अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

बीस साल बाद अचानक अमेरिकी फोर्सेज ने अफगानिस्तान से निकलने का निर्णय लिया और रातो रात बड़गाम एयर बेस खाली कर दिया। हालांकि कुछ सूत्रों के अनुसार भारत ने भी अपना C - 17 एयरक्राफ्ट भेजकर वहां से कुछ भारतीयों को निकाला लेकिन हालात ए हाजरा क्या है ?

अफगानिस्तान के लगभग 400 जिलों में से 200 से अधिक पर तालिबान ने अपना नियंत्रण स्थापित होने का दावा किया है तो अशरफ गनी सरकार ने सौ से अधिक जिलों पर तालिबान के कब्जे को स्वीकार किया है।

इसी बीच किसी भी आशंकित गृहयुद्ध से बचने के लिए जो डेवलपमेंट हुई है उनमें तजाकिस्तान द्वारा अफ़गान ताजक सीमा पर बीस हजार सैनिकों की तैनाती के साथ साथ तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के उत्तरी क्षेत्रो पर कब्ज़ा है ( उज़्बेकिस्तान सहित पूर्व सोवियत देशों की सीमाएं )

चीन तथा अफगानिस्तान की छोटी सी सीमा को खोल दिया गया है अर्थात आवश्यकता पड़ने पर चीन द्वारा सैनिक मदद पहुंचाई जा सके क्योंकि उस क्षेत्र से भी सरकारी सैनिक या तो भाग गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया।

News Number द्वारा कुछ समय पहले ओपिनियन प्रकाशित किया गया था जिसमे इस क्षेत्र की स्थिरता एवम् शांति के लिए ईरान की भूमिका को रेखांकित किया गया था।

कल अचानक तालिबानी प्रतिनिधिमंडल ईरान पहुंचा और उन्होंने निर्वाचित राष्ट्रपति जनाब इब्राहिम रईसी तथा ईरान के विदेशमंत्री से मुलाकात की।

किन्तु इससे भी अधिक चौंकाने वाली घटना के रूप में भारतीय विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर का मॉस्को जाते हुए तेहरान में रुकना तथा निर्वाचित राष्ट्रपति एवम् विदेशमंत्री से मुलाकात करना देखा जा सकता है।

निसंदेह भारत के विदेशमंत्री ने दोनों शीर्ष नेताओं से भारतीय हितों की बात ही की होगी किन्तु इस मीटिंग में अफगानिस्तान की चर्चा न हुई हो, ऐसा सम्भव नहीं है।

भारत द्वारा बहुत बड़ा निवेश अफगानिस्तान में किया गया था और यदि तालिबान सत्ता में आते हैं या भारत विरोधी रुख रखते है तो यह भारत सरकार की बहुत बड़ी नीतिगत असफलता मानी जा सकती है।

 

इसी बीच भारत द्वारा बनाया गया महत्वपूर्ण सलमा डैम को भी ध्यान में रखना चाहिए जिसके मुख्य हिस्से पर तालिबान ने अपना नियंत्रण कायम कर लिया है।

लगातार अमेरिकी हितों की तरफदारी करते हुए मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार को शायद यह आशंका भी नहीं थी कि यूएस इस प्रकार का कदम उठाते हुए सबको मझधार में छोड़ देगा।

यद्धपि इनके साथ ही बहुत से सूत्र अभी भी डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर द्वारा एक्टिव पार्ट लेने की आशंका व्यक्त करते हैं और यदि ऐसा होता है तो क्षेत्र में एक नए रक्तपात की शुरुआत हो सकती हैं।

इसकी आशंका इसलिए भी अधिक है क्योंकि रूस द्वारा अपना काउंसलेट ऑफिस बंद करने की घोषणा कर दी गई है या बंद कर दिया गया है और रूसी नागरिकों को वहां से निकाल लिया गया है।

यद्धपि अभी भी काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा तुर्की की सेना कर रही हैं लेकिन तुर्क सरकार द्वारा भविष्य में हामिद करजई हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए हॉलैंड से सहयोग एवम् अमेरिका सरकार से अपनी शर्तो पर कोई निर्णय नहीं हुआ है।

तेजी से काबुल की ओर बढ़ते तालिबान ने एयरपोर्ट की सुरक्षा के लिए किसी भी विदेशी फोर्सेज की नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया है।

आशा करनी चाहिए कि ईरान अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए क्षेत्र में शांति प्रयासों को सहयोग देगा एवम् भारत और तालिबान सरकार ( यदि सत्ता में आते हैं ) के बीच बेहतर रिश्तों के लिए भी प्रयास करेगा।

अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है। ...

अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

तालिबान अफगानिस्तान के बढ़ते कदम पाकिस्तान और ईरान के लिए एक बड़ा खतरा !

जिस तेजी से और सामरिक योजना से तालिबान आगे बढ़ रहे है और सम्भावना जताई जा रही है कि वो काबुल फतह कर लेंगे तो क्या इसके बाद क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी या एक नया खतरा बढ़ जाएगा। ...

दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ साथ अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी को कोई सकारात्मक आश्वासन न मिलना क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। ...

अफ़गान राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा

इस प्रकार बहुचर्चित अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी यात्रा खत्म हुई । वापसी के बाद अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के भविष्य की क्या स्थिति हो सकती हैं। ...

अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात ।

बीस साल से चल रही जंग की समाप्ति के साथ ही अमेरिका द्वारा अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के साथ ही अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्जे के बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात की। ...

अफगानिस्तान ! अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद क्या ? तालिबान प्रवक्ता सुहैल शहीन से बातचीत

जिस तेजी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी अफगानिस्तान से हो रही है और तालिबान द्वारा अफ़गान जमीन पर अपना कब्ज़ा कायम किया जा रहा है उससे सम्भावित भविष्य के हालात पर तालिबानी प्रवक्ता सुहैल शाहीन से एक बात।। ...

अफगानिस्तान का भविष्य ? आज के हालात पर NewsNumber की विशेष रिपोर्ट

तेजी से अफगानिस्तान को विकल्पहीन छोड़कर निकलती नाटो एवम् अमेरिकी फोर्सेज के बाद अफगानिस्तान का भविष्य एक बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।। ...

अफ़गान तालिबान से भारत ने सम्पर्क कायम किया जिससे अफ़गान शांति की राह में कुछ नए बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।।

भारतीय विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर प्रसाद की दोहा एवम् कुवैत यात्रा के बीच अफगानिस्तान के सरकारी मीडिया टोलो न्यूज द्वारा भारत द्वारा तालिबान से सम्पर्क करने की खबर का क्या अर्थ हो सकता है ? ...

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी से बढ़ती अराजकता का भारत पर प्रभाव !

जैसे जैसे अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज अफगानिस्तान से अपने अड्डे खाली कर रहे है और अफगानिस्तान से निकल रहे हैं वैसे ही दक्षिण एशिया किसी बड़े युद्ध की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है।। ...

अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी लेकिन भविष्य में शांति की गारंटी नहीं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के कार्यक्रम के साथ दिए जा रहे बयानात के मद्देनजर अभी दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। ...