटे खाने की बहुत शौक़ीन थीं. खाते वक़्त खूब बातें करतीं थीं. एक बार मुझसे बोलीं, बड़ी मक्कार हो तुम. हस्बैंड को रवाना करके खूब बढ़िया-बढ़िया खाना खाती हो और गप्पें मारती हो.…छोटी-छोटी बातों का बहुत ध्यान रखतीं थीं. पूरा सूटकेस पलट देतीं. समझौते नहीं कर सकतीं थीं.…मैंने ऊपरी तौर पर उन्हें ज़िंदगी से भरपूर देखा.

लेकिन अंदर से मायूस और तनहा पाया. उन्होंने अपनी बेटियों का ज़िक्र बहुत कम किया. हां, नाती को कभी-कभी याद ज़रूर कर लेतीं. किसी को उनकी फ़िक़्र नहीं होती थी कि वो कहां हैं, कैसी हैं और कब लौटेंगी…उन दिनों वो हमारे घर पर रुकीं थीं. उनके लिए बंबई से फ़ोन आया.  फलां फ्लाईट से फ़ौरन रवाना कर दें. मैं और मेरे पति अनवर उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गए. वहीं बंबई जा रहे एक दोस्त मिल गए. हमने इस्मत आपा को उनके सपुर्द कर दिया, इस ताक़ीद के साथ कि रास्ते भर उनका हर क़िस्म का ख्याल रखें और एयरपोर्ट से घर के लिए टैक्सी भी कर दें. दोस्त ने लौट कर बताया कि वो बलां की ज़िद्दी निकलीं. बंबई एयरपोर्ट पर उन्हें लेने कोई नहीं आया. टैक्सी करके सीधा बांद्रा चली गयीं अपने एक दोस्त के घर. 

प्रसिद्ध लेखिका शबनम रिज़वी ने इस्मत आपा के अफ़सानों और नावेलों के किरदारों पर बड़े विस्तार से रौशनी डाली.  वो खुद अव्वल दरजे की ज़िद्दी थीं. उनके किरदारों में अजीबो-ग़रीब ज़िद्द और इंकार साफ़ दिखता है. मुहब्बत करने वाला नफ़रत का इज़हार करता है. खेल-खेल में बात शुरू होती है. फिर नफ़रत में तब्दील हो जाती है. किरदार एक दूसरे पर हमला करते हैं. मगर आख़िर आते-आते भावुक हो जाते हैं.…उनके किरदार वक़्त के साथ बदलते भी रहते हैं.… महिलाओं के लिए बहुत लिखा उन्होंने. 

हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने रशीद जहां, अतिया हुसैन और कुर्तनलैन हैदर की पंक्ति में इस्मत चुग़ताई को रखते हुए बहुत बड़ी लेखिका बताया. यह सब लखनऊ के आधुनिक आईटी कॉलेज की पढ़ी हुईं थीं. उन्होंने अपने समाज की चिंता के साथ महिलाओं की आज़ादी की बात की है. उनकी प्रसिद्ध कृति 'लिहाफ़' में शोषण के परिप्रेक्ष्य की सिर्फ़ बात नहीं है. उनमें फ़िक्र है कि हालात क्या हैं, रिश्ते क्या हैं और ऐसे रिश्ते क्यों हैं और उनके किरदारों के शौक क्या हैं?…उन्होंने सेक्सुल्टी की बात की. उस भाषा में बात की जो उनके समाज के मिडिल क्लास में बोली जाती है. और उन विषयों पर लिखा जिन पर कभी किसी की निग़ाह नहीं गयी थी.…वो मूल्यों के साथ जुडी रहीं. कभी किसी तहरीक़ के साथ जुड़ कर नहीं लिखा. थोपी हुई बातें नहीं मानीं. जो मन में आया, लिखा…

उनके अफ़सानों में 1947 के पार्टीशन से उपजे सांप्रदायिक दंगों का दर्द है. दिलों में दरारें पड़ने का दर्द है. ऐसे संगीन माहौल में एक लेखक का फ़र्ज़ बनता है कि वो हस्तक्षेप करे. और ये इस्मत आपा ने पूरे समर्पण के साथ बखूबी किया…वो पाखंड की धज्जियां उड़ाती हैं. 'कच्चे धागे' कहानी में उनकी यह फ़िक्र और उनकी विचारधारा दिखती है कि वो किसके साथ खड़ी हैं.

