मैंनू तेरा शवाब ले बैठा, रंग गौरा गुलाब ले बैठा। किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए, मैंनू इहो हिसाब ले बैठा।।

गुम है, गुम है, गुम है इक कुड़ी जिंदा नाम मुहब्बत साद मुरादी, सोहनी फब्ब्त् गुम है, गुम है, गुम है।। कोई भी गीतकार या शायर तभी बनता है जब करुणा और विरह उसकी आत्मा को झकझोर देती हैं और ऐसा ही एक शब्द कार था शिव कुमार बटावली । वड्डा पिंड, शकर गढ़, ज़िला सियालकोट ( वर्तमान पाकिस्तान ) में जन्मे शिव कुमार के पिता 47 में भारतीय पंजाब के ज़िला गुरदास पुर के बाटला में आ गए, वहीं पर इनकी पढ़ाई हुई, बटवारे की विभीषिका के बीच जब अमृता प्रीतम सरीखी कलम वारिस शाह को याद कर रही थी तो शिव कुमार प्रेम और विरह के अनुभव साँझा कर रहे थे।। 1960 में पीड़ा दा परागा के बाद 1965 में महाकाव्य "लूना" जैसी अमर कृति प्रकाशित हुई। 1968 में चंडीगढ़ में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जन सम्पर्क अधिकारी नियुक्त हुए और साथ ही प्रेम, करुणा, विरह तथा मृत्यु के शब्दों के ताने बाने से जीवन की चादर बुनते बुनते केवल 36 साल की अल्प आयु में 7 मई 1973 को किरी मगयाल् , पठानकोट में प्रकृति ने इनकी जीवन यात्रा पर पूर्ण विराम लगा दिया। रोमांटिक शायर के नाम से विख्यात, दर्दों को समेटे हुए शिव कुमार बटालवी साहब को News Number परिवार सादर स्मरण करता है।