जिंदगी यूं ही चली, यूं ही चली मीलो तक। चांदनी चार कदम, धूप चली मिलो तक।।

जिंदगी यूं ही चली, यूं ही चली मीलों तक। चांदनी चार कदम, धूप चली मीलों तक।। 1 जुलाई 1942, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का जिला मुरादाबाद और उसके छोटे से कस्बे चंदौसी से लगा हुआ एक गांव।। सक्सेना परिवार में एक बच्चा जन्म लेता है और केवल 9 माह की आयु में ही अनाथ हो जाता हैं। उसकी बड़ी बहन और बहनोई उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी लेते है लेकिन दुर्भाग्य यहां भी पीछा करते हुए उसकी बहन को लील जाता हैं।। घर में बिजली नहीं होती लेकिन स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ते हुए, बड़े होते हुए और कवितायों के माध्यम से शब्दो का जाल बुनते हुए वो संघर्ष को जीवन का अंग बना कर ही बड़ा होता है।। उसका नाम रखा गया था "कुंवर बहादुर सक्सेना" लेकिन जीवन की बैचैनियों ने उसे खुद उसके नाम के साथ "बैचैन" जोड़ने के लिए प्रेरित किया और दुनियां उसे "कुंवर बैचैन" की संज्ञा से पहचानने लगी।। 1995 से 2001 तक MMH पीजी कॉलेज गाजियाबाद में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे डॉ कुंवर बैचैन ने MA, M.Com के साथ पीएचडी की डिग्रियां हासिल की किन्तु उससे भी अधिक साहित्य तथा जनता का सम्मान एवम् आदर प्राप्त किया। आप वो कवि थे जिन्हे ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में भी सम्मानित किया गया।। चंद दिन पहले करोना महामारी की चपेट मे आने के कारण बीमार हो गए लेकिन समय पर किसी अस्पताल में स्थान प्राप्त नहीं हुआ, यहां तक कि इनके शिष्य और कभी आम आदमी पार्टी के नेता रहे कुमार विश्वास को सार्वजनिक रूप से इनके इलाज की व्यवस्था के लिए अपील करनी पड़ी।। आखिरकार नोएडा के एक अस्पताल में करोना से जीवित रहने के संघर्ष करते हुए इन्हे हार स्वीकार करनी पड़ी या दूसरे शब्दो मे कहे तो इनकी दुनियावी गजल का आखरी अंतरा पूरा हुआ और पूर्ण विराम लग गया।। हिंदी साहित्य के ज्वलंत हस्ताक्षर के शांत हो जाने पर News Number परिवार हार्दिक संवेदनाएं व्यक्त करता है।। "सभी के काम आएंगे, वक्त पड़ने पर। तू अपने सारे तजुर्बे , ग़ज़ल में ढाल के चल"।।