अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी से बढ़ती अराजकता का भारत पर प्रभाव !

अफगानिस्तान जिसे सल्तनतों की कब्रगाह कहा जाता है इतिहास में केवल सिखो से तो पराजित हुआ है लेकिन कभी कोई उस कौम को गुलाम नहीं रख सका।। रोमन साम्राज्य से लेकर मंगोल और अंग्रेज़ फिर सोवियत संघ उसके बाद अमेरिका तथा नाटो संगठन सभी को अंततः पराजय झेलनी पड़ी। इसी क्रम में वर्तमान में यूएस सैनिकों की वापसी चल रही है।। जब अमेरिका एवम् अफ़गान तालिबान के बीच बातचीत चल रही थी तब भारत को दरकिनार कर दिया गया था जो भारतीय विदेशनीति के नीति निर्धारकों की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती हैं।

यदि अमेरिका का इतिहास एवम् पेंटागन की नीतियां देखी जाए तो उन्होंने जब भी किसी देश में दखल दिया है वो वहां पर एक कभी न ख़तम होने वाला युद्ध छोड़कर गए हैं।। यूएस ने अपनी हार का बदला उस क्षेत्र को गृहयुद्ध में धकेल कर लिया बेशक वो वियतनाम और कम्बोडियाई पोलपोत हो या इराक़ हो या सीरिया और लेबनान हो।। बीस साल लंबी लड़ाई के बाद अमेरिकी सैनिकों का किसी शांत अफगानिस्तान को चुपचाप छोड़ कर निकल जाना किसी सुनहरे ख्वाब से अधिक नहीं माना जा सकता और day dreams देखने के लिए किसी को मनाही नहीं होती।

जैसे जैसे अमेरिकी फोर्सेज अपना सामान बांध रही हैं तथा बचे हुए हथियार नष्ट करती जा रही है वैसे वैसे अफगानिस्तान की आधिकारिक अशरफ गनी सरकार के सैनिकों के साथ उनकी झड़पें बढ़ रही हैं और इस कड़ी में नवीनतम समाचार वहां सौ से अधिक कीमती जाने जाया होने का है।। अफगानिस्तान के भविष्य एवम् अमेरिकी नीतियों के सम्बन्ध मे CIA के सूत्रों के हवाले से मार्क एवम् जूलिएन का The Newyork Times में छपा आलेख विशेष उल्लेखनीय हैं जिसमे उनके अनुसार यदि अमेरिका इस क्षेत्र से निकल जाता हैं तो उसका चीन को रोकने का सपना अधूरा रह जाएगा और खेल ख़तम हो जाएगा।। तो ऐसे में क्या होगा ? पाकिस्तान ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी कीमत पर अमेरिकी फोर्सेज को अपनी जमीन पर अड्डे कायम नहीं करने देगा बेशक इसके पीछे पाकिस्तान पर रूस और चीन का दबाव हो।। अन्य यूरेशिया के देशों तजकिस्तान या उज़्बेकिस्तान ने भी यूएस को मना कर दिया है क्योंकि किसी भी हद तक रूस अमेरिका को अपने पूर्व सोवियत देशों में स्थापित नहीं होने देगा।

तो जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही है कि अमेरिकी सैनिकों के निकलने के बावजूद अमेरिका अपने प्रोक्सी या डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर छोड़ कर जाएगा तो क्या यदि तालिबान सत्ता में आते है तो वो उनसे लडने में सक्षम होंगे ? यही प्रश्न भविष्य में अफगानिस्तान को अशांत रहने तथा महा शक्तियों का अखाड़ा बनने की ओर इशारा करते हैं।। इन हालात में सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले दो ही देश होंगे जो पिछले 75 साल से एक दूसरे के काल्पनिक शत्रु है और वो है भारत एवम् पाकिस्तान।। क्योंकि प्रोक्सी वार में अक्सर आमने सामने के युद्ध न होकर गोरिल्ला युद्ध होते है या आतंकी घटनाए होती हैं जिससे शत्रु को ब्लीड किया जाए तो इसके लिए पहला निशाना पाकिस्तान होगा क्योंकि यदि पाकिस्तान को खुला छोड़ दिया गया तो वो अपने हित की सरकार को समर्थन देगा जो फिलहाल अफ़गान तालिबान है।

पाकिस्तान को समर्थन न मिले इसके लिए बेशक पर्दे के पीछे से भारत वर्तमान शासकों और इनके गुटों को समर्थन देगा अन्यथा वो भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और नतीजे में फिर से किसी कभी समाप्त न होने वाला प्रोक्सी वार शुरू हो सकता है जिसमे कभी भी कोई नहीं जीतता।। समस्या का समाधान क्या है ? क्या अफगानिस्तान के टुकड़े करके अपना अपना केक बांट लिया जाए या एक बार मन कड़ा करते हुए दक्षिण एशिया के देश आपस मे निश्चय कर ले कि किसी भी बाहरी शक्ति को दखल नहीं देने दिया जायेगा।। यदि आदर्श स्थितियां और साफ नियते सियासत में होती तो दुनियां में आज न ग़रीबी होती न भुखमरी न बीमारी।। War mongers को भी अपने फायदे ज्यादा प्रिय होते है बनिस्बत गिरती हुई लाशों के और दुनियां ऐसे ही चलती रहती हैं।

बहरहाल लगभग एक महीने के अंदर ही यह निश्चय हो जाएगा कि दक्षिण एशिया का भविष्य क्या होने वाला है तब तक Cross the fingers

अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है। ...

