अफगानिस्तान का भविष्य ? आज के हालात पर NewsNumber की विशेष रिपोर्ट

अफ़गान तालिबान के परचम तले अफगानिस्तान के विभिन्न गुटों का एक होकर सामने आना, अमेरिका से लंबी बातचीत और अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद की स्थितियां ये कुछ ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं जिनका जवाब तलाशने के लिए News Number ने एक सार्थक कोशिश की है।। विश्व के परिदृश्य में ऐसा बहुत कम हुआ है जब अमेरिका ने सीधे सीधे किसी युद्ध में हिस्सा लिया हो क्योंकि यूएस का इतिहास तो यही बताता है कि पेंटागन अपने सहयोगियों को आगे लगाकर युद्ध का आगाज़ करता है और उसकी अर्थव्यवस्था का स्रोत भी यही रहा है।

ट्रंप ने इसने आमूल चूल परिवर्तन किए तथा इसके साथ ही विशेष रूप से यूरोप से यह आवाज़ बुलंद होनी शुरू हो गई कि इन युद्धों या कंफ्लिक्ट्स के पीछे उन्हे क्या हासिल होता है ? नाटो संगठन में अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बेशक दबे शब्दो मे लेकिन फ्रांस एवम् जर्मनी ने जरूर ऐसे ही संकेत दिए हैं और राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा इस्लामोफोबिया के सन्दर्भ मे दिया बयान भी इसकी पुष्टि करता है।। अफगानिस्तान के भविष्य एवम् दक्षिण एशिया पर आशंकित असर से पहले यदि नाटो के इतिहास को भी दोहरा लिया जाए तो सुविधा रहेगी। स्टालिन द्वारा सोवियत संघ को चुनौती की तरह खड़ा करने के बाद पश्चिमी जगत ने 1949 में नाटो की स्थापना की जिसके आर्टिकल पांच के अनुसार यदि किसी भी नाटो सदस्य पर हमला होता है तो सभी सदस्य मिलकर उसका मुकाबला करेंगे।

यद्धपि केवल एक बार ही इस आर्टिकल क तहत नाटो फोर्सेज एकत्र हुई थी किन्तु अफगानिस्तान में नाटो एवम् अमेरिकी फोर्सेज आतंकवाद के खात्मे तथा देश के निर्माण के बहाने से दखल देने आई जिसका नाटो के चार्टर में कोई उल्लेख ही नहीं है।। दूसरा प्रश्न राष्ट्रपति मैक्रों ने उठाया जिसके अनुसार जब सोवियत संघ का वजूद ही नहीं रहा तो नाटो किस लिए मौजूद है क्योंकि यदि पेंटागन नाटो संगठन के माध्यम से साउथ चाइना सी में चीन के विरूद्ध कार्यवाही करने का आहवान करता है तो नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी और एशिया या इंडो पेसिफिक में उसका क्या काम ? यही सवाल अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के सम्बन्ध में चर्चित हुआ है।। हालांकि अमेरिका द्वारा संकेत दिए गए हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी हो रही है अमेरिका की नहीं लेकिन उसको निकटवर्ती देशों द्वारा अड्डे उपलब्ध न कराना तथा पाकिस्तान द्वारा किसी प्रकार का भी सहयोग न देने की घोषणा अंततः अफगानिस्तान को विकल्पहीन खड़ा कर देता है।

अशरफ गनी द्वारा अचानक अमेरिका का दौरा कुछ क्षेत्रो मे उनका पलायन समझा जा रहा है तो कुछ विश्लेषकों द्वारा अफ़गान तालिबान का बढ़ता वर्चस्व।। भविष्य की योजनाओं के सम्बन्ध एवम् गत समय तालिबान शासन द्वारा पाषाण कालीन व्यवस्था के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि 1996 में जब तालिबान ने शासन संभाला था तो उस समय देश गृह युद्ध की स्थिति में था एवम् अराजकता व्याप्त थी जिसको समाप्त करना उनकी पहली प्राथमिकता थी इसलिए शिक्षा एवम् महिलाओ की भागीदारी पर ध्यान नहीं दिया जा सका किन्तु भविष्य की योजना में इस्लामी निज़ाम कायम करने के साथ ही महिलाओ को "उचित" भागीदारी दी जाएगी।

यहां उचित शब्द अवश्य एक संशय पैदा करता है किन्तु शायद बदलते माहौल में आइंदा वैसा नहीं होगा जैसा पिछली छह साल की तालिबानी सरकार के दौरान हुआ।। आज भी अफगानिस्तान के बहुत से हिस्सो मे लड़कियों के स्कूल चल रहे हैं तथा तालिबान द्वारा उन पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई लेकिन क्या भविष्य में भी यदि वो सत्ता में आते हैं तो शांति एवं शिक्षा कायम रखने में कामयाब होंगे ? अभी तो इसकी संभावना लगती हैं जिसके पीछे ईरान का तालिबान के विरूद्ध न होना, पाकिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान का समर्थन एवम् भारत का अपने आंतरिक मामलों तथा आर्थिक स्थिति पर घिरा होना मुख्य कारण समझे जा सकते है।

