भारतीय सिनेमा के अद्भुत कलाकार , जिसकी आंखें बोलती थी, ऐसे इरफान खान को उनकी पहली बरसी पर सादर स्मरण।

डाकू बैठे संसद में, बीहड़ में तो बागी होत हैं।। पान सिंह तोमर फिल्म का यह डायलॉग जितना सिनेमा हॉल में पसंद किया गया शायद उससे भी ज्यादा सिनेमा से बाहर और संसद तक में दोहराया गया।। राजस्थान के टोंक जिले के छोटे से गांव में खानदानी पठानों के घर जन्म लेने वाला युवा न जाने कैसे कला के क्षेत्र को अपना कैरियर बनाने का निश्चय कर लेता है।। परिवार से झूठ बोलकर नई दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेता है और थियेटर को अपना शौक बना लेता है।। लेकिन थियेटर मानसिक संतुष्टि तो दे सकता है, बुद्धिजीवी या कला प्रेमी समाज से प्रशंसा भी दिला सकता है लेकिन रोजी रोटी और बड़ी दर्शक संख्या के लिए कलाकारों को सिनेमा की दुनिया में ही कदम रखना पड़ता है बेशक अब उसकी पहली सीढ़ी टीवी बन गई हैं।। इरफान खान दिल्ली से मुंबई गए और सिनेमा and टीवी इंस्टीट्यूट से जुड़े वहीं से इन्हे पहला ब्रेक टीवी ड्रामा में मिला ।। क्योंकि कला तो अपना परिचय खुद देती हैं इसलिए इन्हे अपना परिचय देने के लिए किसी महानायक का बेटा होना या किसी नायिका का भतीजा होना नहीं बताना पड़ा।। हिंदी फिल्मों की लंबी सूची और ढेरों सम्मान प्राप्त करने के साथ साथ इरफान ने ब्रिटिश तथा हॉलीवुड मे भी अपनी कला का सितारा बुलन्द किया और कहा जा सकता है कि ये वास्तव मे ग्लोबल भारतीय सिनेमा कलाकार थे।। अचानक इन्हे नामुराद बीमारी ने घेर लिया, इलाज के बाद खुद को लगभग स्वस्थ बताते बताते पिछले साल 29 अप्रैल 2020 को ये अपने प्रशंसकों के लिए सिर्फ अपनी यादें छोड़कर एक लंबे विश्राम के लिए रुखसत हो गए।। News Number परिवार इनकी पुण्यतिथि पर इन्हे सादर स्मरण करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।।