तुम्हारे शहर के तो दिये, बुझ गए सारे। हवा से पूछना, ये दहलीज पे, कौन जलता है।।

बशीर बद्र साहब ने न जाने किस सन्दर्भ में कहा होगा कि तुम्हारे शहर के तो दिए, बुझ गए सारे। जरा हवाओं से पूछो, ये दहलीज पर कौन जलता है।। भारत में करोना नामक महामारी और उससे पीड़ित नागरिकों को उचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होना एक ओर तो सरकारी असफलता की कहानी चीख चीख कर बता रही हैं दूसरी ओर अमानवीयता और संवेदन हीनता को नंगा नाच भी दिखाई दे रहा है।। यदि प्राकृतिक न्याय और इंसानियत जैसी भावनात्मक बाते भी छोड़ दें तो भी भारतीय संविधान सहित United Nations भी सम्मान पूर्वक जीने के हक और मानवीय डिग्निटी से शवो के निस्तारण का अधिकार देता है।

भारत सरकार तथा भारतीय मीडिया ने भी स्वीकार किया है कि अलग अलग कारणों से करोना की दूसरी लहर देश भर में कहर बरपा रही है तथा स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि सरकारी व्यवस्था चरमरा चुकी हैं।। अस्पतालों में बिस्तर नहीं है, बिस्तर है तो पर्याप्त डॉक्टर्स और स्टाफ नहीं है, दवाएं नहीं है तथा ऑक्सीजन सप्लाई नहीं हो रही हैं।। ऐसे में बड़ी संख्या में इंसान बीमारी के बजाय अव्यवस्था के कारण मौत के मूंह में समा रहे है जिसे यदि व्यापक रूप से की जा रही हत्याएं भी कहे तो गलत न होगा।। कल्पना करे कि इस विपदा में यदि समाज सेवा करने वाले विशेष कर गुरुद्वारा साहेबान एवम् सिख संगत की सहायता न हो तो मृतकों की संख्या कितनी बढ़ गई होती।

कोढ़ में खाज देश के चुनाव प्रिय राजनेताओं और घटिया सियासत के रूप मे सामने आई जब वैज्ञानिकों द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद केवल बहुसंख्यक हिन्दुत्व वादियों के डर से कुंभ मेला स्थगित नहीं किया गया और पांच राज्यो के चुनावों के साथ साथ उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत के चुनाव भी कराएं गए।। नतीजतन करोना महामारी शहरों से गावों तक पहुंच गई और उचित स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव मे इंसानी मौतों का कारण बन रही है। स्थिति इतनी भयावह है कि स्थानीय डॉक्टर्स भयवश बीमारों का इलाज नहीं कराना चाहते तथा कई स्थानों पर सामान्य पेरासिटामोल जैसी दवाओं का भी अभाव देखने में आ रहा है।। जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में इंसान जान की बाजी हार रहे है। मीडिया द्वारा किसी भी वजह से बीमारी को लेकर इतना खौफ पैदा कर दिया गया है कि फोन पर भी किसी मरीज़ से बात करते समय इंसान डरने लगा है।

इन्हीं के चलते बढ़ती मौतों के साथ साथ शमशान घाट पर आवश्यक संसाधनों की भी कमी हो गई है और डर के कारण या मौतों की अधिकता के कारण अंतिम संस्कार में भी दिक्कत महसूस की जाने लगी है।। इन परिस्थितियों में अचानक उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर स्थित बक्सर के चौसा क्षेत्र की गंगा नदी में अचानक इंसानी शवो के बड़ी संख्या में नजर आने से हड़कंप मच गया।। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार कुल 30 से 50 शव बरामद हुए हैं जबकि प्रत्यदर्शियों के अनुसार इनकी संख्या कहीं अधिक है।। बक्सर के सम्बन्धित अधिकारी मिस्टर उपाध्याय ने News Number से बात करते हुए बताया कि यह शव उत्तर प्रदेश से आए हैं और इन्हे देखकर लगता है कि चार से पांच दिन पुराने है क्योंकि सभी बुरी तरह से फुले हुए हैं।। सम्भावना जताई गई कि सम्भवतः इन्हे बनारस या इलाहबाद से नदी में बहाया गया होगा।

इसको देखते हुए आशंका जताई जा सकती है कि या तो ग्रामीणों ने बीमारी फैलने के डर से इनका अंतिम संस्कार नहीं किया या अधिकारियों ने आंकड़े छुपाने के लिए कोई साज़िश रची होगी।। दोनों ही स्थितियों में यह मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन तो है ही अपितु शर्मनाक अपराध भी है। बिहार सरकार के अधिकारियों द्वारा इसकी जांच करने तथा अंतिम संस्कार करने का आश्वासन दिया गया है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई।। जीवन में जिन्हें उचित सम्मान और इलाज नहीं मिल सका कम से कम करने के बाद तो उन्हे सम्मान पूर्वक विदाई मिलनी चाहिए थी।।