बापू की जयंती के रोज़ आत्माएं शुद्द हो रही हैं. गंदी और घिनौनी. मगर लालबाग़ और परेल के इलाकों में एक भी तकली नाचती नज़र नहीं आती है. पच्चीस हज़ार श्रमिक कामगार मैदान में जमा हैं. छटनी की धार से ज़ख्मी मज़दूर, फीसों से कुचले विद्यार्थी, महंगाई के कारक और शिक्षक उम्मीद भरी नज़रों से आज़ाद मुल्क के रहनुमाओं को ताक रहे हैं. इंसान इंसान से नहीं हैवान से लड़ेगा. कामगार मैदान के चारों ओर पुलिस का पहरा है. मगर नाज़ायज़ शराब पर नहीं है, काले बाज़ार और चोर उच्चकों पर नहीं है. मैं इनके साथ हूं. भले मैं इस तूफ़ान में कतरा हूं लेकिन हर कतरा एक तूफ़ान है.…

आज बहुमतवादी आतंक है. मूल्यों का क्षरण हो रहा है. ऐसे में इस्मत आपा की और उनके जैसे समर्पित लेखन की सख़्त ज़रूरत है. 

मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार रतन सिंह ने इस्मत आपा को याद करते हुए बताया कि वो बेहद संजीदा औरत थीं. एक वाक़या याद है. एक जलसे में उनको सुनने और देखने वालों से हाल भरा हुआ था. मैं जगह न मिलने की वज़ह से पीछे एक कोने में खड़ा था. इस्मत आपा ने देखा. ज़ोर से बोलीं -रतन सिंह पीछे क्यों खड़े हो? आगे आओ. इसके पीछे उनका मक़सद था, नई पीढ़ी के अदीबों आगे आओ. सीनियर अदीब जूनियर के लिए रास्ता साफ़ करे. एक जनरेशन दूसरी जेनरेशन को तैयार करे. हमें उनके काम को आगे बढ़ाना चाहिये…आज मुल्क़ में कोई ऐसा रिसाला नहीं है जिसमें पूरे मुल्क़ के अदब को देखा जा सके. 

मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार और सहाफ़ी आबिद सुहैल ने बताया कि इस्मत आपा सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में मशहूर थीं.… पहली मरतबे उन्हें 1962 में देखा था. लखनऊ के बर्लिंग्टन होटल में एक जलसा हुआ.  बेशुमार नौजवान अदीब जमा हुए इस्मत आपा को देखने और सुनने.  उन्होंने अपील की. घर से बाहर निकलो.  लोगों से मिलो, उन्हें देखो और लिखो…इस्मत आपा शादी के कुछ दिनों बाद तक अपने शौहर शाहिद लतीफ़ के नाम से लिखती रहीं. बाद में अपने नाम से लिखा…औरत जब चुटकी लेती है तो मर्द कसमसा कर रहा जाता है. इस्मत आपा इसमें माहिर थीं.…

एक जलसे में जाने से पहले शाहिद ने उनसे कहा, मेरी कहानी के मुतल्लिक कुछ नहीं कहना. मुंह बिलकुल बंद रखना. लेकिन वो अपना वादा नहीं निभा सकीं. शाहिद लतीफ़ के अफ़साने की बखिया उधेड़ कर रख दी. वापसी पर शाहिद ड्राइव कर रहे थे और इस्मत उनका चेहरा देख रहीं थीं कि शाहिद कुछ बोलेंगे. लेकिन वो बिलकुल ख़ामोश रहे.....एक वाकया रामलाल के घर पर हुआ. हम सब वहां पहुंचे. रामलाल वो तमाम खतूत संभालने और खंगालने में लगे थे जिन्हें तमाम अदीबों ने उन्हें लिखे थे. इस्मत बोलीं यह सब बेकार मेहनत क्यों कर रहे हो? तुम्हारे जाने के बाद सब ख़त्म हो जाएगा. कोई इन्हें संभाल नहीं रखेगा…

इस्मत के अफ़सानों में डायलॉग बहुत कम हैं. कहानी बनाई नहीं जाती, बल्कि चलती रहती है. 

