दक्षिण एशिया के देशों की बिगड़ती आंतरिक कानून व्यवस्था ! संयोग या साज़िश ?

दक्षिण एशिया के देशों में विगत कुछ समय में अचानक उठ खड़े हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों एवम् आंदोलनों के पीछे क्या कोई नियोजित साज़िश रची गई है या इसे matter of chance समझा जा सकता है? शुरू करते हैं Mayanmar से जहां आंग सांग सु ची को सत्ता से हटा कर सेना ने शासन अपने हाथ में ले लिया लेकिन कुल जमा 73 साल से आजाद मुल्क में 50 साल तक सैनिक शासन में रहने वाली जनता सड़कों पर उतर आई और मयंमार् लगभग गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो चुका है।

भारत के प्रधानमन्त्री बांग्लादेश की यात्रा पर गए और यदि देखा जाए तो बांग्ला देश को सबसे अधिक फायदा भी श्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में हुआ है लेकिन इनका इतना भयावह विरोध हुआ जैसा कभी किसी राष्ट्रध्यक्ष का कहीं नहीं हुआ होगा, उस प्रदर्शन में कई निर्दोष नागरिक मारे भी गए और अभी तक स्थिति सामान्य नहीं है। अफगानिस्तान तो वैसे ही कई वर्षो से गृह युद्ध जैसे हालात में ही है।

कल से पाकिस्तान भी अस्त व्यस्त हो गया है तथा यह हालात पवित्र धार्मिक महीने रमजान के शुरू होने के साथ ही धर्म के नाम पर हो रहे है। इसकी पृष्ठभूमि में पिछले साल फ्रांस की मैगजीन में पैगम्बर मुहम्मद साहब की शान में गुस्ताखी के खाके प्रकाशित करना है। फ्रांस के प्रधानमन्त्री ने उस कार्टूनिस्ट के बचाव में बयान दिया तो पाकिस्तान की एक धार्मिक पार्टी तहरीक ए लब्बैक पाकिस्तान ने व्यापक जन समूह के साथ रावलपिंडी में धरना शुरू कर दिया। TLP वैसे तो स्वयं को धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रखती है और इसका मुख्य उद्देश्य इस्लाम तथा पैगम्बर के समर्थन में धार्मिक आयोजन करना है लेकिन पिछले साल फ्रांस के विरूद्ध प्रदर्शन को व्यापक समर्थन मिला तथा सरकार ने TLP प्रमुख के साथ लिखित समझौता कर लिया जिसमे फ्रांस के विरूद्ध निंदा प्रस्ताव संसद से पास कराना तथा इस्लामाबाद में फ्रांस के राजदूत की वापिसी भी था। एक वर्ष गुजर गया और जिनके साथ समझोता हुआ था वो भी चल बसे, उनके स्थान पर उनका बेटा प्रमुख बना तथा बेटे ने अंतिम 20 अप्रैल की डेड लाइन दे दी अन्यथा पिंडी मार्च की घोषणा भी कर दी।

कल शाम को वर्तमान प्रमुख "शाद रिजवी" साहब किसी की अंतिम नमाज़ के लिए जाते हुए पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए जिसकी खबर चंद मिनटों में फ़ैल गई तथा लोगो ने सड़को पर तोड़फोड़ एवम् ट्रेफिक जाम शुरू कर दिया। लाहौर के निकट शाहदरा में पुलिस बल के साथ हिंसक झड़पें भी हुई और 24 घंटे बाद भी स्थिति नियंत्रण से बाहर है। क्योंकि पैगम्बर साहब की शान में धार्मिक भावनाओं के साथ विरोध किया जा रहा है तो सरकार अधिक ताकत का उपयोग भी नहीं कर सकती और किए गए समझौते के अनुसार तो कदम उठाने का सवाल ही नहीं होता क्योंकि ऐसा करने से न केवल फ्रांस अपितु यूरोप तथा फ्रेंड्स ऑफ यूरोप के देशों द्वारा भी पाकिस्तान का बहिष्कार किया जा सकता हैं।

कोई भी देश वैश्विक आइसोलेशन की स्थिति में कैसे रह सकता है यह अहसास सरकारी अधिकारियों को अवश्य होगा लेकिन फिलहाल कोई समाधान नजर नहीं आ रहा। ध्यान रहे कि कुछ महीने पहले संयुक्त विपक्ष ने भी आंदोलन किए थे किन्तु वो अंततः विफल रहे लेकिन इसको जन समर्थन मिलने की पूरी उम्मीद है। प्रश्न अभी भी वहीं खड़ा है कि क्या ये सब आंदोलन और सरकार एवम् जनता के बीच के टकराव किसी प्रोक्सी का हिस्सा है अथवा वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था एवम् नेता ही इतने कमजोर और ना अहल हो चुके है कि हालात नहीं संभाल सकते ?