सिख गुरु परम्परा के पांचवे गुरु ब्रह्मज्ञानी गुरु अर्जन देव जी के लाहौर स्थित शहीदी स्थल की यात्रा।।

सुखमनी सुख अमृत प्रभु नाम। भगत जना के मन बिसराम ।। गुरु परम्परा को मानने वालो की आस्था और विश्वास होता है कि प्रथम गुरु शरीर त्यागने के बाद भी आत्मा स्वरूप गुरु गद्दी पर विराजित देह में उपस्थित रहते है।। ज्ञान, सेवा और सत्य को समर्पित, मानवता तथा मानव समाज को जीवन में उतार कर पाखंड का विरोध करने वाले धन गुरु नानक देव जी का प्रकाश श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी तक देह स्वरूप में चलता हुआ पांचवे गुरु अर्जन देव तक पहुंचता है।

चौथी पातशाही गुरु अमरदास जी के नवासे तथा गुरु रामदास जी के पुत्र ब्रह्मज्ञानी गुरु अर्जन देव जी का जन्म गोइंदवाल साहिब में हुआ।। गुरमुखी, संस्कृत, हिंदी आदि भाषाओं के अतिरिक्त आप जी संगीत सहित कई विधाओं में पारंगत थे।। आपके द्वारा ही श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन एवम् संकलन किया गया और समस्त वाणी को तीस रागो में प्रतिबद्ध कर दिया गया जिससे भविष्य में किसी प्रकार की दुर्भावना से कोई परिवर्तन न किया जा सके अथवा कहा जा सकता है कि विभिन्न भक्तो, संतो और भटो की वाणी को आपने अपने आशीर्वाद से अलौकिक बना दिया।

गुरु रामदास जी द्वारा अमृत सरोवर के निर्माण के बाद उसमे श्री दरबार साहिब का निर्माण भी आपकी परिकल्पना का मूर्त रुप है और दुनियां के किसी भी कोने में किसी भी धर्म का एक मात्र ऐसा निर्माण है जिसका नक्शा ही धर्म तथा मानवता का संदेश देता है।। लाहौर के मुस्लिम संत मियां मीर द्वारा जिसकी नींव रखी गई थी उसी पवित्र स्थल पर 1604 ईसवी में आदि ग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश हुआ तथा बाबा बुड्ढा जी पहले ग्रंथि हुए बाद में दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा सृजन करने के साथ ही आदि ग्रंथ को गुरु का दर्जा देते हुए देह धारी गुरु के स्थान पर शब्दगुरू स्थापित किया।। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के सम्बन्ध मे ऐसा महसूस होता है कि किन्हीं कारणों से इतिहास को कुछ बदल कर प्रस्तुत किया जाता रहा है और कुछ घटनाएं छिपा ली गई तथा कुछ को आवश्यकता से अधिक तूल दिया गया।। लाहौर शहर के बीचों बीच प्रमुख स्थल मीनार ए पाकिस्तान है जिसके निकट ही शाही किला और बादशाह मस्जिद है। इनका नक्शा एवम् स्थिति बिल्कुल दिल्ली के लाल किले और जामा मस्जिद जैसी है किन्तु इनके मध्य में शान से गुरुद्वारा डेरा साहिब और महाराजा रणजीत सिंह जी की समाधि है।

वहां उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार लाहौर के नगर सेठ लाला भागमल खत्री अपनी पुत्री का विवाह गुरु अर्जन देव से करना चाहता था और उसकी इच्छा थी नव निर्मित शहर अमृतसर में उसके धन से बसाया जाए तथा उसे व्यापारिक दृष्टिकोण से उपयोग करने दिया जाए एवम् लाभ कमाने दिया जाए।। गुरु जी द्वारा इंकार किए जाने से भाग्मल खत्री के अहम को ठेस पहुंची और उसने बादशाह को झूठी शिकायत की कि एक गुरु अपनी कुरान बना कर इस्लाम को चुनौती देने जा रहा है तथा लड़कियों को भी शिक्षित करने के लिए प्रेरित करके समाजिक परम्पराओं को दूषित करना चाहता है।। दरबार में गुरु जी बुलाया गया तथा गुरु अर्जन देव जी की वाणी विचार सुनकर बादशाह ने 51 मोहरे देकर सादर विदा किया।

इसके बाद तो भागामल की ईर्ष्या में और भी बढ़ोतरी होनी ही थी और निरन्तर उसके द्वारा जाहंगीर के दरबार मे शिकायत की जाती रही।। यद्धपि ऐसा कहा जाता है कि बादशाह जाहंगीर ने गुरु जी को गरम तवे पर सजा सुनाई थी किन्तु ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि खुद बादशाह ने अपने दरबार में गुरुजी को शहीद करने का कोई आदेश जारी किया था अलबत्ता भागमल खत्री की शिकायतों को साक्ष्य भी उपलब्ध हैं और शहर काजी द्वारा गर्म तवे पर बैठाने के आदेश का साक्ष्य भी संरक्षित है।। अंततः गुरु जी को शाही किले के निकट रावी नदी के किनारे पर यह सजा दी जानी शुरू हुई तो बीच मे ही गुरु जी नदी में स्नान की इच्छा जताई और रावी में स्नान के लिए उतरने के बाद उसी में लोप हो गए।

प्रकृति कभी पाप का साथ नहीं देती और इसके बाद लगातार रावी से बाढ़ के बहाने लाहौर को भुतहा बनाने का क्रम जारी रहा जब महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब साम्राज्य की स्थापना की तो उनकी जानकारी में शहीदी स्थल के साथ साथ बाढ़ की विभीषिका तथा इससे होनी वाले नुकसान भी आया।। महाराजा साहब ने आज्ञा दी तथा केवल 15 दिन के अल्पकाल में ही रावी नदी का रुख मोड़कर वहां से लगभग 20 किमी दूर लाहौर से बाहर कर दिया गया।। किसी बड़ी नदी का मनुष्यो द्वारा इस प्रकार से दिशा बदलने का यह अतुलनीय उदाहरण हैं और आज भी रावी लाहौर के बाहर से ही गुजरती हैं।। वर्तमान में उस शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा डेरा साहिब स्थित है जिसका प्रबन्धन पाकिस्तान सरकार का इवेक्यू प्रॉपर्टी विभाग करता है। इस गुरुद्वारा साहिब के अंदर हॉस्टल भी है जहां पेशावर एवम् अन्य क्षेत्रों के सिख युवकों के रहने, पढ़ने की व्यवस्था है।

अंदर लंगर सेवा भी है और इसी परिसर में महाराजा रणजीत सिंह जी की समाधि है।। शाही किले के प्रवेश द्वार से चंद कदम पहले ही गुरुद्वारे की भव्यता अहसास करा देती हैं कि बादशाहों का भी कोई बादशाह होता हैं।। गुरुद्वारा डेरा साहिब के परिसर में किसी भी पाकिस्तानी नागरिक के प्रवेश पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबन्ध लगाया गया है लेकिन सुबह से ही गुरुद्वारा साहिब के गेट पर मुस्लिम महिलाओं को कतार देखी जा सकती है।। इस स्थल के साथ यह विश्वास जुड़ा हुआ है कि यहां स्थित कुवे के जल को आग या तेजाब के कारण जले हुए घाव को धोने से तुरन्त आराम मिलता है।। बहरहाल जो भी है लेकिन यह हकीकत है कि गुरु अर्जन देव जी द्वारा किए गए शिक्षा के प्रसार के कारण ही आज सिख समुदाय के बच्चे पढ़ाई में भी चुनौती दे रहे हैं