गलवान घाटी में हुई सैनिकों की शहादत के एक साल बाद कौन कहां खड़ा है ?

चीन एक ऐसा देश जिसका नाम लेते ही गुजरी पीढ़ी को 1962 का भारत चीन युद्ध याद आ जाता है जिसे कुछ लोग नेहरू जी की असफल नीतियों का परिणाम मानते है तो कुछ माओ तथा चायु एन लाई द्वारा दिया गया धोखा।। बहरहाल राजनीति और सियासत जरूरी नहीं है कि सभी हकीकतों को जनता तक पहुंचने दे लेकिन फिर भी अनुमान तो लगाए जा सकते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य ने दक्षिण एशिया अथवा भारतीय उपमहाद्वीप से निकलने की जल्दबाजी में बहुत से नासूर छोड़ दिए थे। चाहे जानबूझकर ऐसा किया या अनजाने में किन्तु ब्रिटिशर्स की इस चाल से क्षेत्र की शांति पर जरूर सवाल खड़े होते रहे जिसमे कश्मीर तथा मैकमोहन लाइन प्रमुख है।

दुर्भाग्य से चीन के हालिया विवाद में इन दोनों का अहम रोल है और उसे हवा दी भारत सरकार के सलाहकार मंडल एवम् भारतीय गृहमंत्री के अव्यवहारिक बयानों एवम् फैसलों ने जिसके कारण पिछले साल चीन ने भारत के साथ वो किया जिसकी आशा भी नहीं की जा सकती थी।। यदि पिछले अनुभवों को देखे तो 1962 के बाद केवल 1975 में चीन ने कुछ सख्त बयान भारत के विरूद्ध दिए थे जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिक्किम का विलय करके उसे भारत का राज्य घोषित कर दिया था। फिर उसके बाद राजीव गांधी के कार्यकाल में भी एक बार सैनिक झडप हुई थी जिसमें दावा किया जाता हैं कि चीन के लगभग 300 सैनिक जाया हुए।

उसके बाद लंबे समय तक शांति रही तथा अटल बिहारी के कार्यकाल में चीन से रिश्ते मजबूत करने की एकतरफा कोशिश शुरू की गई लेकिन सरकारें भूल गई कि शत्रु को कभी भी अपनी असलियत नहीं बतानी चाहिए क्योंकि पड़ोसी यदि शत्रुता की भावना भी रखता हो तो समय और अवसर मिलते ही वार जरूर करता है।। सम्भव है कि संघ एवम् बीजेपी का यह नीतिगत फैसला रहा हो जिसके कारण चीन से सामान्य प्रोटोकल से हटकर भी सम्बन्ध स्थापित किए गए और श्री नरेंद्र मोदी भारत के एकमात्र ऐसे प्रधानमन्त्री है जिन्होंने 18 बार से भी अधिक चीन की यात्रा की है।

डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में चीन और भारत के बीच सीमा विवाद को अगली पीढ़ी तक स्थगित रखने पर सहमति बनी थी एवम् वास्तविक नियंत्रण रेखा के दोनों ओर सैनिकों की गश्त के समय किसी प्रकार के हथियार इस्तेमाल न करने का समझौता भी हुआ था।। चीन ने इसके साथ ही पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगिट बाल्टिस्तान से अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना सिपेक प्रारम्भ की तथा भारत को भी इसमें शामिल होकर लाभ उठाने का निमंत्रण दिया। चीन के आग्रह पर डॉ मनमोहन सिंह जी की सरकार सकारात्मक सोच से विचार कर रही थी एवम् कुछ बिंदुओं पर सहमति तथा कुछ पर वार्ता चल ही रही थी कि भारत में मोड़ी सरकार को बहुमत प्राप्त हो गया।

