सड़क पर चलते विशालकाय जलयान जैसे लगने वाले ट्रक ! पाकिस्तानी ट्रक आर्ट के पीछे की मानसिकता और संस्कृति।

कभी सड़क मार्ग से पाकिस्तान की यात्रा करे तो ऐसा लगता है कि सामने से कोई बड़ा सा पानी का जहाज टायरो पर रखा हुआ है और बढ़ता चला आ रहा है।। विशेषकर यदि रात के समय हाईवे पर चल रहे हो तो ऐसे बड़े बड़े ट्रक्स के चारो ओर चमचमाती रोशनियां एवम् रिफ्लेक्ट करते रंग एक ऐसा अनुभव होता है जिसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता।। इसके विकास और ट्रकों को इस प्रकार से सजाने के पीछे क्या मानसिकता हो सकती हैं तथा यह केवल पाकिस्तान तक ही सीमित क्यो है ?

सदियों से वर्तमान पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति की एक विशेषता रही हैं जो इस भूभाग को विश्व का ब्रिज बनाती हैं अर्थात दुनियां को जोड़ने वाला पुल। ओल्ड सिल्क रूट हो या यूरोप से मध्य एशिया तक के व्यापारियों का सड़क मार्ग, सभी के लिए पाकिस्तान से गुजर कर आना जाना एकमात्र विकल्प रहा है।। राजस्थान के पत्थरो से लेकर केरल के मसालों तक की खरीद के लिए यही एकमात्र रास्ता था और काफिलों को ख़ैबर दर्रे से या बलोचिस्तान से होकर आना पड़ता था जिसके बाद वो वर्तमान के राजस्थान एवम् गुजरात के रास्ते भारत में प्रवेश करते थे। पंजाब का मार्ग नदियों एवम् दलदली जमीन के कारण छोड़ दिया जाता था।

उन्ही व्यापारिक काफिलों के कारण पेशावर एवम् बगदाद जैसे शहरों का विकास हुआ और दक्षिण एशिया में पेशावर सबसे बड़ा मनी एक्सचेंज सेंटर बन गया। इसके पीछे का कारण यह था कि हिंदुस्तान में सोना स्वीकार किया जाता था तथा यूरोप एवम् मध्य एशिया में चांदी भी चलती थी।। आमतौर पर यह मानवीय कमजोरी है कि वो अपने स्वप्नों को साकार रूप में देखने के लिए और कुछ नहीं तो उसकी डमी बनाकर आत्म संतुष्टि कर लेता है। कुछ ऐसा ही व्यापारिक रास्तों के बीच में रहने वाले नागरिकों के साथ होता था और पख्तुनख्वा के बाशिंदों को काफिलों की तर्ज पर बड़ा दिखने की चाहत ने उन्हें अपने छकड़े ( ऊंठ गाड़ी ) सजाने की ओर आकर्षित किया।

इसके अतिरिक्त काफिलों से जल मार्ग एवम् समुद्र के रास्ते चलने वाले बड़े बड़े जहाजों की कल्पना भी उन्हे अंदर तक कटोचती थी। यहां याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान में ब्राह्मणवादी विचारधारा के अनुसार समुद्र से यात्रा करना पाप कर्म बताया जाता था।। इन्हीं हीन भावनाओ से ग्रसित उस वक्त के टैक्सी ड्राइवर या माल वाहक बेड़े वालो ने अपने वाहन सजाने शुरू कर दिए। इसके अतिरिक्त क्योंकि पाकिस्तान का अधिकांश सार्वजनिक वाहन उद्योग पख़्तून क्षेत्र के पठानों द्वारा संचालित रहा है और प्राकृतिक रूप से पख्तुनख्वा क्षेत्र पिछड़ा रहा है या कम आबादी वाला इलाका रहा है तो इसी अकेले पन और शुष्क माहौल में रंग भरने के लिए रंग बिरंगे ट्रकों का प्रचलन बढ़ता गया।। जैसे जैसे सड़को का विकास हुआ तथा इंजन से चलने वाले वाहन आए तो रात को भी यात्राएं होने लगी तथा दूर से नजर आने के लिए ट्रकों के चारो ओर लाइट्स लगाने एवम् चमकदार स्टिकर लगाने का रिवाज बनता गया। दिन के समय रंग बिरंगे फूल पत्तियों से सजे ट्रक दूर से नजर आए इसके लिए चमकदार रंगो का इस्तेमाल किया जाता था।

यद्धपि आज उनके शेप के कारण ईंधन की खपत ज्यादा होती हैं एवम् गति भी धीमी रहती हैं किन्तु फिर भी यह ट्रक आर्ट प्रचलित हैं क्योंकि आज यह वहां की अस्मिता का पर्याय बन चुका है। ईंधन की अधिक खपत तथा अवैज्ञानिक डिजाइन के कारण ही इसे देखने में अच्छा लगने के बावजूद दुनियां ने व्यवहारिक नहीं समझा और यहां के अतिरिक्त किसी अन्य देश में स्वीकार नहीं किया गया।। नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग की अंदरूनी साज सज्जा में भी दीवारों पर इस प्रकार की ट्रक आर्ट का उपयोग किया गया है और जनाब अब्दुल बासित के उच्चयुक्त रहने के समय में विशेष रूप से न केवल अंदरुनी दीवारें बदली गई थी अपितु आने वाले मेहमानों को इसी आर्ट के डिजाइन वाले मग भेंट किए जाते थे।

हिंदुस्तान के रेगिस्तानी इलाकों में गहरे रंगों के उपयोग एवम् शीशे से सजे हुई ड्रेसेस के पीछे भी कुछ ऐसी ही मानसिकता हो सकती हैं क्योंकि इंसान को जो हासिल नहीं होता वो उसे ही प्राप्त करने की कोशिश करता है और जो मिल रहा होता है उसकी कद्र नहीं करता बेशक वो पानी हो, ऑक्सीजन हो या खुशियां।। करोना काल के इस गमजदा माहौल में जब खुशियां, हसी और हैल्थ गायब हो गई है तो हमे इनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने चाहिए तथा साथ ही प्रकृति द्वारा निशुल्क दी गई शुद्ध हवा ( ऑक्सीजन ) तथा जल के संरक्षण के लिए भी प्रयत्न करने चाहिए।।