दक्षिण एशिया में अचानक शांति की उम्मीद की झटका लगने का अंदेशा !

2001 अमेरिका द्वारा नाटो सेना के साथ दक्षिण एशिया के Graveyards of empires कहे जाने वाले अफगानिस्तान में शांति बहाली के नाम पर कब्ज़ा हो गया और कभी अमेरिकी सहयोग से ही बने तालिबान ने अमेरिकी तथा नाटो सेना के विरूद्ध हथियार उठा लिए। जिस सोवियत संघ के विरूद्ध इस अफगानिस्तान तालिबान का गठन किया गया था अमेरिका के विरूद्ध संघर्ष शुरू करते ही कहा जाता है कि उसी रूस ने इन्हे मदद देनी शुरू कर दी। अंत में ट्रंप प्रशासन ने विश्व भर में युद्ध रत अमेरिकी सैनिकों की वापिसी नीति पर काम शुरू किया और एक लंबे निगोशिएशन के बाद अमेरिका तथा अफ़गान तालिबान के बीच समझौता हुआ जिसके अनुसार एक मई 2021 तक अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापिस हो जाना था और उस समय तक तालिबान द्वारा उनके विरूद्ध कोई हमला या किसी भी प्रकार का विरोध नहीं करना था। क्योंकि अफ़गान तालिबान की कोई वैधानिक मान्यता नहीं थी और अमेरिका द्वारा उन पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबन्ध भी थे तो वैधानिक अफ़गान सरकार द्वारा इस समझौते को लेकर विभिन्न सवाल खड़े किए गए। अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी तथा चीफ एक्जिक्यूटिव अब्दुल्ला अब्दुल्ला द्वारा भी भविष्य के लिए किसी योजना के बिना विदेशी सैनिकों के वापिस जाने पर भयानक खून खराबे की आशंका व्यक्ति की गई तथा एक बार फिर लगा कि शांति समझौते को तारपीडो किया जा रहा है। फिर से वार्ताओं के दौर शुरू हुए तथा इस बार रूस एवम् चीन ने भी स्पष्ट हस्तक्षेप स्वीकार कर लिया जिसकी अंतिम बैठक मॉस्को में हुई, यद्धपि भारत को इन वार्ताओं से दूर रखा गया जो अस्वाभाविक था क्योंकि अफगानिस्तान में शुरू से ही भारत का बड़ा निवेश लगा रहा है। अन्तिम फैसला किया गया कि संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में तुर्की में अप्रैल महीने किसी तिथि पर बड़ी बैठक के बाद अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा जिसमे भारत सहित कई अन्य देश भी हिस्सा लेंगे। अन्तिम समय में अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने बहुत से किन्तु परन्तु जोड़ दिए लेकिन अंत में अमेरिकी प्रतिनिधि जल्मे खालिल्जाद के प्रयास सफल हुए तथा अशरफ गनी ने घोषणा कर दी कि वो आगामी छह माह में चुनाव कराएंगे तथा खुद उन चुनावों का हिस्सा नहीं बनेंगे। पहले किए गए समझौते के अनुसार अफगानिस्तान की विभिन्न जेलों में बंद 7000 अफ़गान तालिबान लड़ाकों को भी रिहा करने का फैसला किया गया था जिनमे से अधिकांश को रिहा भी कर दिया गया लेकिन अब जबकि 16 अप्रैल को तुर्की में बड़ी बैठक की घोषणा हो गई थी तो अफ़गान तालिबान के प्रवक्ता मोहमद नईम ने तालिबान के हिस्सा लेने पर संशय व्यक्त करते हुए कई नई शर्तें जोड़ दी जिनमे बाकी लड़ाकों की रिहाई तथा डिफेंस कॉन्ट्रेक्टर्स की वापसी भी प्रमुख है क्योंकि आरोप लगाया जा रहा है कि यूएस द्वारा ब्लैक वाटर वर्ल्ड वाइड को नियुक्त किया गया है। इस स्थिति में यदि शांति समझौता अपनी अंतिम परिणीती तक नहीं पहुंचता तो क्या दक्षिण एशिया में फिर से अशांति और युद्ध के हालत बन सकते है ? यदि अफगानिस्तान में अशांति बनी रहती हैं तो निसंदेह इसका असर पाकिस्तान पर भी होगा और चीन की चर्चित वन रोड वन बेल्ट योजना भी प्रभावित होगी तो भारत इससे अछूता कैसे रह सकता है ? यद्धपि समय बहुत कम हैं तथा तालिबान द्वारा एक मई के बाद अपनी कार्यवाहियां बढ़ाने की धमकियां दी जा चुकी हैं तो केवल क्रॉस द फिंगर्स के अतिरिक्त कुछ नहीं किया जा सकता विशेषकर जब सबके हित जुड़े हो और सबके हित एक दूसरे के विरूद्ध हो।।