अमेरिकी राष्ट्रपति के तूफानी दौरे और नाटो चार्टर में महत्वपूर्ण बदलाव के साथ विश्व एक नए प्रकार के ब्रह्माण्ड युद्ध की ओर !

अक्सर किसी भी म्यूजियम में जाते है और प्राचीन काल के यौद्धाओं के जिरह बख्तर, भारी भारी तलवारे या अन्य हथियार देखकर न केवल हैरानी होती हैं अपितु सोचते है कि वो कैसा समय रहा होगा जब भारी पत्थर फेंकना युद्ध का हिस्सा होता था और पत्थर फेंकने वाली मशीन भी हार जीत का फैसला कर देती थी। कुछ ऐसा ही बाबर के तोपखाने को देखकर लगता है कि चंद मीटर दूर आग का गोला फेंकना आज के युग की मिसाईल की तुलना में कितना पिछड़ा हुआ हथियार था।

कल्पना करे कि अगली पीढ़ी जब बुढ़ापे में म्यूजियम जाए तो उसे लगे कि लोहे के बड़े बड़े टैंक और बहुत बड़ी मिसायिले भी आपसी युद्ध का हिस्सा कैसे रही होंगी या भारी भारी बन्दूक और मोर्टार दागते सैनिक कैसे होंगे तो इसे कोई फनतासी न समझा जाए क्योंकि शायद भविष्य के युद्ध के बाद ऐसा ही होने वाला है।। एक बार फिर कल्पना को हकीकत में बदलने का समय आ चुका है जिसमे हम Star Wars की पटकथा को हकीकत में होते देख सकेंगे।

नाटो संगठन के सम्मेलन के बाद जारी प्रेस रिलीज में जो महत्वपूर्ण बिंदु है वो है नाटो चार्टर के आर्टिकल 5 में बदलाव। अभी तक के नियमो एवम् समझौते के अनुसार यदि सोवियत संघ या उसके सहायक देशों ( वारसा संधि ) के द्वारा कोई सैनिक हमला किया जाता हैं तो सभी नाटो देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करेंगे तथा अपने सैनिकों के द्वारा संगठित होकर जवाब देंगे।। लेकिन न तो सोवियत संघ रहा न वारसा संधि फिर नाटो संगठन क्या करता ? कुछ इसी प्रकार के सवालो के साथ ट्रंप सरकार ने नाटो को वेस्टेज ऑफ़ मनी करार दिया था क्योंकि बदलते परिवेश के साथ साथ युद्ध के तरीके भी बदल गए थे और देशों की जरुरते भी।

कभी अनाज के लिए लडे जाने वाले युद्ध तेल या ऊर्जा के ईंधन के लिए लडे जाने लगे और महाशक्तियां अपने सहयोगी देशों को उसी दृष्टिकोण से सहायक बनाने लगी जिसे जिओ पॉलिटिक्स का नाम दिया गया। भविष्य में "एस्ट्रो पॉलिटिक्स" भी सुनने को मिलेगी इसे NewsNumber के सन्दर्भ से याद रखे।। समय के साथ तकनीक का विकास हुआ और सूचना क्रांति के युग में डेटा किसी भी मूल्यवान वस्तु से अधिक मूल्यवान हो गया तथा छोटी सी चिप एवम् उसमे इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ मेटल ज्यादा अहम हो गए।

एक देश द्वारा दूसरे देश पर किए गए सायबर अटैक किसी भी मिसायिल अटैक से ज्यादा नुकसानदेह साबित होने लगे और हैकिंग के साथ साथ उसकी फिरौती वसूलना भी युद्ध का हिस्सा बन गया।। गत दिनों अमेरिका की पाइप लाइन ब्लॉक पर सायबर अटैक, कराची एवम् मुंबई की पॉवर सप्लाई को हैकिंग द्वारा बाधित कर देना या ईरान के न्यूक्लियर प्लांट में विस्फोट जिसे इजरायल द्वारा सायबर हैकिंग के माध्यम से किया जाना स्वीकार भी किया गया उसके अतिरिक्त उड़ते हुए जहाजों का जीपीएस सिस्टम एवम् कंट्रोल टॉवर से सम्पर्क तोड़ कर दिशाहीन किया जाना ,, बहुत से उदाहरण हैं जिनसे नए प्रकार के युद्ध का आभास होता है।

