भारत पाकिस्तान सम्बन्धों में तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार करके हम परम्परागत स्थापित विदेश नीति को छोड़ चुके है !

देखन में छोटन लगे, घाव करे गम्भीर। कभी कभी कथित छोटे छोटे देश भी इतने बड़े काम करने का दावा करते हैं कि भारत महान जैसे विश्व गुरु देश को शामिंदगी महसूस होने लगती हैं। कुछ ऐसा ही अमेरिका के रक्षा सचिव जिम मेटिंस की उपस्थिति में संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री ने किया और अभी तक पर्दे के पीछे दुबई में भारत तथा पाकिस्तान के गुप्तचर अधिकारियों की मेल मुलाकाते सार्वजनिक कर दी।

वैसे तो 1960 के बाद से ही भारत पाकिस्तान के सम्बन्ध हमेशा तल्खियों से भरे हुए रहे है और सीमाएं, विशेषकर कश्मीर को अलग करने वाली सीमा रेखा तो सदैव बारूद की गंध और गोलियों की गूंज से एकजार रही है। यद्धपि 1972 के शिमला समझौते के बाद कुछ समय शांति रही किन्तु 1989 के बाद फिर उसी ढर्रे पर चल पड़े। जाने जाती रही और दोनों देश एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे। 2003 में दोनों देशों में युद्ध विराम पर सहमति बनी तथा कुछ समय शांति भी रही, फिर 2015 में पाकिस्तान द्वारा उस युद्धविराम को औपचारिक मान्यता देने की मांग की गई किन्तु भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया। फिर तो गोलाबारी का युग लौट आया और प्रतिदिन का रूटीन बन गया लेकिन अचानक 25 फ़रवरी 2021 को दोनों ओर के DHMO द्वारा एक बयान जारी किया गया कि दोनों देश लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर युद्धविराम रखने को तैयार हो गए हैं तथा उसके बाद किसी उल्लंघन का समाचार भी नहीं मिला। 26 फरवरी को यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल बिन ज़ायेद भारत यात्रा पर आए और इस सहमति पर खुशी जताई किंतु कोई विशेष बयान नहीं दिया।

इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात का इजरायल को मान्यता देना तथा भारत के ईरान से सम्बन्ध समाप्त होना भी समय की उल्लेखनीय घटनाए है किन्तु अचानक यूएई द्वारा यह रहस्योद्घाटन कि उनके द्वारा भारत पाकिस्तान को एक मेज पर लाने के प्रयास सफल हुए थे एवम् भारत पाकिस्तान के बीच ट्रैक टू डिप्लोमेसी के लिए दुबई में जनवरी से चल रही मुलाकातों के कारण ही कश्मीर पर दोनों देशों के बीच किसी समझौते तक पहुंचने में कामयाबी मिली है न केवल भारतीय जनता अपितु अधिकांश देशों को भी हैरान करने वाला था।

भारत पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते में स्पष्ट है कि दोनों देश किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे और किसी भी समस्या का समाधान आपसी द्विपक्षीय वार्ता से ही करेंगे। क्या मोदी सरकार अमेरिका अथवा इजरायल के इतने दबाव में आ गई है कि परम्परागत स्थापित विदेश नीति को भी त्याग दिया गया है ? वैसे इस शांति वार्ता के पीछे अरब देशों का क्या हित हो सकता है ? निसंदेह यह अमेरिकी दबाव में किया गया होगा और यूएस भारत को चारो ओर से हटाकर केवल चीन के विरूद्ध खड़े होने तथा उसे रोकने के लिए तैयार करना चाहता है। निसंदेह यह बहुत दुखद है और भारत की गिरती साख को एक धक्का और है।

भारत पाकिस्तान के सम्बन्धों में निकटता के लिए पर्दे के पीछे चल रही बातचीत सफल होने की आशा से वार्ताओं के दौर सार्वजनिक करने की उम्मीद !

भारत पाकिस्तान के बीच बेहतर सम्बन्धों को लेकर मित्र देशों के माध्यम से चल रही बातचीत सार्वजनिक होने जा रही है और इसकी घोषणा भी शीघ्र हो सकती हैं।। ...

दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि का एक मजबूत स्तंभ जिसे कभी धर्म की आड़ में तो कभी सियासत के लिए तोड़ दिया गया।

दक्षिण एशिया को धीरे धीरे वैश्विक महाशक्तियों का अखाड़ा बनने की आशंका जताई जा रही हैं लेकिन भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध और शांति के झुलो के बीच एक संस्कृति ऐसी भी है जो क्षेत्र में शांति की गारंटी बन सकती हैं बशर्ते दोनों देश अपनी अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखकर भी पॉजिटिव सोच रख ले। ...

भारत पाक सम्बन्ध ! पत्थर की फुटबाल से खेला जाने वाला सोकर्स मैच ! गत 75 साल से उतार चढ़ाव के बीच आम जनता की समझ में न आ सके रिश्ते किसी सियासी मजबूरियों के बन्धक कहलाए जा सकते है।

1947 और ब्रिटिश साम्राज्य ने हिंदुस्तान को आज़ादी दे दी लेकिन साथ ही एक ऐसा जख्म भी दे दिया जिसको ठीक होने के लिए दोनों ओर की जनता विशेषकर पंजाबी समुदाय आज तक केवल इंतजार कर रहा है लेकिन शायद किन्हीं राजनीतिक मजबूरियों के चलते कभी आशा की किरण नजर आती हैं तो कभी घना अंधेरा। ...