पत्रकारिता ! दो धारी तलवार पर असूलो के साथ टकराव लेने वाला व्यवसाय।

कहते है कि सहाफत या कलम "या तो क्रांति का कारण बनती हैं अन्यथा सलवार में नाड़ा डालने का औजार" शुरू से ही सहाफत अर्थात पत्रकारिता को तोप के मुकाबिल समझा जाता रहा है और अक्सर सरकारें विशेष कर तानाशाह की बंदूके कलम से खौफ खाती हैं लेकिन कभी कभी प्रतिस्पर्धा और कम्पिटीशन के कारण पत्रकार भी स्थापित मर्यादा को तोड़कर दिक्कत में फस जाते है बेशक अक्सर सत्ता का अहंकार जर्नलिज्म से टकराव मोल लेता रहता है।

हाल की घटना का सन्दर्भ उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद शहर का है जहां की एक वीडियो वायरल हुई जिसमे किसी बुज़ुर्ग की पिटाई की जा रही थी तथा बाद में उस पीड़ित ने आरोप लगाया कि उसकी दाढ़ी काट दी गई तथा उसे धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया।। क्योंकि गत काफी समय से भारतीय, विशेषकर हिंदी पट्टी ( Cow belt ) क्षेत्र में लींचिंग की घटनाओं के बाद बीजेपी नेताओं द्वारा दंगा आरोपियों को सम्मानित करने की घटनाएं भी सामने आई थी तो समाज के एक वर्ग विशेषतः अल्पसंख्यक समुदाय में गुस्सा एवम् असुरक्षा की भावना घर कर गई ।

इस घटना के बाद कई पत्रकारों एवम् स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिकों ने न केवल कथित अमानवीय हरकत की निंदा की अपितु सरकार तथा पुलिस की व्यापक आलोचना भी की।। एक ओर तो जनता में महामारी के दौरान सरकार की नाकामी के कारण गुस्सा था दूसरा शीघ्र ही चुनावों की आहट से सरकार या बीजेपी परेशान थी तो वीडियो को और ज्यादा प्रसारित किया गया एवम् हवा दी गई।। साथ ही गत दिनों भारत सरकार के सोशल मीडिया को लेकर बनाए गए नए नियमों के कारण भी मीडिया प्लेटफार्म्स का शासन से टकराव चल रहा है तो नतीजा कलम की स्याही का नाड़े के साथ साथ स्याही बिखरने और दाग लगने की शक्ल में सामने आ गया।

बुज़ुर्ग से मारपीट करने वाले 5 आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ ही सरकार ने ट्विटर सहित वेब पोर्टल एवम् स्वतंत्र पत्रकारों पर भी सांप्रदायिक भावनाए भड़काने के प्रयास के आरोप में एफआईआर दर्ज करा दी।। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया द्वारा इसकी निंदा की गई है किन्तु यहां पत्रकारों द्वारा भी बेसिक नियम पालन नहीं किए गए शायद इसके पीछे उनकी सबसे पहले, सबसे तेज खबर वाली सोच रही होगी।। नियमानुसार किसी भी घटना की रिपोर्टिंग से पहले दोनों पक्षों से उनका दृष्टिकोण एवं विचार लिए जाने जरूरी थे किन्तु इस घटना में वीडियो को वायरल करने से पहले शायद प्रशासन से वजाहत नहीं कराई गई।

हालांकि इसका मुख्य कारण शासन, प्रशासन की गिरती हुई साख तथा पुलिस के प्रति जनता का अविश्वास भी है और इससे पहले यूपी सरकार द्वारा पत्रकारों के विरूद्ध की गई कार्यवाहियां भी है जिसमे एक केरल के पत्रकार पर लगे आरोप अदालत द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं किन्तु अभी भी वो UAPA के अंतर्गत काफी समय से जेल में बंद हैं।। भारतीय प्रधानमन्त्री ने जी सेवन के अपने वर्चुयल संबोधन में जरूर स्वतंत्र मीडिया एवम् विचारो की अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात की है किन्तु व्यवहार में प्रशासनिक तंत्र का अति उत्साह मे उठाया गया कदम सरकार एवम् प्रधानमन्त्री की साख पर बट्टा लगाता है।

यह समय जब विश्व एक बड़े परिवर्तन की ओर तेजी से बढ़ रहा है सरकार, शासन एवम् पत्रकारों को बहुत सोच विचार कर ही कोई कदम उठाना चाहिए अन्यथा भारत जो सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है कब उत्तरी कोरिया की तरह कहलाया जाना शुरू हो जाएगा, इसका अहसास होने तक बहुत देर हो चुकी होगी।।

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अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

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1 July कनाडा दिवस या Confederation day of Canada

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