क्या अगला युद्ध का अखाड़ा बनने के लिए भारत सरकार ने अपनी गरदन हाजिर कर दी है ?

अंतरराष्ट्रीय विषयों पर लिखने वाली मशहूर पत्रिका Asia Times में एक आलेख छपा है "ब्लिंकेन ब्लिंकड एंड पुतिन वॉन" इसका सन्दर्भ अभी हुए इजरायल के गाजा पट्टी के विवाद से है जिसके नतीजे में न केवल नेतन्याहू को सत्ता से बाहर होना पड़ा अपितु इजरायल के वर्चस्व को कायम रखना भी मुख्य प्रश्न बन गया।। मिस्र के राष्ट्रपति सी सी को अचानक मिली महत्ता और रूस द्वारा सीरिया में अपने वर्चस्व की घोषणा ने पेंटागन को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया।। इन सभी घटनाओं को तफसील से देखा जाए तो कूटनीति की यह परिभाषा सत्य सिद्ध होती है कि किसी भी देश की आपसी मित्रता या शत्रुता स्थाई नहीं होती।। इसके अतिरिक्त सभी को किसी न किसी शत्रु की आवश्यकता जरूर होती हैं जिससे हथियारों की नुमाइश एवम् कारोबार जिंदा रखा जा सके तथा कमजोर देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटा जा सके। लेकिन जब शत्रु मजबूत हो या बड़ा खतरा नजर आने लगे तो आपस मे प्रतिद्वंदी देश भी उसके विरूद्ध एकजुट हो जाते है।

द्वितीय विश्व युद्ध में जब जर्मन और तानाशाह विश्व के लिए खतरा करार दे दिया गया तो अमेरिका और सोवियत संघ ने भी हाथ मिला लिए थे एवम् चीन भी उनके साथ शामिल था। उसके बाद स्टालिन के साथ बिग थ्री की बैठक हुई एवम् दुनियां के देशों को दो हिस्सों में बांट दिया गया।। पूंजीवाद एवम् साम्यवाद की जंग के नाम पर देशों को आमने सामने खड़ा किया गया लेकिन कभी दोनों महाशक्तियां खुद आमने सामने नहीं आई क्योंकि यह उनकी योजनाओं का हिस्सा नहीं होता।। केवल एक बार क्यूबन संकट के समय सोवियत संघ तथा नाटो का सामना हुआ था और दुनियां की सांसे रुक गई थी।। फिर भी महाशक्तियों में युद्ध और प्रतिद्वंदता चलती रहती हैं और युद्ध के लिए कुछ देश चुन लिए जाते है जिन्हे ग्रे एरिया कहना चाहिए।। अभी हुए इजरायल विवाद में जैसे ही रूस ने सीरिया में अपनी उपस्थिति एवम् सीधी धमकी दी तुरन्त अमेरिकी राष्ट्रपति को सीज फायर टुडे का आदेश जारी करना पड़ा।। सोवियत संघ के बिखरने के बाद विश्व एक ध्रुवीय हो गया था और यूएस के लिए कोई चुनौती नहीं रही थी क्योंकि पेंटागन ने अपनी प्रॉक्सिज के जरिए न केवल कम्युनिस्ट देशों को घाव दिए अपितु सोवियत संघ भी बिखर गया।। धीरे धीरे रूस मजबूत होता गया तथा चीन भी अपनी विशालकाय दीवार के साए में रूस के साथ इतना बड़ा बन गया कि आज वो खुद को महाशक्ति घोषित करने की स्थिति में है।

यहां यह भी याद रखना चाहिए कि पुतिन ने कभी भी अमेरिका को सोवियत संघ तोड़ने के लिए माफ नहीं किया और एक कामयाब जासूस की तरह उसने अमेरिका को ब्लीड करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।। इनके चलते आज यूएस को अपने वजूद के लिए सोचना मजबूरी बन गई है क्योंकि उसके सामने ड्रेगन मूह खोल कर खड़ा है।। क्योंकि महाशक्तियां खुद कभी आमने सामने नहीं आती तो उन्हे कोई न कोई ग्रे एरिया चाहिए होता है और अपने भविष्य तथा विकास के लिए युद्ध एवम् विनाश भी दरकार होता है तो अमेरिका और रूस का अगला अखाड़ा कौन बनने जा रहा है जिसमे एक योद्धा तो चीन को होना ही है।। यूएस द्वारा तैयार किए गए दक्षिण पूर्व एशिया के देश जिनमे वियतनाम, फिलीपाइन आदि है चीन के साथ खड़े हो चुके है और क्वाड देशों ने भी कोई ज्यादा सरगर्मी नहीं दिखाई । नाटो फोर्सेज का अब कोई मतलब इस लिए नहीं रहता क्योंकि वो तो सोवियत संघ के विरूद्ध बनी थी और फिलहाल न सोवियत संघ है न वारसा।

चीन जानता है कि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो उसके सामने अमेरिका की मदद से खड़ा हो सकता है और रूस जानता है कि यदि चीन एक हद से ज्यादा मजबूत हो गया तो वो रूस के लिए भी खतरा बन सकता है।। इसके अतिरिक्त वर्तमान समय की भारत सरकार ने भारतीयों की एक नकारात्मक छवि भी सामने ला दी है जिसमे गौमूत्र और गोबर को पवित्र समझने वाले लाखो हिन्दुत्व वादी है तो साथ ही लिंचिंग करने वाले गिरोह भी है।। अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी के साथ ही यूएस ने भारत को हेलमंड तथा जलालाबाद के काउंसिल ऑफिस बन्द करने की सलाह भी जारी कर दी है।। अर्थात यदि भारत के विरूद्ध चीन अथवा कोई अन्य देश कोई दुस्साहस करता है तो अमेरिका अपने हाथ नहीं जलाएगा उसका सम्बन्ध या दोस्ती केवल साउथ चाइना सी तक ही है और चीन को कमजोर करने के लिए उसको भारत के साथ उलझाना अमेरिका, यूरोप एवम् रूस सभी के हित में है।

भविष्य के गर्भ में क्या है इसे कौन जान सकता है किन्तु अभी तो अंदेशा यही है कि भारत की सरकार के कमजोर नेतृत्व के कारण सभी दुश्मन एक साथ साज़िश रच सकते है।। वैसे भी प्रत्येक कुछ दशकों के बाद नक्शे तो बदलते ही है लेकिन देखना होगा कि नए नक्शे किस जमीन पर बनते है !