अफगानिस्तान से अमेरिकन सैनिको की वापसी और भारत पर सम्भावित सकारात्मक प्रभाव !

बीस साल तक अफगान जनता को अपने प्रभाव में लेने की नाकाम कोशिशो के बाद अंततः अमेरिका ने अपने सैनिको की वापसी शुरू कर ही दी।। ट्विन टावर हादसे के बाद अमेरिकी और नाटो फोर्सेस ने grave yard of empires कहे जाने वाले अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था।। लेकिन शायद यह उनकी भूल साबित हुई और वो पाकिस्तान के शासको को समझ नहीं सके कि कैसे पाकिस्तानी एजेंसी ने अमेरिका को अमेरिका से ही शिक्स्त दिला दी।

राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लम्बी वार्ताओं के बाद अमेरिका का अफगान तालिबान से समझौता हुआ और नाटो सहित अमेरिकी सैनिको की वापसी का रास्ता तय हो गया।। राष्ट्रपति बाईडन द्वारा शुरू में तो इस समझौते पर पुनर्विचार की बात कहीं गई लेकिन फिर कोई विकल्प न देखकर आखिरकार झुकना पङा और वापसी शुरू हो गई।। हालाँकि अभी पहली दूसरी खेप ही निकली है और उसके साथ ही तालिबान द्वारा कब्जे भी शुरू हो गये हैं यद्दपि अमेरिकी कमांड निकलने से पहले अपने अड्डे तबाह करने के बाद छोड़ रहे हैं।

बहुत से विश्लेषकों के अनुसार वहां गृह युद्ध की भी सम्भावनाये है तो कुछ का मानना है कि अमेरिका अपने सैनिको के विकल्प के रूप में डिफेन्स कॉन्ट्रेक्टर नियुक्त करके जाएगा क्योंकि किसी भी स्थिति में US अपने महाशक्ति होने के दावे से कैसे पीछे हट सकता है।। इसके विकल्प के रूप में पेंटागन द्वारा दक्षिण एशिया या पूर्व सोवियत देशों में अपने अड्डे स्थापित करने का प्रयास किया गया किंतु सफलता प्राप्त नहीं हुई, हालाँकि भारत अभी भी उनका अंतिम विकल्प हैं।। यदि भारत सरकार अमेरिकी प्रभाव से बाहर निकल कर स्वतन्त्र निर्णय लेती हैं तो इस घटनाक्रम का लाभ भी उठाया जा सकता है।। सबसे पहले तो दक्षिण एशिया में शांति प्रयासों का स्वागत् एवं सहयोग करना चाहिए और पड़ोसी देशों सहित तालिबान से अच्छे सम्बन्धो के लिए प्रयास करने चाहिए।

इसके बाद अमेरिकी दबाव के कारण रुकी हुई परियोजनाए दोबारा शुरू करके पूरी करनी चाहिए।। ऐसी ही एक महत्वाकांक्षी योजना तापी गैस पाइपलाइन है, तुर्कमेनिस्तान से कंदहार, हेलमंद और पाकिस्तान होते हुए भारत के फाजिल्का तक की इस पाइपलाइन योजना को शुरू किया जा सकता है।। इससे भारत को सीधी व् सस्ती गैस मिलनी सम्भव थी। लेकिन यदि किसी दबाव में विकास के स्थान पर फौजी अड्डो को तरजीह दी जाती है तो यह भारत की जनता के साथ धोखा एवं मूर्खता ही सिद्ध होगी।

फिलहाल तो तालिबान और पाकिस्तान ने इस योजना के शुरू किये जाने एवं पूर्ण होने का समर्थन किया है किंतु अंतिम निर्णय वर्तमान भारत सरकार को ही लेना होगा जो आंतरिक विवादों में घिरी हुई हैं।।