अफ़गान तालिबान से भारत ने सम्पर्क कायम किया जिससे अफ़गान शांति की राह में कुछ नए बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।।

ढाई साल पहले अमेरिका ने मन बना लिया था कि बीस साल के लंबे असफल संघर्ष के बाद अब उसके सैनिकों को अफगानिस्तान से निकलना ही पड़ेगा और पेंटागन की ओर से जल्मे खलिल्जाद की नियुक्ति की गई तथा अफ़गान तालिबान को वार्ता की मेज पर लाया गया।। निसंदेह इन सभी वार्ताओं में रूस, चीन, पाकिस्तान तथा कतर का दखल रहा था लेकिन भारत को या तो पर्दे के पीछे रखा गया या किनारे लगा दिया गया । एक लम्बी प्रक्रिया के बाद समझौता हुआ फिर कुछ हिचकोले लगे किन्तु अंततः अमेरिका ने अपना तम्बू उखाड़ना शुरू कर दिया और एक अनुमान के अनुसार अभी तक आधे से अधिक सैनिक एवम् सामान अफ़गान जमीन से निकल चुका है।

इन्हीं सबके बीच भारत को भी अपने हितों की चिंता होना स्वाभाविक था लेकिन पाकिस्तान कभी भी इस पक्ष में नहीं हो सकता था कि भारत किसी सुविधाजनक स्थिति में आए।। विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रसाद ने अपने संपर्कों की तलाश शुरू की लेकिन चिर परिचित अंदाज़ में भारत सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजित डोबाल ने अपने सम्बन्धों को टटोला और शायद उन्हें पुराना सूत्र हाथ लगा तालिबान के मुल्लाह बिरादर।। यदि ध्यान हो तो काठमांडू से एयर इंडिया के एक विमान का अपहरण करके कंधार ले जाया गया था जिसकी फिरौती में अटल बिहारी सरकार ने आतंकी छोड़े थे और कुछ अन्य लेन देन की ख़बरें भी थी।

इस विमान की फिरौती तय करने या अन्य बातों के लिए वर्तमान सुरक्षा सलाहकार तब तालिबानी आतंकवादियों से वार्ता करने गए थे।। क्योंकि अब सम्भावना यही बलवती है कि तालिबान शीघ्र ही सत्ता पर काबिज हो सकते हैं तो भारतीय हितों को देखते हुए उनसे सम्पर्क बनाना ही एकमात्र विकल्प था किन्तु यदि इसमें कोई चाल या साज़िश की कोशिश की गई तो उसका अधिक मूल्य चुकाना पड़ सकता है।। इसके पीछे कुछ कारण है। एक तो तालिबान को रूस, तुर्की, चीन और ईरान की भी सपोर्ट मिल रही हैं दूसरा अमेरिका तथा पाकिस्तान द्वारा तो बनाए ही गए थे, इस स्थिति में भारत यदि किसी विवाद में फंसता है तो कोई बाहरी समर्थन भी जरूरी होगा जो अभी तक तो नहीं है।

ज़ल्मे खालिलजाद ने यद्धपि दो तीन महीने पहले अपने नई दिल्ली दौरे के समय ही सम्पर्क शुरू करा दिए थे लेकिन उनका कोई परिणाम नहीं निकला। शायद कुछ लोगो को उम्मीद थी कि तालिबान में फुट डाली जा सकती हैं जो इस माहौल में इसलिए भी सम्भव नहीं है क्योंकि तालिबान के उपर आंतरिक एवम् बाहरी दबाव बहुत है।। पाकिस्तान द्वारा साफ और खुले शब्दों में अमेरिकी फोर्सेज एवम् ड्रोन के लिए मनाही के बाद अमेरिका के पास भी कोई विकल्प नहीं बचा था कि वो भारत में अड्डे बनाने के लिए भारत को सहयोग न करें, सम्भव है कि इसके मद्देनजर भी बातचीत आगे बढ़ाई गई हो तालिबान के मुल्ला बिरादर को साथ लेने की कोशिश की गई हो।

इसके अतिरिक्त आज बाइडेन की यूरोप यात्रा के सन्दर्भ मे अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह का यह बयान भी ध्यान रखना चाहिए जिसमे उन्होंने कहा है कि अमेरिका ऐसे एकदम अफगानिस्तान से आंखे नहीं मूंद सकता।। उपरोक्त सभी कड़ियों को जोड़कर देखा जाए तो लगता है कि अभी" अमन दुरस्त"

अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है। ...

अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

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अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

एक ओर तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर सभी पक्ष अपनी अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित है। ...

दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

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बीस साल से चल रही जंग की समाप्ति के साथ ही अमेरिका द्वारा अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के साथ ही अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्जे के बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात की। ...

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अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी से बढ़ती अराजकता का भारत पर प्रभाव !

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