चीन को कुछ समय बाद ही अहसास होने लगा कि वर्तमान सरकार अमेरिकी खेमे की अंध समर्थक है जो उसके हितों के लिए खतरा बन सकती हैं तथा टकराव के संकेत मिलने शुरू हो गए।। टकराव एवम् चुनौती उस समय अपने शीर्ष पर पहुंच गई जब चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के समय ही पीपुल्स आर्मी डोकलाम में घुस आई तथा अपने टेंट लगा लिए हालांकि एक लम्बी बातचीत के बाद भारत सरकार द्वारा दावा किया गया कि चीनी सेना वापिस लौट गई है।। इसके बाद घटना क्रम में अगस्त 2019 में तेजी आई जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 कमजोर करके उसे दो हिस्सो मे बाटकर केंद्र शासित क्षेत्र बना दिए गए तथा लद्दाख को अलग क्षेत्र घोषित करने के साथ साथ भारतीय गृह मंत्री द्वारा pok पर शीघ्र काबिज होने की घोषणा संसद में कर दी गई।

यदि कश्मीर घाटी तथा लेह लद्दाख का इतिहास देखा जाए तो इसे तिब्बत से छीनकर हिंदुस्तान का हिस्सा बनाने का लाहौर सल्तनत या महाराजा रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य को अधिक समय भी नहीं हुआ था लेकिन वर्तमान में चीन की सड़क परियोजना पर भारत की ओर से एकमात्र सबसे बड़ा खतरा यहीं से था।। भारत के सेनाध्यक्ष द्वारा ढाई मोर्चे पर लडने की तैयारी जैसे राजनीतिक बयानों ने हालात को और बिगाड़ा तथा चीन ने पिछली गर्मियों मे भारतीय सीमा में अतिक्रमण करके अपना वर्चस्व कायम कर लिया।। शुरुआती दौर में चीन की घुसपैठ को या तो नजर अंदाज किया गया या जनता से छुपाया गया हालांकि बीजेपी के लद्दाख के सांसद ने सरकार को चेतावनी भी दी थी।

उसी कड़ी में सरकार एवम् भारतीय सेना द्वारा अपने प्रयास जारी रहे लेकिन चीनी सेना को पीछे नहीं धकेला जा सका। एक निर्णय के अनुसार भारतीय सेना की टुकड़ी को आदेश जारी किया गया कि आधी रात को हल्ला बोल कर चीनियों को खदेड़ दिया जाए ।। आदेशों का पालन करते हुए एक कम्पनी कर्नल रैंक के अफसर के नेतृत्व में रवाना हुई किन्तु रणनीतिक गलत निर्णयों के कारण उसे चीनी सेना का टकराव मिला जिसके परिणाम स्वरूप भारत के बीस सैनिक जिसमे अफसर एवम् जेसीओ साहेबान भी शामिल थे शहीद हो गए।

इसका सबसे शर्मनाक पहलू यह था कि पहले तो भारत सरकार द्वारा उनकी शहादत को स्वीकारने में देरी लगाई गई फिर प्रधानमन्त्री द्वारा घोषणा कर दी गई "न कोई घुसा था न कोई घुस आया है" इसके अतिरिक्त दस भारतीय सैनिकों को चीनी सेना द्वारा बंधक बनाए रखने के समाचार को भी भारत सरकार या सेना मुख्यालय द्वारा शुरू में तो स्वीकार ही नहीं किया गया था।। क्योंकि उसी दौरान बिहार में चुनाव प्रचार भी चल रहा था तो प्रधानमन्त्री द्वारा शहीद सैनिकों के चित्र लगाकर रैली करने की भी बहुत आलोचना हुई जिसके कारण चुनाव आयोग द्वारा सेना के नाम पर वोट मांगने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

लेकिन आज एक साल बाद क्या स्थिति है ? एक साल बाद सर्दियों मे सेनाओं के पीछे हटने के बाद फिर से चीन ने अपना बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर लिया है, तिब्बत में पांच सैनिक हवाई पट्टी विकसित कर ली है तथा सीमा तक 5 G सुविधा सहित फाइबर केवल बिछा लिया है।। भारत की ओर से की गई तैयारियों को सार्वजनिक करना देशहित में नहीं समझा जाता इसलिए अभी तक सब गोपनीय रखा गया है।

किन्तु जिस प्रकार कश्मीर घाटी में हलचल हो रही हैं एवम् आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं उससे संकेत मिलता हैं कि स्थिति सामान्य तो बिल्कुल भी नहीं है।। आशा करनी चाहिए कि शांति कायम रहे और सौहार्द से सभी का विकास हो।। ग्लवान घाटी के अमर शहीदों को News Number परिवार सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए नमन करता है।।

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