पवन गुरु पानी पिता, माता धरत महत्त........

यदि दुनियां के समाजिक परिवर्तनों से हुए बदलावों के कारण कोई सबसे ज्यादा हैरान करने वाला विषय होना चाहिए तो वो पंजाब में बोतल बन्द पानी की बिक्री।। कभी दुनियां भर से आने वाले सैलानी जब भी अमृतसर या लाहौर आते थे तो अमृतसर की मक्खन से लबरेज लस्सी और घी में डूबी हुई दाल जरूर खाते थे इसी प्रकार लाहौर आने का मतलब लक्ष्मी चौक के गवाल मंडी का चना मुर्गा या मुगलई नान।। कहते है कि लाहौर या अमृतसर की सेठानी यदि बीमार हो जाती थी तो उसके परिवार वाले उसके लिए एक दोना मलाई फालतू लाकर खिला देते थे क्योंकि पंजाब का पानी पीने के बाद इंसान कभी बदहजमी से नहीं मर सकता था।

( भूख से भी सम्भव नहीं था ) उसी पंजाब को भविष्य में जल संकट का भी सामना करना पड़ेगा यह भयानक से भी भयावह है। वैसे पीने के पानी की शुद्धता का स्तर तो यहां तक बिगड़ चुका है कि गावों में भी आर ओ लगे हुए है तथा दुनियां में सबसे ज्यादा हेपेटाइटिस के मरीज पश्चिमी पंजाब से आते है। पूर्वी पंजाब में पानी के कारण होने वाली बीमारियों के मरीज खतरे के स्तर से भी ऊपर निकल चुके है।। यदि वृहद पंजाब का विश्लेषण किया जाए तो अंबाला के बाद मुल्तान तक का बहुत बड़ा इलाका किसी समय दलदली जमीन हुआ करता था।

लाहौर में लेकर लायलपुर तक बांसों के जंगल होते थे जिसके कारण विदेशी आक्रमणकारी अक्सर मुल्तान या बहावलपुर से ही रास्ता बदल कर वर्तमान भारत में प्रवेश करते थे क्योंकि मध्य पंजाब की दलदली जमीन में उनके घोड़े नहीं चल सकते थे तथा लब्लबाती नदियां पार करना भी उनके लिए असम्भव जैसा था।।। इसके बाद 1857 की क्रांति के समय पंजाबियों ने अंग्रेज़ो का साथ दिया और अंग्रेज़ो ने इस जमीन तथा यहां के निवासियों की जीवटता को परखा तो नदियों पर पुल बनाए एवम् नहरें बना कर सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध कराई लेकिन ऐसा उन्होंने जनता की भलाई के लिए नहीं किया था अपितु अपने खाद्यान्न सुरक्षा के दृष्टिकोण से किया था।

नहरों के साथ नई जमींदारियां बांटी गईं और उन्हें नील एवम् चावल की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया। यदि भोजन की आदतों को अध्ययन किया जाए तो पंजाबियों की खान पान की आदते तुलनात्मक रूप से आर्यन सभ्यता से अलग मिलती हैं।। आज भी पंजाब में भोजन का मुख्य भाग मोटा अनाज या गेंहू के साथ फल, सब्जियां तथा लाइव स्टोक होता है। चावल पंजाब की थाली में किसी विशेष आयोजन की तरह होता है और उसमें भी किसी सहायक की तरह ही स्थान प्राप्त करता है।

लेकिन यदि दोनों ओर के पंजाब को इकठ्ठा कर दिया जाए तो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक चावल का उत्पादक क्षेत्र यही होगा, वैसे भी गुजरांवाला के आसपास का इलाका धान का कटोरा कहलाता था बेशक वहां के निवासी कभी ब्लू मून पर ही चावल पकाते हो।। लेकिन इन सबके बावजूद आज भारत में पंजाब चावल उत्पादन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा राज्य है और यदि उपलब्ध जमीन के अनुसार गणना करे तो पंजाब सर्वाधिक चावल उगाने वाले किसानों की धरती के रूप में स्थापित होता हैं।

निसंदेह 1960 के दशक के भूख के संकट के बाद पंजाब द्वारा हरित क्रांति और अन्न उपजाओं आंदोलन के कारण देश को भुखमरी से बचा लिया गया लेकिन इसके लिए पांच जल ( आब ) के अपने जन्म नाम की कुर्बानी भी देनी पड़ी।। वर्तमान में भूजल का तेजी से गिरता स्तर, नदियों का प्रदूषित होना एवम् खेती के अवैज्ञानिक तरीके के कारण पानी की उपलब्धता पर प्रमुखता से ध्यान देने की आवश्यकता है।। यदि नदियों के जल प्रवाह एवं पानी की उपलब्धता का विश्लेषण किया जाए तो बंगाल एवम् बिहार में प्रत्येक वर्ष बाढ़ के कारण ही फसलें बर्बाद होती हैं शायद इसी के कारण वहां के निवासी चावल बहुतायत से इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन यदि सरकारें और राजनेता ईमानदारी से नदियों के पानी का प्रबन्ध नहीं करते या भ्रष्टाचार के कारण योजनाएं फलीभूत नहीं होती तो वहां की जनता को भी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए तथा अपने खानपान की आदतों में वक्त के हिसाब से बदलाव करना चाहिए।

पंजाब के किसानों को भी भविष्य के मद्देनजर अपने खेती के तरीकों में व्यापक बदलाव एवम् फसलों के वैज्ञानिक आधार पर चयन करने तथा उत्पादन करने की आवश्यकता है क्योंकि जल है तो कल है और तभी जीवन है।। अन्यथा पंजाबियों की चर्चा करते हुए दुनियां हैरान होगी कि जब आए गए के कारण अपनी रसोई में चावल पकाते हो तो भविष्य का पीने लायक पानी भी बर्बाद करके चावल ही क्यों उगाते हो ?? सिर्फ मक्खन नाल काम्म नहीं हुंदा, कदी कदी चौल वी खादा करो ।

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