इस्मत चुग़ताई की कहानियां ख़ास तरह की थीं. तरक़्क़ीपसंद अफ़साने लिखे. फ़िक्री कहानियां लिखीं, जिनकी बुनियाद मसायल हैं. मसायल में इंसान के काम की अहमियत है.…उर्दू में भंगी समाज पर सिर्फ़ दो अफ़साने लिखे गए हैं. एक कृष्ण चंदर ने लिखा - कालू भंगी.  और दूसरा लिखा इस्मत ने - दो हाथ. यह इस्मत की ही हिम्मत थी कि उन्होंने उस किरदार की समाज में अहमियत बताई…

उनके अफ़सानों को पढ़ कर लोग हैरान होते थे जब उन्हें यह पता चलता था कि ये खातून ने लिखे हैं. उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी.…अफ़साना तो कोई भी लिख सकता है. सवाल यह है कि मसला क्या है? इस्मत ऐसे मसायल लेकर चलती हैं जिनमें औरत की जद्दोजहद पूरी शिद्दत के साथ पेश की जाती है. उसे समाज में हक़ दिलाती हैं. इस्मत ने बदनामियों को झेल कर औरत को उसका मुक़ाम दिलाया. आज़ादी दिलाई… अफ़साने आते रहेंगे और अफ़सानानिगार भी. लेकिन इस्मत का आना मुश्किल है.

और आख़िर में मैं. इस्मत आपा वाक़ई अद्भुत थीं. वो मेरे वालिद, उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार रामलाल, की दोस्त थीं. हमारे घर पर रहीं भी.…मैंने उन्हें पहली मरतबे 1962 में देखा था. वो चारबाग़ वाले हमारे घर आईं थीं. बेहद ख़ूबसूरत. मैं तो उन पर फ़िदा हो गया था. उस वक़्त मेरी उम्र महज़ बारह साल थी.…1987 में वो हमारे इंदिरा नगर घर आयीं. दो रोज़ रहीं भी. उनसे मैंने सिनेमा के बारे बहुत लंबी बात की. खास तौर पर दिलीप कुमार के बारे में. उनके शौहर शाहिद लतीफ़ ने दिलीप कुमार को 'शहीद' और 'आरज़ू' में डायरेक्ट किया था. इसकी कहानी इस्मत आपा ने लिखी थी. शाहिद ने गुरुदत्त  की 'बहारें फिर भी आयेंगी' भी डायरेक्ट की थी.

…एक बार जब मैं बंबई घूमने गया था तो इस्मत आपा से तो घर पर मुलाक़ात हुई लेकिन शाहिद लतीफ़ साहब से मिलने हमें श्री साउंड स्टूडियो जाना पड़ा, जहां वो चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी के लिए 'जवाब आएगा' के शूटिंग कर रहे थे.…इस्मत आपा बहुत बिंदास थीं और जो बात उन्हें पसंद नहीं थी तो लाख बहस के वो हां नहीं करती थीं. एक बार मैंने उनसे कहा रामायण सीरियल का राम अरुण गोविल मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता. इस पर वो बहुत नाराज़ हुईं… वो थ्री कैसल विदेशी सिगरेट पी रही थीं. मैं उन्हें ललचाई आंखो से देख रहा था. वो समझ गयीं. अपने पर्स से एक डिब्बी निकाल कर मेरी जेब में डाल दी. मैंने इसे किसी से शेयर नहीं किया. रोज़ एक एक करके धुआं कर डाली…उनके इंतक़ाल की ख़बर ने मुझे हतप्रभ कर दिया था. बड़ा अजीब लगता है और ख़ालीपन सा भी, जब कोई ऐसा गुज़र जाए जिसे आपने बहुत करीब से देखा और समझा हो. और फिर इस्मत आपा तो हमारे परिवार की सदस्य थीं.  

