समय से पहले यूपी, पंजाब में चुनावों की सम्भावना। क्या केंद्र सरकार कैप्टन अमरिंदर सिंह के सहयोग से समय से पूर्व ही चुनाव कराने का विचार कर रही है ?

वैसे तो यदि विधान सभा के कार्यकाल को देखा जाए तो मार्च 2022 तक पंजाब की विधानसभा को संवैधानिक अधिकार है लेकिन क्या केंद्र एवम् राज्य सरकारें दोनों समय से पहले ही चुनाव कराने के विकल्प पर विचार कर रही है ? इस प्रश्न को लेकर भी कुछ चाय के प्यालों में तूफान उठ रहा है। यह कोई रहस्य नहीं है कि वर्तमान मुख्यमंत्री अभी भी अपनी महाराजा वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल सके और गाहे बगाहे अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भी अपने राजा होने या केवल अपने केप्टन होने का अहसास भी करा देते है। इसके साथ ही कैप्टन अमरिंदर सिंह की केंद्र सरकार तथा गृह मंत्री से भी कैमिस्ट्री नकारात्मक नहीं है और दोनों एक दुसरे की सलाहों का सम्मान भी करते हैं जिसका एक उदाहरण किसानों को सीधे भुगतान के विषय पर केंद्र द्वारा लिए गए निर्णय का विरोध जताने गए प्रतिनिधि द्वारा उसी फैसले का समर्थन करना है। क्योंकि बीजेपी केवल चुनावी रणनीति के अनुसार ही निर्णय लेती है और देश हित या अहित से अधिक चुनावी लाभ हानि की गणना करती है तो उसके लिए तथा अन्य स्थापित राजनीतिक दलों के लिए भी समय से पहले चुनाव लाभप्रद लग सकते है पंजाब में क्योंकि बीजेपी का कभी कोई विशेष प्रभाव नहीं रहा तथा वर्तमान में जीत हार से भी अधिक बीजेपी प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार करना भी संभव नहीं है तो बीजेपी को इससे कोई अंतर नही पड़ता कि चुनाव कब होने चाहिए। अकाली दल क्योंकि बीजेपी के सहयोगी दल होने की छवि से बाहर निकल आया है और केवल अपने दम पर चुनाव जीतना चाहता है तो उसके लिए भी इस माहौल में शीघ्र चुनाव होने लाभकारी लग सकते है। किन्तु इनके अतिरिक्त जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है किसान आंदोलन के कारण उपजे जनसमर्थन और विरोध की। इस स्थिति में यदि चुनाव होते है तो सभी राजनीतिक दलों को किसान आंदोलन से बने नए समीकरण तथा नए नेतृत्व का सामना करने की चुनौती पेश आ सकती है जिसका सामना करने की क्षमता फिलहाल तो किसी के पास भी नहीं है। कभी कभी ऐसा लगता है कि आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी की तरह कोई सर्व किसान पार्टी सामने आ गई और राजेवाल या किसी भी किसान नेता ने ताल ठोक दी तो दिल्ली की तरह पंजाब में भी 96% सीटों से वर्तमान तीनों या चारो स्थापित दलों को रुखसत होना ही होगा। इसलिए यह कयास लगाया जा रहा है कि यदि किसी कारणवश करोना के बहाने किसान आंदोलन समाप्त न हो सका जो केंद्र सरकार का अंतिम प्रयास होगा कि सरकार किसानों से कोई गोल मोल समझौता कर ले और इसे अपनी उपलब्धि घोषित करते हुए चुनावों का दंगल भी सजा दे। इसके अतिरिक्त यूपी चुनाव बीजेपी के लिए ज्यादा बड़ी सिरदर्दी बनकर सामने आने वाले हैं क्योंकि हिंदी भाषी क्षेत्रों के अधिकांश अशिक्षित या अर्धशिक्षित युवा अभी भी हिन्दू मुस्लिम एजेंडे एवम् जाति धर्म की राजनीति से बाहर नहीं निकले तथा इन कट्टरपंथी विषयों पर योगी आदित्यनाथ की पकड़ मोदी जी से भी अधिक है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त बीजेपी को कोई अधिक नुकसान तो नहीं लग रहा परन्तु सबसे बड़ा टकराव उनके अपने अंदर से सामने आ सकता है और वो खुद योगी आदित्यनाथ है जिनकी महत्वकांक्षा प्रधानमन्त्री बनने की है लेकिन मोदी जी के स्वभाव में भविष्य की सम्भावित चुनौतियों को भी समय रहते समाप्त करने का रहा है और यही वजह बीजेपी चुनावी रणनीति कारो को परेशान किए हुए है। युवाओं के शिक्षित होने तथा सूचनाओं के प्रसार के कारण क्षेत्रीय दलों की किसी बड़ी भूमिका की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस के पास यदि विचार है तो जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता नहीं है। देखना होगा कि दो मई के पांच राज्यों के परिणाम क्या भविष्य तय करते हैं किन्तु यदि बंगाल में बीजेपी जीत दर्ज करने में सफल हो जाती है तो यह देश के लिए किसी अशांति का संदेश हो सकता है !