सात समुंदर पार एक महाराष्ट्र ( भारतीय राज्य ) जैसा राजनीतिक प्रयोग !

बेंजामिन नेतन्याहू जिन्होंने इजरायल के प्रधानमन्त्री के रूप में कुल 15 साल शासन किया किन्तु बार बार किए गए चुनावों और अवसर प्राप्त होने के बाद भी गत रात अंतिम समय सीमा तक अपने पक्ष मे बहुमत नहीं जुटा पाए और इस प्रकार कानूनी तौर से उनकी विदाई तकरीबन तय हो चुकी हैं।। दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने एक सहमति पत्र पर दस्तखत करने के बाद नव निर्वाचित राष्ट्रपति को आधा घंटा पहले सूचित कर दिया कि वो सामूहिक तौर पर सरकार का गठन करने के लिए तैयार हैं और उनके अनुसार नफ्ताली बैनिट अगले प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे।

अमेरिका से माईग्रेटेड नफ्ताली कभी टीवी एंकर भी रह चुके हैं और एक असफल यू ट्यूबर भी कहलाए जा सकते है लेकिन स्पष्ट रूप से दक्षिण पंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और इनके बहुत से पुराने बयान मुस्लिम समाज के विरूद्ध सुने/देखे जा सकते हैं।। हैरानी की बात है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद भी इन्हे वामपंथी अतिद पार्टी एवम् अरेबियन Raam पार्टी ने भी समर्थन दिया है शायद अब इजरायल के नेताओ के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा था सिवाय एक नेशनल सरकार के गठन करने के। यह इजरायल के राजनीतिक दलों की मजबूरी थी कि किसी न किसी सरकार का गठन किया जाए और नेतन्याहू की विदाई कर दी जाए अन्यथा खुद इजरायल नामक देश का अस्तिव भी खतरे में पड़ सकता था।। हमास के विरूद्ध हुए युद्ध में मिली हार, करप्शन के आरोप तथा जो बाइडेन सहित विश्व के विरोध ने नेतन्याहू को अपने मुल्क के गले में फसी हड्डी बना दिया था।

किन्तु अभी खुश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि Lips and Cup के बीच अभी फासला बाकी है और जब तक नफ्ताली बेनीट संसद में बहुमत हासिल नहीं कर लेते तब तक नेतन्याहू ही प्रधानमन्त्री बने रहेंगे।। क्योंकि नेतन्याहू पर पुत्र सहित जेल जाने की आशंकाओं के बादल भी मंडरा रहे हैं तो सम्भव है कि अंतिम क्षण तक वो अपनी सत्ता के लिए प्रयास करते रहे बेशक इसके लिए उन्हें कोई दुस्साहस भी करना पड़े।। इसके साथ गत रात ईरान के बड़े जलयान में लगी आग और उसके डूबने को भी याद रखना चाहिए तथा साथ ही नेतन्याहू का बयान भी जिसमे उन्होंने कहा है कि वो अमेरिका की दोस्ती की कीमत पर भी ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देंगे।। लगातार 12 वर्ष तक प्रधानमन्त्री रहे व्यक्ति ने शासन तंत्र में अपने समर्थको को स्थापित नहीं किया होगा यह भी अविश्वनीय हैं और समय पड़ने पर उनके विश्वास पात्र उनका साथ नहीं देंगे यह भी संभव नहीं है।

तो क्या नेतन्याहू ने किसी गोपनीय सहमति के बाद पद छोड़ने का निर्णय लिया होगा ? इसकी उम्मीद जताई जा सकती है और यह भी संभव है कि नफ्ता ली तथा इसके बाद बनने वाले प्रधानमन्त्री यहिर लेपिड से किसी सेफ पैसेज को लेकर अंदर ही अंदर कोई समझौता बन गया हो।। इसकी तुलना भारत के महाराष्ट्र राज्य की सरकार से इसीलिए की गई है क्योंकि वहां भी घोर दक्षिणपंथी शिवसेना को मध्य मार्गी कांग्रेस ने सपोर्ट किया और सदैव मुस्लिम के विरूद्ध बयान दागने वाले उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बना दिया।। किसकी क्या सहमति और कार्यक्रम तय हुए यह तो कोई नहीं जानता किंतु भ्रष्टाचार आदि को लेकर एक दूसरे पर लगाए गए आरोपों के सम्बन्ध मे अब सभी चुप रहते है।

सत्ता किसी की नहीं होती केवल स्वार्थ और स्वार्थ की होती हैं यही परम सत्य सिद्ध होता है ( कुछ अपवाद छोड़कर )