सरकार से दो कदम आगे जनता, शराब या शिक्षा ? प्राथमिकता किसको ?

कहते है तू डाल डाल मै पात पात लेकिन अक्सर सिस्टम में बैठे अफसरों और सरकार चला रहे नेताओ को यह अहसास भूल जाता है और जनता को याद कराना पड़ता है।। करोना महामारी हो या चुनाव, सरकारों के लिए सबसे पहला और आसान निशाना सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे तथा उन्हे पढ़ा रहे शिक्षक होते है।। सियासत के लिए बेशक स्कूल बंद हो जाए किन्तु रियासत की आमदनी और सहूलियतें कम नहीं होनी चाहिए क्योंकि सरकारों के लिए जनता का नंबर बाद में आता है।

घटना के स्थान की तो पुष्टि नहीं हुई किन्तु इसको व्यंग भी समझा जा सकता है। हुआ यूं कि करोना महामारी के कारण कर्फ्यू और लॉक डाउन की घोषणा मजबूरी बन गई तथा सरकार ने स्कूल, कॉलेज से लेकर सभी बाज़ार बन्द रखने का आदेश जारी कर दिया।। अपवाद स्वरूप इसमें शराब के ठेके खुले रखने की अनुमति प्रदान कर दी गई क्योंकि शायद सरकार को विकास के लिए राजस्व केवल इसी विभाग से प्राप्त होता हैं या दूसरे शब्दो में राज्य के विकास में सबसे अहम योगदान शराबियों का ही होता है।। जब अधिकारियों से सवाल किया गया कि शराब की दुकानें खोलने की अनुमति क्यों दी गई ?

ऐसा क्या करोना बीमारी का असर शराब के ठेके पर नहीं होता तो अफ़सर का जवाब था कि शराब के ठेके के आसपास की जगह करोना प्रूफ होती हैं तथा वहां कोई डर भय वाली बात नहीं है।। जनता ने भी समझदारी दिखाई और ठेके के सामने ही स्कूल का फर्नीचर रख कर बच्चो की पढ़ाई शुरू कर दी।। आगे सरकार बहादुर की मर्जी ! वो चाहे तो उस जगह को असुरक्षित घोषित कर दे नहीं तो पढ़ाई में बाधा न डाले क्योंकि बच्चे पढ़ने के लिए राजी है और शिक्षक पढ़ाने के लिए फिर तकलीफ़ किसको और क्यों ?