अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी क्या सम्भव होगी या छलावा सिद्ध होगा ?

सोवियत संघ द्वारा किसी गर्म पानी के बंदरगाह की तलाश और इतिहास को नजरंदाज करके लिए निर्णय ने सोवियत की शक्तिशाली सेना को साम्राज्यों के कब्रिस्तान में फसा दिया था।। उस समय भारत और सोवियत संघ एक दूसरे के न केवल मित्र देश थे अपितु सामरिक साझीदार भी थे और 1971 की टूट के बाद यही खतरा पाकिस्तान के लिए चिंता का कारण बन गया था।। पाकिस्तान के तानाशाह जिया उल हक ने सोवियत खतरे से सुरक्षित होने के लिए अमेरिका को गुहार लगाई जो उस समय पाकिस्तान का सहयोगी देश था और इस प्रकार दक्षिण एशिया में प्रोक्सी वार की बुनियाद रखी गई।

जिया उल हक ने सी आई ए तथा मोसाद की मदद से मुजाहिदीन का गठन किया तथा इस प्रकार तालिबान संगठन बना तथा सोवियत संघ को नाकाबिल बर्दाश्त नुकसान के साथ अफगानिस्तान से वापिस निकलना पड़ा। तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और अपनी घोर दक्षिण पंथी सोच के साथ 6 वर्ष तक शासन किया।। बेशक उनके दौर में अफगानिस्तान में कानून व्यवस्था हैरानी की हद तक विश्वसनीय स्तर की रही लेकिन उनके अमानवीय व्यवहार तथा अमेरिका को दखल की अनुमति न देने के कारण वो भी यूएस के लिए आंखो की किरकिरी बन गए।। इसके बाद 9/11 की घटना हुई और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से केवल एक प्रश्न पूछा गया कि या तो अमेरिका के साथ हो या विरूद्ध ? पाकिस्तान ने घुटने टेक कर साथ देने का वायदा किया तथा एक ही रात में तालिबान मुजाहिदीन से आतंकवादी बन गए ।

7 अक्तूबर 2001 को यूएस फोर्सेज ने पहला हमला किया और 20 अक्तूबर 2001 को 43 देशों के नाटो संगठन की सैनिक शक्ति के साथ अफगानिस्तान में दाखिल होकर अपनी कठपुतली शासन व्यवस्था कायम कर दी।। तालिबान आतंकवादी करार दे दिए गए, कुछ पकड़े गए, कुछ को पाकिस्तान ने छुपा लिया और कुछ भाग गए।। इसके बाद अफगानिस्तान फिर से संघर्ष का केंद्र बन गया और जो मुजाहिदीन या तालिबान कल तक अमेरिका द्वारा पोषित थे उन्होंने उसी अमेरिका तथा नाटो फोर्सेज के विरूद्ध हथियार उठा लिए।। प्रोक्सी चलती रही और अफगानिस्तान का विकास तथा संघर्ष भी चलता रहा तथा साथ ही नई शक्तियों का भी उदय होता रहा जिसमे रूस का दोबारा सैनिक तथा आर्थिक रूप से स्थिर होना एवम् चीन का आर्थिक शक्ति के रूप मे मजबूत होना विशेष महत्व रखता है।

दूसरी ओर अमेरिका तथा यूरोपियन मार्केट्स कमजोर होती गई तथा चीन द्वारा बेल्ट एंड रोड के साथ साथ सिपेक परियोजना से अफगानिस्तान का महत्व बढ़ गया। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा कर दी कि वो दुनियां भर में फैले युद्धों को खत्म करके यूएस सैनिकों की वापसी सुनिश्चित करेंगे जिसके चलते उन्होंने जल्मे खालिलजाद को नियुक्त किया एवम् कतर की राजधानी दोहा मे रह रहे अफ़गान तालिबान से वार्ता शुरू कर दी।। लगभग दो साल की मैराथन वार्ताओं के बाद यूएस एवम् तालिबान के बीच समझौता हुआ जिसके अनुसार एक मई 2021 तक सभी विदेशी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापिस निकल जाना था लेकिन जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद इस समझौते पर आशंकाओं के बादल छा गए।। फिर एक बार खींचतान तथा धमकियों का दौर चला और अंत में राष्ट्रपति बाइडेन ने घोषणा कर दी कि वो एक मई से वापसी शुरू कर देंगे किन्तु 11 सितम्बर तक ही वापिस होंगे।। अपनी घोषणा के अनुसार अमेरिकी सैनिकों ने वापसी की तैयारियां शुरू तो कर दी है किन्तु संशय अभी बाकी हैं क्योंकि 20 साल की लंबी लड़ाई के बाद भी यूएस चंद मुजाहिद तालिबान से पराजित होकर निकलता है तो उसकी महाशक्ति होने की छवि धूमिल हो सकती हैं दूसरा उसके द्वारा चीन के विरूद्ध एक महत्वपूर्ण मोर्चा समाप्त होता है।

वर्तमान अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने नाटो फोर्सेज की वापसी का विरोध किया और तालिबान को सत्ता सौंपने से इंकार कर दिया।। दबाव पड़ने पर दो दिन पहले अशरफ गनी ने अपनी जनता को संबोधित करते हुए टीवी पर कहा कि वो तालिबान से सत्ता की साझिदारी के लिए तैयार हैं एवम् अगले चुनावों तक नेशनल गवर्नमेंट बना सकते है जिसे तालिबान ने स्वीकार नहीं किया।। दूसरी ओर विगत रात से अधिकांश नेशनल हाईवे पर तालिबान ने अपने चुंगी नाके स्थापित कर लिए हैं जबकि यूएस फोर्सेज ने अफगानिस्तान के निकट ही अपने लिए नए अड्डे तलाश करने शुरू कर दिए हैं।। यूएस को आशा थी कि C 5 ( पूर्व सोवियत ) देशों में जगह मिल सकती हैं जिसे रूस के प्रभाव में तजाकिस्तान एवम् उज़्बेकिस्तान ने मना कर दिया है। पाकिस्तान पहले से ही मना कर चुका है और ईरान से यूएस के सम्बन्ध इस्लामिक क्रांति के बाद से ही खराब है।

भारत में अपने अड्डे स्थापित करने की इच्छा भी पूर्ण हो सकती थी किन्तु करोना में सरकारी अव्यवस्था तथा अन्य कारणो से मोड़ी सरकार का मनोबल टूटा हुआ है दूसरा अभी भारत का चीन से दुश्मनी लेने का साहस व क्षमता भी नहीं है।। फिर भविष्य की क्या संभावनाएं हो सकती हैं ? 36 देशों के 9592 सैनिक तथा यूएस के 2500 सैनिक ऐसे ही तो महत्वपूर्ण बिंदु से वापिस नहीं जा सकते ! या तो यूएस फोर्सेज पर कोई हमला दिखा कर समझौता रद्द किया जाएगा, या डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर ( ब्लैक वाटर टाइप ) को नियुक्त किया जाएगा अन्यथा तालिबान द्वारा हमले और रक्तपात तो अवश्यसंभावी हैं ही।। बहरहाल अभी शांति की आशा करना शैले के स्काई लार्क जैसी कल्पना ही होगी।।