बाइडन पुतिन बैठक ! किसने क्या खोया, क्या पाया।।

कूटनीति, राष्ट्रहित और जिओ पॉलिटिक्स, कुछ ऐसे शब्द है जिनकी डिक्शनरी में अक्सर काले का अर्थ सफेद बताया जाता है तथा आधी रात को तपता सूरज दिखाया जाता हैं।। साम्राज्य बनते और बिगड़ते रहे हैं सत्ताओ के महल खंडहरों में तब्दील होते रहे हैं लेकिन इतिहास ने धरती के कुछ हिस्सो को सदैव विजेता होने का आशीर्वाद देकर रखा है।। ऐसा ही एक अफगानिस्तान है जिसे कभी गुलाम नहीं रखा जा सका तो दूसरा रूस है जिसने विश्व के बढ़ते तानाशाहों को आराम से अपने ट्रैप में फसा कर पराजित किया है।

जब भी रूस का इतिहास देखा जाए तो नेपोलियन बोनापार्ट को याद रखना चाहिए जो विश्व विजेता बनता जा रहा था और अंतिम चरण में ब्रिटेन उसके निशाने पर था किन्तु नेपोलियन को लगा कि रूस के ज़ार ब्रिटेन की मदद करेंगे तो पहले रूस को सबक सिखाना चाहिए और रशिया पर आक्रमण कर दिया।। रूस के सैनिक पीछे हटते चले गए लेकिन हटने से पहले वो रास्ते के गावों के खेत एवम् अन्न भंडार खत्म करते चले गए। नेपोलियन की सेनाए आगे बढ़ते बढ़ते मॉस्को तक पहुंच गई तो उसे अहसास हुआ कि मॉस्को के अन्न भंडार जला दिए गए हैं तथा पीछे से उसको रसद मिलने मे बहुत लंबा रास्ता बाकी हैं जो सर्दियों की बर्फबारी में असम्भव था।

लिहाजा उसको वाटरलू के युद्ध और पराजय के साथ कलंक का टीका लग गया कुछ ऐसा ही हिटलर के साथ हुआ। कल्पना करे कि यदि ये दोनों विजेता बन जाते तो आज इनकी प्रशंसा मे गीत गाए जाते।। खैर बात हो रही है अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की जेनेवा मुलाकात की जो अंततः सम्पन्न हुई।। मुलाकात से पहले ही क्रेमलिन ने स्पष्ट कर दिया था कि दोनों राष्ट्रपति एकांत में बात नहीं करेंगे इसीलिए दोनों के साथ उनके विदेशमंत्री एवम् सेक्रेट्री स्टेट भी मौजूद थे।। पहली वार्ता लगभग 4 से 5 घंटा चली जिसके बीच किसी प्रकार का कोई चाय ब्रेक या लंच ब्रेक भी नहीं लिया गया।

ऐसा ही दूसरी बैठक के दौरान भी हुआ।। बाद में राष्ट्रपति पुतिन एवम् बाइडेन द्वारा अलग अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई। इंपुतिन की प्रेस मीट से अमेरिकी पत्रकारों को बाहर निकाल दिया गया जिससे कुछ हंगामे वाली स्थिति जरूर हुई किन्तु पूर्व कमांडो एवम् केजीबी प्रमुख को इनकी परवाह नहीं होती।। यदि दोनों राष्ट्रपतियों के चित्र एवम् उनकी बॉडी लैंग्वेज को नोटिस किया जाए तो विश्लेषण करने के लिए कुछ बाकी नहीं रहता फिर भी जैसा कि राष्ट्रपति पुतिन ने बताया कि उनकी बातचीत अच्छी रही एवम् सायबर सेक्योरिटीज से लेकर बेहतर विश्व के निर्माण पर बात हुई।

क्या इससे यह समझा जाए कि अमेरिका ने बदले हालात के साथ झुक कर वक्त के साथ चलने का निर्णय ले लिया है ? या यह भी संभव है कि एसडीजी के नियमो के अनुसार सभी विपरीत शक्ति केंद्र एक होकर किसी निर्णय पर पहुंचने वाले हैं ? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी सभी शक्तियों ने मिल बैठकर एक नए विश्व की कल्पना की थी और UNO से लेकर वर्ल्ड बैंक तक के निर्माण हुए किन्तु जैसे जैसे कम्युनिस्ट लॉबी कमजोर होती गई वैसे दुनिया बदलती चली गई। एक बार फिर रूस और चीन शक्तिशाली होकर सामने आए हैं तथा विश्व की मध्य एशिया के तेल पर निर्भरता कम होते जाने के कारण स्थितियों में बदलाव आने शुरू हो गए हैं।

संकेत तो यही कहते है कि करोना काल की समाप्ति के बाद दुनियां नए नियमों एवम् नए कलेवर के साथ सामने आएगी जिसमे रूस एवम् चीन की प्रमुख भूमिका रहेगी वैसे भी अमेरिका, ब्रिटेन तथा पश्चिमी ताकतों के पास कोई अन्य विकल्प भी नहीं बचा।।

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अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

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कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के शताब्दी समारोह के अवसर पर थियानमेन चौक पर आयोजित समारोह में प्रीमियर शीं जिंगपिग ने अपने संबोधन में विश्व को एक प्रकार से चेतावनी देते हुए बहुत आक्रमक रुख से भाषण दिया। ...

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