तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।।

भारत ( मुंबई ) का सिनेमा जगत और उसकी मकबुलियत का मुख्य कारण उसकी भाषा संस्कृति तथा क्षेत्र विशेष की सीमाओं से बाहर निकल कर हिन्दुस्तानी संस्कृति को सम्मान देना है।। अंग्रेज़ो के शासन काल में थियेटर की विधा अधिक प्रचलित थी और सिनेमा अभी अपने शैशव काल को देख रहा था।। थियेटर के लिए लायलपुर ( वर्तमान पाकिस्तान का फैसलाबाद ) अथवा वो शहर अधिक सफल थे जहां ब्रिटिश छावनियां कायम थी इसीलिए कराची के might club और कोलकाता की फिल्म इंडस्ट्री विकसित होती गईं।

उस समय में दिल्ली शहर में कैबरे डांस वाले होटलों की भी भरमार हुआ करती थीं बेशक बाद में 1977 के बाद उन पर रोक लगा दी गई।। आज़ादी के बाद मुंबई दक्षिण एशिया का मुख्य फिल्म उद्योग का केंद्र बन गया और सफलतम फिल्मों के लिए इतना मशहूर हुआ कि अन्य कई देशों की फिल्म इंडस्ट्री समाप्त हो गई।। इस सफलता के पीछे बेशक सभी की मेहनत है किन्तु मुख्य किरदार कहानी और गीतकारों का माना जाना चाहिए जिनके लिखे शब्द अमर कृतियां बन जाती हैं।

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में एक समय लखनऊ के कथाकारों का वर्चस्व था तो पंजाब के कलाकारों और निर्माताओं का, इसीलिए पुरानी फिल्मों में उर्दू का अधिक उपयोग भी नजर आता है और पंजाबी संस्कृति का कोई गीत या नृत्य भी अवश्य होता था साथ ही संगीत में भी पंजाबी झलक जरूर होती थी।। गीतकारों की सूची में सम्पूर्ण कालरा ( गुलजार साहब ) जैसे पंजाबी - उर्दू भाषा के सफल हस्ताक्षर थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के कैफ साहब उर्फ कैफ़ी आज़मी थे जिनके कलम से निकले अहसास अमर है।

कैफ़ी आज़मी विचारधारा से सख्त कम्युनिस्ट थे और कम्यून ( सामूहिक निवास ) में रहते थे तथा अपनी समस्त आय पार्टी को देकर केवल गुजारे लायक धन पार्टी से प्राप्त करते थे।। इनके द्वारा लिखे गीत आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलो दिमाग में गूंजते रहते है। अपने जीवन काल में ही इन्हे फिल्म फेयर से लेकर वो सभी सम्मान प्राप्त हुए जिनके ये हकदार थे।। 10 मई 2002 को इन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी कर ली और मुंबई में ही अंतिम आरामगाह बना ली।

कैफ़ी आज़मी साहब की पुण्य तिथि पर News Number परिवार इन्हे सादर स्मरण करता है।।