हैदराबाद की चारमीनार और दिल्ली का गुरुद्वारा बंगला साहिब! एक अनोखी समानता।

क्या ईश्वर का अस्तित्व है ? क्या कष्ट के समय ईश्वर से की गई प्रार्थना का कोई असर होता है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर तलाशना विवादित हो सकता है क्योंकि नास्तिकता के अपने तर्क होते है तो आस्तिकता की अपनी आस्था यद्धपि ईश्वर के नाम पर चंदा या गोलक हज़म करने वालो को ईश्वरीय अस्तित्व की चिंता नहीं होती।

भारत के दो धार्मिक स्थल ऐसे हैं जिनका आज के महामारी के समय में जरूर उल्लेख करना चाहिए इनमे से एक इस्लाम धर्म के अनुयायिओं का पूजा स्थल ( मस्जिद ) के स्वरूप में है तो दूसरा सिखो सहित अधिकांश दिल्ली वासियों के लिए श्रद्धा का स्थल है ( गुरुद्वारा साहिब ) भारत के तेलंगाना राज्य के हैदराबाद जिसे हैदराबाद दक्खन भी कहा जाता है वहां की चारमीनार जिसे भवन निर्माण अथवा वास्तु शैली के रूप में तो अतुलनीय उदाहरण माना ही जाता है किन्तु इसका सम्बन्ध महामारी के फैलने तथा उसके निदान से भी है।

1591 सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह ( कुतुब वंश के पांचवे सुल्तान ) के शासन काल में हैदराबाद एवम् आसपास के क्षेत्रो में प्लेग महामारी फैल गई और जब उसका कोई निदान नहीं मिला तो सुल्तान ने मुसी नदी के किनारे खड़े होकर प्रार्थना की " ओ अल्लाह इस शहर को शांति एवम् समृद्धि प्रदान कर तथा सभी जातियों के इंसानों को ऐसा जीवन दे जैसा पानी में मछली को देता है" इसके साथ ही सुल्तान ने मन्नत मांगी कि महामारी से निजात मिलने पर वो ईश्वर को धन्यवाद स्वरूप एक पूजा स्थल का निर्माण कराएगा तथा इसके साथ ही मुसी नदी के पूर्वी तट पर चार मीनार का निर्माण कराया गया जिसके सबसे उपरी फ्लोर पर मस्जिद बनाई गई।

जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है इसकी चार मीनारे हैं जिनकी ऊंचाई 48.7 मीटर ( 159.77 फिट ) हैं तथा उपर तक जाने के लिए प्रत्येक मीनार में 149 सीढ़ियां है।। शांति के साथ समृद्धि की कामना भी थी तो इस क्षेत्र में 14,000 दुकानें स्थापित की गई जिनमे से अधिकांश सोने के जेवरात तथा मोतियों का व्यापार करती है। इसके अतिरिक्त क्योंकि इस क्षेत्र से मध्य एशिया में बहुत बड़ी संख्या में लोग काम करने जाते हैं तो यहां दरहाम, रियाल जैसी करेंसी को बदलने वाले भी बहुतायत में मिलते है।

यद्धपि मुस्लिम बहुल क्षेत्र है किन्तु हिंदी भाषी क्षेत्रों की तरह सांप्रदायिक तनाव कभी व्यवहार में नजर नहीं आता वैसे राजनीतिक दृष्टिकोण से यह असद्दुदीन ओवैसी का निर्विवाद क्षेत्र है।। आज़ादी से काफी पहले से ही निज़ाम हैदराबाद के काल में यह कला एवम् व्यापार का विश्व विख्यात क्षेत्र रहा था और जब बटवारा हुआ तो यहां से बहुत से मुस्लिम हैदराबादी पाकिस्तान चले गए लेकिन उनके दिलो में बसा हैदराबाद ने उन्हें पराया नहीं होने दिया जिसका उदाहरण कराची के बहादराबाद क्रॉसिंग पर बनी चार मीनार की अनुकृति है जिसका निर्माण 2007 में पूरा हुआ।

इसी क्रम में दिल्ली का गुरुद्वारा बंगला साहिब जिसके प्रवेश पर ही लिखा है "श्री हरिकिशन ध्याइए, जिस डिटठे सब दुख जाए" बाल स्वरूप गुरु हरिकिशन जी का दिल्ली में आगमन हुआ तो हैजा और चेचक महामारी फैली हुई थी, गुरुजी को जयपुर के राजा जय सिंह ने अपने बंगले में रुकने की प्रार्थना की जहां गुरुजी के आदेश से एक कुई खोदी गई तथा उसका जल आश्चर्यजनक रूप से महामारी के इलाज में चमत्कार की तरह प्रभावी महसूस किया गया जिससे राजा जयसिंह ने वो बंगला गुरुजी को भेंट कर दिया।

1783 में जब बाबा बघेल सिंह जी ने लाल किला फतह किया तो यहां न केवल गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कराया अपितु एक सरोवर का निर्माण भी कराया जिसके सम्बन्ध में अधिकांश दिल्ली वासियों की आस्था है कि किसी भी असाध्य रोग से पीड़ित रोगी यदि लगातार 40 दिन उस सरोवर में स्नान करे तो रोग मुक्त हो जाता है।। गुरुद्वारा बंगला साहिब की एक विशेषता यहां आने वाले श्रद्धालुओं में अन्य धर्मों में आस्था रखने वालो की संख्या है जो श्रद्धा भाव से आते भी है और लंगर में भाग भी लेते हैं।

यद्धपि इनका कोई सम्बन्ध वर्तमान में चल रहे राम मंदिर निर्माण एवम् उसमे चंदा चोरी के आरोपों से दूर तक नहीं है क्योंकि इतिहास के किसी भी अध्याय में मस्जिद या गुरुद्वारा निर्माण में किसी हेराफेरी के कलंक का एक बिंदु भी नहीं मिलता।।

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