अफगानिस्तान से अमेरिकी एवम् नाटो फोर्सेज की वापसी लेकिन भविष्य में शांति की गारंटी नहीं।

ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति और विश्व भर से युद्धों में व्यस्त अमेरिकी सैनिकों की वापसी के निर्णय का अहम पड़ाव अफगानिस्तान से अमेरिकी तथा नाटो फोर्सेज की वापसी थी। लगातार दो साल तक चली मैराथन वार्ताओं के दौर, ज़लमे खलिलजाद के व्यक्तिगत प्रयासों, रूस, चीन, कतर एवम् पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद अंततः अफ़गान तालिबान से समझौता हुआ और निर्णय लिया गया कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर लौट जाएंगे।। बीस साल तक चले इस भयावह युद्ध में अमेरिका को क्या हासिल हुआ ये तो वो ही बता सकते है लेकिन हज़ारों जाने जाया हुई, अरबों डॉलर खर्च हुए और आखिर में कथित महाशक्ति को फेस सेविंग भी न मिल सकी क्योंकि जिस तालिबान को कभी अंतरराष्ट्रीय आतंकी कहा गया था आखिरकार उन्ही से शांति के लिए झोली फैलानी पड़ी।

हालांकि ट्रंप द्वारा दी गई डेड लाइन समाप्त हो चुकी है लेकिन बाइडेन प्रशासन ने किन्तु परंतु के बाद उस समझौते का सम्मान करते हुए सैनिकों की वापसी जारी रखी और सितम्बर तक की तिथि बढ़ा दी।। ग्राउंड जीरो पर अमेरिकी फोर्सेज वापसी शुरू कर चुकी है तथा उनके द्वारा खाली किए गए सैनिक अड्डों एवम् एयर बेस पर तालिबान ने कब्ज़ा कर लिया है यद्धपि आधिकारिक तौर पर उन्होंने ये अड्डे वैधानिक अशरफ गनी सरकार को सौंपे थे।। अफ़गान तालिबान अभी तक समझौते का सम्मान करते हुए अमेरिकी एवम् नाटो सैनिकों पर कोई हमला नहीं कर रहे हैं किन्तु उनके लड़ाके काबुल की सीमा तक तो पहुंच चुके हैं और ऐसा बताया जा रहा है कि 90 प्रतिशत क्षेत्र पर उनका कब्ज़ा हो चुका है एवम् किसी भी क्षण वो काबुल में घुसकर राष्ट्रपति भवन पर काबिज हो सकते है! लेकिन अभी शांति बहुत दूर लगती हैं

क्योंकि पेंटागन प्रवक्ता जॉन किर्बी ने बयान दिया है कि अमेरिका बेशक अफगानिस्तान से निकल रहा है किन्तु क्षेत्र ( दक्षिण एशिया ) में मौजूद रहेगा। अर्थात यूएस चाहता है या पेंटागन की योजना है कि अफगानिस्तान से निकल कर यूएस फोर्सेज कोई अन्य वैकल्पिक ठिकाना बना ले। इसके लिए पाकिस्तान ने अपने एयर बेस या जगह देने से साफ मना कर दिया है क्योंकि पाकिस्तान पर तालिबान के अतिरिक्त चीन एवम् रूस का भी दबाव था।। यूरेशिया के उज़्बेकिस्तान या तजाकिस्तान में भी रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी कीमत पर भी पूर्व सोवियत देशों में नाटो या अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति बर्दास्त नही करेगा।। अफ़गान तालिबान द्वारा भी स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि यदि क्षेत्र के किसी देश ने अमेरिकी फोर्सेज को ऐसी मदद की जिससे वो अफगानिस्तान में दखल देने की क्षमता रख सके तो तालिबान उसे अफ़गान जनता का दुश्मन मानेंगे।। इसके बाद एकमात्र विकल्प भारत ही रहता है तो क्या भारत कॉमकासा समझौते के तहत अमेरिका को अपने सैनिक अड्डे इस्तेमाल करने की अनुमति देने में सक्षम हैं ?

यद्धपि चर्चा में तो यह भी सुना गया था कि पठानकोट एयर बेस यूएस आर्मी की पहली पसंद है अन्यथा विकल्प के रूप में अंडमान निकोबार द्वीपसमूह अथवा लक्ष्यद्वीप में भी यूएस सैनिकों को अपना बेस बनाने की अनुमति दी जा सकती है।। अंडमान निकोबार में यूएस अपनी सेना एवम् मेरिन्स की तैनाती चीन को रोकने के लिए भी चाहता था और लक्ष्यद्वीप से उड़ान भरकर पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सकता है। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लक्ष्यद्वीप में भारत सरकार द्वारा किसी बीजेपी नेता को प्रशासक बना कर भेजा गया है जिसके निर्णयों से वहां काफी विवाद उत्पन्न हो गया है।। इसके अतिरिक्त नाटो संगठन के महासचिव जेन स्टोलतेलबर्ग के बयान को भी नहीं भूलना चाहिए जिसके अनुसार अभी नाटो फोर्सेज अफगानिस्तान से नहीं निकलेगी जो तालिबान एवम् नाटो के बीच किसी सम्भावित संघर्ष को जन्म दे सकती हैं।

कुल मिलाकर यही कहा जाना चाहिए कि जिस प्रकार पाकिस्तान एवम् अन्य पड़ोसी देशों ने हकीकत के मद्देनजर अमेरिका को स्पष्ट मना कर दिया है कि वो अपनी जमीन या आसमान का उपयोग सैनिक उद्देश्यों के लिए नहीं करने देंगे ऐसा ही भारत को भी करना चाहिए क्योंकि शांति में ही प्रगति है।। यदि भारत सरकार यूएस को सैन्य मदद उपलब्ध कराती है तो सीधे सीधे चीन एवम् तालिबान को दुश्मनी के लिए आमंत्रित करेगी जिसे देश हित में तो नहीं माना जा सकता।।

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इस प्रकार बहुचर्चित अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी की अमेरिकी यात्रा खत्म हुई । वापसी के बाद अफगानिस्तान एवम् दक्षिण एशिया के भविष्य की क्या स्थिति हो सकती हैं। ...

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