नाटो संगठन के वर्तमान सम्मेलन में परिवर्तन के साथ अब सायबर अटैक को भी घोषित युद्ध की श्रेणी में रखा गया है यद्धपि इसके साथ कई व्यवहारिक सवाल खड़े है जिनका जवाब फिलहाल तो नहीं दिया गया जैसे हैकर की नागरिकता तथा स्थान का तय करना आदि।। लेकिन सायबर प्रणाली चलती कैसे हैं ? यदि इस विषय पर विचार किया जाए तो फिर स्टार वार सामने आ जाता हैं। आज इंटरनेट तथा डेटा ट्रांसफर या सूचनाओं का आवागमन सेटेलाइट के माध्यम से होता है और अधिकांश ( लगभग 2000 ) सेटेलाइट पृथ्वी के ऑर्बिट में तेजी से घूम रहे हैं जो real time डाटा ट्रांसफर करते है।

यदि किसी देश पर सायबर अटैक या हैकिंग की जाती हैं तो उसमे इन सेटेलाइट्स का अहम योगदान होता है इसलिए प्रश्न उठता है कि क्या धरती से बाहर भी धरती के कानून लागू हो सकते है ? यदि धरती के ऑर्बिट को किसी देश ने अपनी सम्पत्ति घोषित कर दिया तो उसके विरूद्ध क्या नियम लागू होंगे अथवा इसे दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करे तो फिलहाल पृथ्वी की कक्षा की मलकियत किस देश, महाद्वीप या संगठन की है ? कल्पना करे कि भविष्य में यदि और अधिक सेटेलाइट के लिए जगह नहीं बचती तो क्या होगा या यदि कोई देश अपने शत्रु देश के सेटेलाइट को ही तोड़ देता है तो क्या होगा ? इन्हीं सबके मद्देनजर नाटो चार्टर में बदलाव प्रस्तावित है जिससे कोई बड़ा सायबर अटैक करके सेटेलाइट को ही भ्रमित न करें या उसका सॉफ्टवेयर ही हैक न करें।

वैसे भी यदि फिजिकली किसी सेटेलाइट पर हमला करना हो तो उसके लिए अति शक्तिशाली रॉकेट चाहिए होंगे अन्यथा हैवी लेजर बीम से ऐसा करना सम्भव होगा जिसका प्रदर्शन गत वर्ष चीन ने साउथ चाइना सी में किया था।। यह सब आशंकाए इशारा करती हैं कि दुनियां की बड़ी ताकते धरती को बचाने के लिए धरती से बाहर किसी युद्ध की तैयारियों में जुट चुकी हैं और अगले युद्धों में बारूद की गंध तथा धमाकों का शोर किसी परी पुराण की तरह लगेगा। शायद अब युद्ध स्पेक्ट्रम तरंगों तथा लेजर बीम से लडे जाएंगे।

यह सत्ताओं की सोच और शक्तियों के निर्णय है जो आज भी साधारण इंसान को गुलाम या गिनी पिग से बेहतर नहीं समझते क्योंकि अब सरकारों से सवाल पूछने वाले सुकरात पैदा नहीं होते, प्रेम का संदेश देने वाले यशु का अवतार नहीं होता और पड़ोसी की भूख से द्रवित होकर अपनी आधी रोटी बांटने वाला मोहम्मद नहीं दिखता या सरवत दा भला करने वाला नानक नहीं आता। लेकिन इनके अनुयाई भी आवाज़ नहीं उठाते कि भूख से भी अधिक थाली भरना पाप क्यो नहीं कहलाता ?

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