इस कार्यक्रम में साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता से जुड़े जुगल किशोर, के.के.चतुर्वेदी, सुशीला पुरी, विजय राज बली, ऋषि श्रीवास्तव आदि तमाम जानी-मानी हस्तियों मौजूद थीं.

छह साल पहले गुजरे वक्त को फिर से सामने लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को याद दिलाना है जिससे वो कला और शब्दो की गहराइयों को तलाश करे और याद रखे कि हर दौर में समाज से टकराने वाले पैदा होते है।

 

भारत के मध्य प्रदेश राज्य के बीजेपी मंत्री के अनुसार नेहरू जी के पहले भाषण की वजह से मुल्क की आर्थिक स्थिति खराब है।

एक ढूंढो हजार मिलते है ! भारत का एक हिंदी भाषी राज्य है मध्य प्रदेश और वहां आजकल बीजेपी को सरकार है, मध्य प्रदेश के केबिनेट मिनिस्टर ने बयान दिया है कि भारत के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को लाल किले से जो भाषण दिया था उसकी वजह से आजकल भारत की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। हालांकि नेहरू जी ने 15 अगस्त 47 को लाल किले से कोई भाषण नहीं दिया था लेकिन बेचारे मंत्री जी की जानकारी के अनुसार जो पहला भाषण था वो इतिहास का हिस्सा है और विजय शंकर सिंह आईपीएस उसको तलाश करके लाए हैं। मंत्री जी की अच्छी सेहत के लिए भी सबको प्रार्थना करनी चाहिए। ...

मोहम्मद रफी तुम बहुत याद आए....। मन तरसत हरी दर्शन को आज .... एक चमत्कार - मोहम्मद रफी !

मन तरपत हरी दर्शन को आज .... मितर प्यारे नू......( फिल्म नानक नाम जहाज है) कुछ ऐसे गायकी के चमत्कार है जिसे किसी ने कभी सुना ना हो, ऐसा हो नहीं सकता और दुनिया में कोई ऐसा भी नहीं हो सकता जिसे गीत संगीत में रुचि हो और उसने रफी साहब का नाम न सुना हो। ...

श्रावण मास और उत्तर भारत की कांवड़ यात्रा जिसपर सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया है।

बेशक हिंदुस्तान विविधताओं का देश है लेकिन भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू के अनुसार यह मूर्खताओं का भी देश है और यहां की 95% जनता को उसी श्रेणी में रखना चाहिए। निसंदेह किसी की भी आस्था और विश्वास पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए किन्तु किसी भी चली आ रही परम्परा को अंधभक्ति की तरह स्वीकार करना भी पाखंड ही मानना चाहिए और यदि ऐसा न होता तो इस जमीन पर बाबा बुल्लेशाह, नानक और कबीर जन्म ना लेते। ...

शराब ना पीने वाला शराबी ! भारतीय सिनेमा जगत में कामयाब शराबी का चरित्र निभाने वाला व्यक्ति जो शराब नहीं पीता था।

मुंबई की बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में वैसे तो बहुत से सितारे हुए है जिन्हे बतौर हीरो याद किया जाता है लेकिन कुछ ऐसे चरित्र कलाकार भी हुए हैं जिनकी एक्टिंग हीरो से भी ज्यादा याद रखी जाती हैं। ऐसे ही एक केशटो मुखर्जी कभी नहीं भूलते जिन्होंने सबसे ज्यादा शराबी होने के रोल अदा किए। ...

अफगानिस्तान से चीन तक बदलते हालात ! भारत के लिए चुनौती, चेतावनी या खुद को सिद्ध करने का मौका !

