कश्मीर और फिलिस्तीन की तुलना से गलतफहमियां पैदा करता पाकिस्तान !

इजरायल द्वारा गाजा पट्टी क्षेत्र में मीडिया तथा निहत्थे नागरिकों पर लगातार किए जा रहे हमलों और बच्चो एवम् महिलाओ को भी शहीद किए जाने वाले युद्ध अपराधों के बीच मुस्लिम देशों के संगठन OIC एवम् UNSC की बैठकें हुई लेकिन नतीजा जबानी जमाखर्च ही होना था और वहीं हुआ।। इस बीच मीडिया एवम् सोशल मीडिया पर सभी पक्षों ने अपने अपने स्तर पर एक प्रोपेगेंडा वार भी शुरू कर दी है बेशक उसके पीछे फिलिस्तीनी या इजरायली समर्थन से अधिक निजी एजेंडे अधिक है।

विगत रात इजरायल के प्रधानमन्त्री बेंजमीन नेतन्याहू द्वारा टीवी पर अपनी जनता को संबोधित किया गया जिसमें धमकियों के अतिरिक्त उन्होंने कहा कि दो मुस्लिम देश विशेष रूप से इजरायल का विरोध कर रहे हैं जिनमें से एक भारत का पड़ोसी देश है। निसंदेह उनका इशारा पाकिस्तान ही था लेकिन इस संबोधन में भारत का नाम लेना और "भारत का पड़ोसी देश" शब्द का उपयोग किया जाना किस और संकेत करता है ? फिलिस्तीनी जनता पर इस प्रकार की प्रताड़ना का यह कोई पहला उदाहरण नहीं है अक्सर प्रत्येक 5 - 7 साल बाद इजरायली सेना इस प्रकार के नरसंहार करती रहती हैं।

गत 70 वर्षो से इजरायली फोर्सेज द्वारा अक्सर ऐसा किया जाता रहा है बेशक पहले कभी इस प्रकार का विरोध एवम् जागरण नहीं हुआ लेकिन इस बार बदलती विश्व व्यवस्था और बहू ध्रुवीय शक्ति केंद्रो के कारण स्थिति में थोड़ा अंतर आया है।। तुर्की द्वारा स्वयं को फिर से मुस्लिम देशों का नेता बनने और 2023 के बाद सल्तनत ए उस्मानिया के ख्वाब ने उसे आक्रमक रुख अपनाने पर मजबूर किया है तो चीन और रूस द्वारा अमेरिकन लॉबी को चुनौती देने का यह बेहतरीन अवसर प्राप्त हुआ है जिसके कारण चीन अपने साउथ चाइना सी के विवाद से यूएस को दूर रखने में कामयाबी महसूस कर रहा है। शायद इसी कारण चीन के इशारे पर पाकिस्तान भी आक्रमक रुख अपना रहा है।। लेकिन अवसर का लाभ उठाते हुए जब विश्व जनमत इजरायल के विरूद्ध है तो पाकिस्तान ने फिलिस्तीनी विवाद को कश्मीर के समकक्ष बताने मे देर नहीं लगाई।

किन्तु भारत सरकार एवम् भारतीय बुद्धिजीवियों को जिस प्रकार पाकिस्तान का उत्तर देना चाहिए था वैसा न करना दुखद है।। यहूदी हिटलर के होलोकास्ट से बचने के लिए मूल रूप से फिलिस्तीन की जमीन पर शरणार्थी बनकर आए थे और एक छोटे से हिस्से पर बसे थे लेकिन बाद मे 1948 में उन्होंने इसे अपना देश घोषित कर दिया जिसका कोई संविधान नहीं है और जो अपनी धार्मिक पुस्तक को ही अपना संविधान बताते है।। इस प्रकार यह विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जो धार्मिक आधार पर बना भी है और चलता भी है।। आज़ादी के समय पॉवर ऑफ ट्रांसफर या इंडिया इंडिपेंडेंट एक्ट के अनुसार उस समय की 600 से अधिक प्रिंसली स्टेटस को यह हक दिया गया था कि वो अपनी इच्छा से भारत या पाकिस्तान में मिल सकती हैं अथवा स्वतंत्र रह सकती हैं।। अधिकांश ने अपने भौगोलिक सीमाओं के हिसाब से दोनों देशों को चुन लिया और कुछ को साम दाम दण्ड भेद से मिला लिया गया जिसमे भारत की हैदराबाद, जूनागढ़ है तो पाकिस्तान की बहावलपुर, कलात, बुग्ती ( बलोचिस्तान ) रियासते प्रमुख हैं।

कश्मीर के महाराजा द्वारा कुछ देर से एवम् पाकिस्तानी हमले के बाद भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए गए थे और बाद में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा भी दिया गया था जैसा कुछ अन्य राज्यों को आज भी प्राप्त है ( धारा 370 के अतिरिक्त 371 के भी कई भाग है ) बेशक आज कश्मीरी जनता द्वारा भारत की केंद्रीय सरकार का विरोध किया जा रहा है किन्तु विरोध और विद्रोह का अंतर भी ध्यान में रखना चाहिए और भारत सरकार द्वारा कभी नागरिकों पर सेना के रॉकेट हमलों या आर्टलरी के उपयोग का न उदाहरण मिलता हैं न समर्थन किया जा सकता है।। 1972 के शिमला समझौते के बाद सभी बिंदुओं पर विचार किया जा चुका था और सीमा निर्धारण के अतिरिक्त कोई विवाद यदि था तो उसे स्वयं पाकिस्तान द्वारा द्विपक्षीय वार्ता से हल निकालने पर सहमति बन चुकी थी।। इन सबके बाद भी पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवादों में घेरना केवल उसकी धूर्तता है और अपनी जनता को मूर्ख बनाने की राजनैतिक उद्देश्य से की जा रही साज़िश।

चीन द्वारा भी इस विषय पर अपना लाभ देखा जा रहा है क्योंकि विवादित क्षेत्र घोषित होने की स्थिति में वो भी दखल देने के ख्वाब देख सकता है और अपनी महत्वकांक्षी परियोजना को सुरक्षित रख सकता है।। यूएनएससी में भारत द्वारा संतुलित लेकिन इजरायल विरोधी बयान दिया जाना भी भारतीय हितों में है क्योंकि ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका तथा इजरायल द्वारा भारत पर दबाव बनाया जा सकता है जिससे वो पाकिस्तान की सेना को यहीं पर अंगेज रखे जिससे पाकिस्तान कभी भी तुर्की के साथ मिलकर फिलिस्तीन में इजरायल के विरूद्ध किसी सैनिक कार्यवाही मे हिस्सा न ले।। पुनः एकबार यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बेशक कुछ विवाद हो किन्तु भारत द्वारा जम्मू कश्मीर पर अवैध कब्जा किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि भारत ने ऐसा किया भी नहीं है। जैसा इजरायल द्वारा फिलिस्तीन और यरुशलम पर किया गया है।

भारत सरकार को इस विषय पर खुलकर सामने आना चाहिए तथा शत्रु देशों के प्रोपेगेंडा का उचित उत्तर देना चाहिए अन्यथा दीर्घावधि में यह देश के हितों एवम् अखंडता के विरूद्ध एक कैंसर साबित हो सकता है।।

पाकिस्तानी विदेशमंत्री द्वारा चौंकाने वाला इंटरव्यू जिससे कई आशंकाओं को जन्म मिलता है।

पाकिस्तान के विदेशमंत्री द्वारा सनसनीखेज बयान देते हुए वहां के टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया गया। ...