दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

Graveyard of empires के नाम से प्रसिद्ध अफगानिस्तान सोवियत संघ के बाद बीस साल के युद्ध के बाद एक बार फिर आज़ादी, शांति, गृहयुद्ध और महाशक्तियों के अखाड़े के चौराहे पर खड़ा हो गया है।। 9/11 के बाद अमेरिका तथा नाटो फोर्सेज द्वारा हमले एवम् कब्जे के बाद स्थानीय मलीशिया द्वारा लगातार घाव दिए जाते रहे जिसकी परिणीती अमेरिका एवम् अफ़गान तालिबान के समझौते के रूप में हुई किन्तु या तो जानबूझकर या गलती से इसे बीच में ही छोड़ दिया गया।

आधिकारिक तौर पर तो स्वीकार नहीं किया गया है किन्तु यूएस के सूत्रों का कहना है कि 4 जुलाई स्वतंत्रता दिवस तक पेंटागन का लक्ष्य अफगानिस्तान छोड़ने का है। इस सम्बन्ध मे अफगानिस्तान सरकार के राष्ट्रपति एवम् चीफ एक्जीक्यूटिव द्वारा वाशिंगटन यात्रा की गई जिससे अमेरिका की फोर्सेज को रुकने के लिए मनाया जा सके किन्तु 3 बिलियन डॉलर खर्च करने के बावजूद तेजी से आत्मसमर्पण करती अफ़गान फौज को देखकर व्हाइट हाउस ने उनकी गुहार अनसुनी कर दी।। बीते कल को नाटो सहयोगियों में सबसे बड़े भागीदार जर्मनी ने भी अपनी सेनाए निकाल ली है और अमेरिका द्वारा तो काफी समय से वापसी चल ही रही है।

शायद अंतिम क्षण तक तुर्की की सेना रुक सकती हैं।। लेकिन जिस प्रकार वापसी के साथ साथ तालिबान द्वारा ज्यादा से ज्यादा इलाकों पर अपना नियंत्रण कायम किया जा रहा है और अफ़गान सरकारी फोर्सेज द्वारा या तो तालिबान के सामने सरेंडर किया जा रहा है या मैदान छोड़ कर भाग रहे हैं यह वेस्टर्न पॉवर के लिए चिंता का कारण बन गया है।। भारत सरकार द्वारा भी अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी करके उन्हे अफगानिस्तान छोड़ने की सलाह दे दी गई है। बताया जाता है कि आधिकारिक तौर पर लगभग 3,000 से अधिक भारतीय वहां कार्यरत है।

ऐसा इसलिए भी किया जा रहा है कि वापिस लौटती फोर्सेज के हथियार नागरिकों के हाथ में देखे गए हैं बेशक वो दिए गए हो या चोरी किए गए हो। हथियारबंद नागरिकों द्वारा तालिबान के विरूद्ध सशस्त्र विरोध का ऐलान किया गया है जो काबुल को गृहयुद्ध की ओर धकेले जाने का इशारा कर रहा है।। कुछ सूत्रों का कहना है कि लगभग डेढ़ साल तक यूएस फोर्सेज तथा तालिबान के बीच किसी प्रकार का टकराव न होने के बाद डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर या विरोधी विद्रोहियों द्वारा अब तालिबान का मुकाबला शुरू कर दिया गया है और झड़पें पाक अफ़गान सीमा के निकट तक पहुंच गई है।

यदि ऐसी स्थिति बनती हैं तो याद रखना चाहिए कि चीन भी शांत नहीं रहेगा और अपने हितों के लिए तालिबान का साथ दे सकता है जबकि दूसरी ओर भारत का अपना निवेश एवम् भारतीय हित शायद पहले की तरह नॉर्दन एलायंस का साथ देकर दोस्तम की मदद करें।। लेकिन किसी भी अशांत परिस्थिति में अंतिम परिणाम क्या होगा ? फिलहाल तो ईरान द्वारा भी तालिबान के समर्थन के संकेत मिले हैं जैसा कि ईरानी नेताओ ने शिया हज़ारा कम्युनिटी को तालिबान का साथ देने की अपील की है।। यद्धपि नीति निर्धारकों का अपना दृष्टिकोण होता है लेकिन यदि ऐसे समय में सार्क संगठन को दोबारा एक्टिव करके शांति के लिए प्रयास किए जाएं तो सबका लाभ होगा।।

अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

तालिबान अफगानिस्तान के बढ़ते कदम पाकिस्तान और ईरान के लिए एक बड़ा खतरा !

जिस तेजी से और सामरिक योजना से तालिबान आगे बढ़ रहे है और सम्भावना जताई जा रही है कि वो काबुल फतह कर लेंगे तो क्या इसके बाद क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी या एक नया खतरा बढ़ जाएगा। ...

अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

एक ओर तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर सभी पक्ष अपनी अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित है। ...

अफ़गान राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा

इस प्रकार बहुचर्चित अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी यात्रा खत्म हुई । वापसी के बाद अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के भविष्य की क्या स्थिति हो सकती हैं। ...

अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात ।

बीस साल से चल रही जंग की समाप्ति के साथ ही अमेरिका द्वारा अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के साथ ही अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्जे के बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात की। ...

अफगानिस्तान ! अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद क्या ? तालिबान प्रवक्ता सुहैल शहीन से बातचीत

जिस तेजी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी अफगानिस्तान से हो रही है और तालिबान द्वारा अफ़गान जमीन पर अपना कब्ज़ा कायम किया जा रहा है उससे सम्भावित भविष्य के हालात पर तालिबानी प्रवक्ता सुहैल शाहीन से एक बात।। ...

अफगानिस्तान का भविष्य ? आज के हालात पर NewsNumber की विशेष रिपोर्ट

तेजी से अफगानिस्तान को विकल्पहीन छोड़कर निकलती नाटो एवम् अमेरिकी फोर्सेज के बाद अफगानिस्तान का भविष्य एक बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।। ...

अफ़गान तालिबान से भारत ने सम्पर्क कायम किया जिससे अफ़गान शांति की राह में कुछ नए बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।।

भारतीय विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर प्रसाद की दोहा एवम् कुवैत यात्रा के बीच अफगानिस्तान के सरकारी मीडिया टोलो न्यूज द्वारा भारत द्वारा तालिबान से सम्पर्क करने की खबर का क्या अर्थ हो सकता है ? ...

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी से बढ़ती अराजकता का भारत पर प्रभाव !

जैसे जैसे अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज अफगानिस्तान से अपने अड्डे खाली कर रहे है और अफगानिस्तान से निकल रहे हैं वैसे ही दक्षिण एशिया किसी बड़े युद्ध की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है।। ...

अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी लेकिन भविष्य में शांति की गारंटी नहीं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के कार्यक्रम के साथ दिए जा रहे बयानात के मद्देनजर अभी दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। ...