अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा अफगानिस्तान से अपनी सैनिकों की वापसी को अमेरिका की पराजय स्वीकार करना मान सकते या मजबूरी ?

विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति वाशिंगटन स्थित हरलिंगटन कब्रिस्तान के सेक्शन 16 में जाता हैं और दुनियां देखती है कि उसकी आंखे नम हो गईं हैं। हो सकता है कि एक पिता को अपने गुजरे हुए बेटे की याद आई हो या उन सैनिकों से सहानुभूति जागृत हो गई हो जिन्होंने वार अगेंस्ट टेरर के नाम पर सत्ता के झूठ पर अपनी जाने कुर्बान कर दी थी। इससे पहले राष्ट्रपति जो बाइडेन व्हाइट हाउस के उसी ट्रीटी रूम से 16 मिनिट लंबा संबोधन करते हुए बताते हैं कि अमेरिका एक मई से अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापिस बुलाना शुरू कर देगा और 11 सितम्बर तक वापसी पूरी कर लेगा। इसी ट्रीटी रूम से 7 अक्तूबर 2001 को जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने घोषणा की थी कि वो सहयोगी नाटो शक्ति सहित अफगानिस्तान पर हमला कर रहे है जहां बाद में मदर ऑफ़ बम्स का भी परीक्षण किया गया। प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि क्या तालिबान 11 सितम्बर की सीमा रेखा स्वीकार करेंगे ? सैनिकों की वापसी के बाद भी क्या अमेरिका सुरक्षित रहेगा जैसा कि 20 साल पहले शुरू किए गए युद्ध के समय बताया गया था।

राष्ट्रपति ने बताया कि यह युद्ध तो उसी दिन समाप्त हो गया था जिस दिन ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था लेकिन तालिबान ने 2001 में प्रकाशित टाइम्स मैगजीन को पुनः प्रकाशित करते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान में किया गया ऑपरेशन केवल एक नाटक था और ओसामा वहां मौजूद ही नहीं था। वैसे ओबामा ने राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण से पहले 2008 में पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमा के निकट स्थित कुन्हड़ के दौरे के समय भी दोहराया था कि यूएस इस युद्ध में क्यो शामिल है ? बेशक अपनी विश्वसनीयता तथा झूठी शान के कारण वो सैनिकों की वापसी का निर्णय नहीं ले सके। अपने भाषण में बाइडन ने पाकिस्तान, रूस, चीन, भारत तथा तुर्की के सहयोग को भी दोहराया और पाकिस्तान को शांति के लिए और अधिक प्रयास करने के लिए कहा ( देशों के नाम इसी क्रम में लिए गए थे ) राष्ट्रपति जो बाइडेन के भाषण से मुख्यता यह समझा जा सकता है कि उनका ध्यान केवल चीन को रोकने पर केन्द्रित है यद्धपि उन्होंने करोना महामारी से निपटने तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बात कही है किन्तु साथ ही अगले छह महीनों में किसी बड़ी महामारी के लिए भी तैयार रहने की आशंका जताई है। स्पष्ट शब्दों में यह तो नहीं कहा जा सकता कि महाशक्ति ने 44 सहयोगी देशों तथा आधुनिकतम हथियारों के बावजूद पराजय स्वीकार कर ली है लेकिन जिस कमजोर समझे जाने वाले शत्रु से वो बीस साल से लड़ रहे थे उसी को सत्ता सौंप कर जाना विजय प्राप्त करना भी नहीं कहलाया जा सकता।

राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान अफ़गान जनता का है और उन्ही को शासन करने का हक है जिसका अर्थ होता है कि यूएस सत्ता की चाबी तालिबान को सौंपने जा रहा है सम्भवतः शुरुआत में पॉवर शेयरिंग के आधार पर ही सत्ता का हस्तांतरण किया जाए। फिर भी फेस सेविंग के लिए दूतावास तथा अमेरिकी अधिकारियों की उपस्थिति तथा उनकी सुरक्षा को लेकर बहुत कुछ निर्णय बाकी हैं और यदि इस बीच किसी कारण से अमेरिकी या नाटो सैनिकों पर कोई हमला हो जाता हैं तो कई साल से चल रही वार्ताओं के निष्फल होने का अंदेशा भी रहेगा।। आशा करनी चाहिए कि कोई डिस्ट्रॉयर बीच में न आए तथा दक्षिण एशिया में शांति प्रयासों को सफलता प्राप्त हो।।