पिछली बार के गृहयुद्ध के समय उज़्बेज लड़ाकों तथा ईरान की छिपी मदद अशांति का मुख्य कारण था। इसके अतिरिक्त तालिबान का यूएस से छिपा हुआ सम्बन्ध एवम् अफगानिस्तान में रूस एवम् चीन के हितों को भी नजर अंदाज़ नहीं करना चाहिए।। फिलहाल जिस प्रकार चीन के विरूद्ध क्वाड देशों की ओर से किंतु परंतु के साथ अमेरिका का खुलकर समर्थन न करना तथा यूरोपियन देशों द्वारा फिलहाल चीन के विरूद्ध कुछ न बोलना भी एक संकेत है कि भविष्य में यूएस को वैसा अंध समर्थन नहीं मिलने वाला जैसा अभी तक मिलता रहा है। लेकिन यदि सब कुछ इसके विपरीत होता है और पेंटागन डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर या प्रोक्सी के माध्यम से वहां अशांति को अपने राष्ट्रीय हित समझता है तो क्या होगा ?

क्या भारत को भी किसी दबाव में यूएस का साथ देना पड़ेगा ? ऐसे हालात में पाकिस्तान का क्या रोल होगा ? क्या फिर से भारत पाकिस्तान आमने सामने होंगे और दक्षिण एशिया युद्ध का अखाड़ा बन जाएगा ? यदि ऐसा हुआ तो क्या चीन शांत रहेगा या भारत को अमेरिका का सहयोगी न बनने देने के लिए तीसरा फ्रंट खोल सकता है ? यह सब अशांत करने वाले सवाल भी सामने आते है तथा इनका कोई बेहतर संकेत भारत के संयुक्त सैनिक कमांड के चीफ जनरल विपिन रावत के बयान से नहीं मिलते जिसमे उन्होंने अक्तूबर तक किसी नए कारगिल की आशंका को जताया है।

भारत सरकार को इन विषम परिस्थितियों में अफगानिस्तान एवम् तालिबान को लेकर अपनी स्पष्ट नीति की घोषणा करनी चाहिए तथा निजी राजनीतिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्रीय हितों, राष्ट्रीय संप्रभुता तथा सुरक्षा के दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए अन्यथा भविष्य दक्षिण एशिया के लिए भी सुखद नहीं होगा किन्तु यदि भारत सरकार नीतिगत फैसले शांति के पक्ष मे लेती हैं तो यकीनन आने वाला समृद्ध समय भी दक्षिण एशिया का ही हो सकता है।।

अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है। ...

अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

तालिबान अफगानिस्तान के बढ़ते कदम पाकिस्तान और ईरान के लिए एक बड़ा खतरा !

जिस तेजी से और सामरिक योजना से तालिबान आगे बढ़ रहे है और सम्भावना जताई जा रही है कि वो काबुल फतह कर लेंगे तो क्या इसके बाद क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी या एक नया खतरा बढ़ जाएगा। ...

अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

एक ओर तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर सभी पक्ष अपनी अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित है। ...

दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ साथ अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी को कोई सकारात्मक आश्वासन न मिलना क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। ...

अफ़गान राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा

इस प्रकार बहुचर्चित अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी यात्रा खत्म हुई । वापसी के बाद अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के भविष्य की क्या स्थिति हो सकती हैं। ...

अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात ।

बीस साल से चल रही जंग की समाप्ति के साथ ही अमेरिका द्वारा अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के साथ ही अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्जे के बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात की। ...

अफगानिस्तान ! अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद क्या ? तालिबान प्रवक्ता सुहैल शहीन से बातचीत

जिस तेजी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी अफगानिस्तान से हो रही है और तालिबान द्वारा अफ़गान जमीन पर अपना कब्ज़ा कायम किया जा रहा है उससे सम्भावित भविष्य के हालात पर तालिबानी प्रवक्ता सुहैल शाहीन से एक बात।। ...

अफ़गान तालिबान से भारत ने सम्पर्क कायम किया जिससे अफ़गान शांति की राह में कुछ नए बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।।

भारतीय विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर प्रसाद की दोहा एवम् कुवैत यात्रा के बीच अफगानिस्तान के सरकारी मीडिया टोलो न्यूज द्वारा भारत द्वारा तालिबान से सम्पर्क करने की खबर का क्या अर्थ हो सकता है ? ...

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी से बढ़ती अराजकता का भारत पर प्रभाव !

जैसे जैसे अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज अफगानिस्तान से अपने अड्डे खाली कर रहे है और अफगानिस्तान से निकल रहे हैं वैसे ही दक्षिण एशिया किसी बड़े युद्ध की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है।। ...

अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी लेकिन भविष्य में शांति की गारंटी नहीं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के कार्यक्रम के साथ दिए जा रहे बयानात के मद्देनजर अभी दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। ...