पिछले चार दिनों में हुई हलचल से अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर होते हुए तिब्बत तक की बदलती परिस्थितियों के बीच भारत के लिए चुनौती, चेतावनी या समझदारी से काम करने की आवश्यकता है ? ...

Sophia Duleep Singh The great Punjaban will be honoured by Britishers

ਯੁ ਕੇ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਦੀ ਸੋਫੀਆ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦਾ ਬੁੱਤ ਲਾਣ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਦੀ ਰਾਜਕੁਮਾਰੀ ਬਾਰੇ ਕੁਛ ਜਾਣਕਾਰੀ ...

अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा पेगासस जासूसी कांड का खुलासा होने के बाद भारत की मोदी सरकार के विरूद्ध रोष बढ़ता जा रहा है।

वैसे तो भारत सहित दुनिया के कई देशों, विशेषकर थर्ड वर्ल्ड में फोन टैपिंग जैसे कांड होते रहे हैं बेशक यह असंवैधानिक एवम् मानवाधिकारों का हनन है। लेकिन जिस प्रकार पेगासस जासूसी मामले का खुलासा हुआ है एवम् इसे सख्ती से सरकार विरोधी अहम मुद्दा बना दिया गया है इससे शासक वर्ग में चिंता होना स्वाभाविक है। दिल्ली में युवा कांग्रेस द्वारा संसद की ओर प्रदर्शन करते हुए मार्च निकाला गया तो पत्रकारिता पर आंच आती देखकर पत्रकार संगठनों द्वारा भी अपना अपना विरोध दर्ज कराया गया। ...

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले... मगर क्या मालूम था कि उनकी कुर्बानी भुला देंगे।

बहुत सुना था कि आज़ादी की लड़ाई में लडने वालो और शहीदों को सम्मान के साथ आज़ाद हिंदुस्तान में सिर उठाकर जीने का मौका मिलेगा लेकिन भगत सिंह के साथी ने आज़ादी से पहले भी और बाद मे भी केवल संघर्ष का सामना किया। ...

डिप्लोमेटिक नाटक का अंत जिसके कारण पाकिस्तान की सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।

दो दिन पहले दुनियां भर के राजनयिक क्षेत्रो मे हलचल मच गई जब समाचार मिला कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से अफगानिस्तान के राजदूत की बेटी का अपहरण हो गया है। ...

भारतीय सिनेमा की प्लेबैक सिंगर की फेहरिस्त में एक नाम जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

भारतीय सिनेमा जगत ने एक से बढ़कर एक नायाब सितारों से खुद को सजाया है और उन्हें तो विशेष रूप से याद रखना चाहिए जिन्होंने समाज को चुनौती देते हुए अपना मुकाम हासिल किया। ...

एक चुटकी सिंदूर की कीमत सुनते ही जो चेहरा याद आता है उसका नाम है राजेश खन्ना। भारतीय सिनेमा का पहला सुपर स्टार।

भारतीय सिनेमा का युग वैसे तो दादा साहब फाल्के और सोहराब मोदी से लेकर पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार से होता हुआ यहां तक पहुंचा है लेकिन अभी को जनता द्वारा व्यापक समर्थन मिलने के बावजूद किसी को सुपर स्टार नहीं कहा गया । फिर 1942 में जन्मा एक ऐसा कलाकार मुंबई पहुंचा जिसकी हेयर स्टाइल और पैंट्स के उपर कुर्ता पहनना एक ट्रेंड बन गया। उस कलाकार को दुनिया राजेश खन्ना के नाम से जानती है। ...