अफ़ग़ानिस्तान कार्यवाहक सरकार की घोषणा और इसका भारत पर असर !

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दुनियां के बदलते समीकरण की बात करते ही सबसे महत्वपूर्ण घटना अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज का बीस साल की जद्दोजहद के बाद अफगानिस्तान को छोड़ कर निकल जाना है। ...

काबुल से अंतिम अमेरिकी सैनिक की विदाई के साथ अफ़गान समस्या समाप्त या शुरुआत ?

20 साल तक जमीन के छोटे से टुकड़े और क़बीलाई संस्कृति वाले दिलेर लोगो की बस्ती पर विश्व के 40 देशों एवम् महाशक्ति अमेरिका की फोर्सेज कोशिश करती रही कि वहां भी पश्चिमी जगत बना दिया जाए। उसी समय ( 2001) पाकिस्तान के हामिद गुल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस प्रयास में अमेरिका को अमेरिका द्वारा ही हराया जाएगा और वही हुआ। ...

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का पुल जो graveyards of empires कहलाती हैं आजकल दुनियां की नजरों में है।

स्लतनतों की कब्रगाह के नाम से प्रसिद्ध धरती का ऐसा भूभाग जिसकी मिट्टी में युद्ध और अशांति जंगली घास की तरह उपजती है। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया को जोड़ने वाले इस सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हिस्से को अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। मैथोलॉजी और किवदंतियों में महाभारत से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक का सम्बन्ध तत्कालीन गांधार देश से जोड़ा जाता हैं तो अलेक्जेंडर और रोमन साम्राज्य से भी टकराने के लिए याद किया जाता है किन्तु क्या इसका वास्तविक इतिहास ऐसा ही था ? ...

तालिबान अफगानिस्तान के बढ़ते कदम पाकिस्तान और ईरान के लिए एक बड़ा खतरा !

जिस तेजी से और सामरिक योजना से तालिबान आगे बढ़ रहे है और सम्भावना जताई जा रही है कि वो काबुल फतह कर लेंगे तो क्या इसके बाद क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी या एक नया खतरा बढ़ जाएगा। ...

अपनी अस्मिता और भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत भारतीय विदेशमंत्री !

एक ओर तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की आशंका बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर सभी पक्ष अपनी अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित है। ...

दक्षिण एशिया का टाइम बम जिसकी सुईयां तेजी से घूम रही हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ साथ अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी को कोई सकारात्मक आश्वासन न मिलना क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। ...

अफ़गान राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा

इस प्रकार बहुचर्चित अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी यात्रा खत्म हुई । वापसी के बाद अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के भविष्य की क्या स्थिति हो सकती हैं। ...

अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात ।

बीस साल से चल रही जंग की समाप्ति के साथ ही अमेरिका द्वारा अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी के साथ ही अफ़गान तालिबान द्वारा अधिकांश क्षेत्रो पर कब्जे के बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात की। ...

अफगानिस्तान ! अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी के बाद क्या ? तालिबान प्रवक्ता सुहैल शहीन से बातचीत

जिस तेजी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी अफगानिस्तान से हो रही है और तालिबान द्वारा अफ़गान जमीन पर अपना कब्ज़ा कायम किया जा रहा है उससे सम्भावित भविष्य के हालात पर तालिबानी प्रवक्ता सुहैल शाहीन से एक बात।। ...

अफगानिस्तान का भविष्य ? आज के हालात पर NewsNumber की विशेष रिपोर्ट

तेजी से अफगानिस्तान को विकल्पहीन छोड़कर निकलती नाटो एवम् अमेरिकी फोर्सेज के बाद अफगानिस्तान का भविष्य एक बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।। ...

अफ़गान तालिबान से भारत ने सम्पर्क कायम किया जिससे अफ़गान शांति की राह में कुछ नए बदलाव महसूस किए जा रहे हैं।।

भारतीय विदेश मंत्री श्री एस जयशंकर प्रसाद की दोहा एवम् कुवैत यात्रा के बीच अफगानिस्तान के सरकारी मीडिया टोलो न्यूज द्वारा भारत द्वारा तालिबान से सम्पर्क करने की खबर का क्या अर्थ हो सकता है ? ...

अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी लेकिन भविष्य में शांति की गारंटी नहीं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के कार्यक्रम के साथ दिए जा रहे बयानात के मद्देनजर अभी दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। ...