18 जुलाई नेल्सन मंडेला दिवस के रूप में विश्व के उस महामानव के नाम जिसने रंगभेद के विरूद्ध अपने जीवन को दांव पर लगा दिया।

सभे की जात एके पहचानबो, और एक नूर से सब जग उपज्यो जैसे महामंत्रों को जीवन में उतारने और इनके लिए संघर्ष करने वाले यदि किसी महामानव का वर्तमान काल में उल्लेख किया जाना चाहिए तो निसंदेह वो नेल्सन मंडेला ही है जिन्हे पहले विदेशी नायक के रूप में भारत सरकार ने भारत रत्न सम्मान से सम्मानित किया था उनके जीवन चरित्र पर कुछ शब्द उर्मिलेश उर्मिल साहब के सहयोग से। ...

यदि दक्षिण भारत को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान में सिर ढकना आदर और अदब माना जाता रहा है। टोपियों का इतिहास !

वैसे तो सदियों से उत्तर भारत की सभ्यताओं में विध्यांचल से लेकर हिंदुकुश तक सिर ढकना सम्मान एवम् संस्कृति का हिस्सा रहे है लेकिन पहले पगड़ी के नाम पर लंबा कपड़ा लपेट लिया जाता था फिर टोपियां प्रचलन में आई जिनके विभिन्न प्रकार प्रचलन में हैं। उसी की रोचक जानकारी एवम् इतिहास। ...

आजादी की लड़ाई का एक ऐसा अध्याय जिसकी चर्चा बहुत कम होती हैं लेकिन यह नेहरू जी के जीवन का अटूट हिस्सा है।

अंग्रेजी साम्राज्य के विरूद्ध चली आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा अध्याय जो सिद्ध करता है कि कैसे हिन्दुस्तानियों ने जान की बाजी लगाकर भी इसमें जीत हासिल की। ...

एक ऐसे जांबाज योद्धा के जन्मदिन पर बधाई जिसने 1971 के युद्ध में दशम पिता की वाणी को सत्य कर दिखाया।

1971 का भारत पाक युद्ध और श्रीनगर पर पाकिस्तानी वायुसेना का हमला जिसकी उम्मीद नहीं थी लेकिन लुधियाना में जन्मे गुरसिख ने इतिहास कायम करके दिखा दिया। ...

एक भारतीय जर्नलिस्ट की मौत और मृतक को अमर शहीद या उसकी मौत पर हसने का कुकृत्य।

एक दुखद घटना में भारत के प्रतिष्ठित पत्रकार दानिश सिद्दीकी को अफगानिस्तान में गोली लगने के कारण अपनी जान कुर्बान करनी पड़ी। बेशक यह उसका उसके प्रोफेशन के प्रति समर्पण था और इसी वजह से उसे विश्व का प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिला था। लेकिन उसकी मौत से भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक भारत सरकार तथा रेडिकल सोच वालो का रवैया रहा। ...

कला और फिल्म जगत की दादी सा 75 बसंत देखकर अलविदा कह गई

दिल्ली में जन्म लेने के बाद अल्मोड़ा और नैनीताल की वादियों में पली बढ़ी सुरेखा सिकरी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई के बाद पत्रकारिता करने की सोची लेकिन फिल्म इंडस्ट्री ने इन्हे अपने आगोश मे समेट लिया और इज्जत, शोहरत तथा इतने अवॉर्ड्स ने नवाजा कि ये भूल गई अपने अतीत को। ...

India reunification मुहिम, बेशक एक सुनहरा ख्वाब है लेकिन किसी ने देखने की हिम्मत तो की !

अपने बेबाक बयानात के लिए प्रसिद्ध भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू साहब ने एक ख्याल पेश किया है कि क्यों न भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश फिर से इकट्ठे होकर वृहद हिंदुस्तान बन जाए। ...

आकाश यदि लक्ष्य हो और हौंसले की उड़ान हो तो आसमान को धरती पर उतार लाना न मुश्किल है न असम्भव।

यकीनन यदि हिम्मत और हौंसले से एक पत्थर भी उछाला जाए तो वो आसमान में छेद कर सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया जोधपुर की महिला सफाईकर्मी ने जिसने राजस्थान प्रशासनिक सेवा 2018 के अंतिम रिजल्ट के साथ सफलता प्राप्त करके एक कीर्तिमान स्थापित किया। ...