ज्योतिराव गोविन्दराव फुले उर्फ महात्मा फुले या ज्योतिबा फुले की जन्म जयंती पर विशेष।

आज केवल कल्पना ही की जा सकती है कि लगभग दो सौ साल पहले स्त्रियों की सामाजिक स्थिति किसी जर खरीद गुलाम से अधिक नहीं होती थी और उस पर भी यदि वो उच्च कुल से न हो तो उसके द्वारा शिक्षा की बात करना या स्कूल का ख्वाब देखना उस दकियानूसी समाज के अनुसार महापाप था। 11 अप्रैल 1827 तत्कालीन गुजरात का सतारा कस्बा और जन्म लेने वाले बच्चे का नाम ज्योतिराव गोविन्दराव रखा जाता है। दुर्भाग्य से शीघ्र ही इसके माता पिता की मृत्यु हो जाती है और बच्चे को एक बाई पालती है। जीवन के शुरुआत में जीवनयापन के लिए ये पुणे आता है तथा फूलो की मालाएं बनाकर बेचता है तो लोग इसके नाम के साथ फुले जोड़ देते है। लेकिन ज्योतिराव फुले के जन्म का लक्ष्य केवल अपना जीवन यापन नहीं था और अशिक्षित होना तथा समाज में जातिगत भेदभाव जैसी बुराइयां इन्हे कचोटती रहती थी विशेष रूप से स्त्रियों के लिए शिक्षा का अभाव। एक कहावत है कि Charity begins with home अर्थात सेवा घर से शुरू होती हैं और इसकी शुरुआत भी इन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को पढ़ाने से की। कहते है कि समाज के उच्च वर्ग के लोग इनकी पत्नी के स्कूल जाने का विरोध करते थे और उन पर गोबर फेंकते थे। किन्तु ये उनमें से थे जो लक्ष्य का नहीं अपितु लक्ष्य इनका पीछा कर रहा था। 1948 में इन्होंने पहला स्कूल खोला और लोग इन्हे प्यार से ज्योतिबा बुलाने लगे। 1873 में इन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य समाज को शिक्षित करना था और इसी के साथ ये महात्मा फुले कहलाने लगे। इनके विशेष प्रयासों से ही शिवाजी की समाधि एवम् इतिहास की पुनः खोज की गई। 11 अप्रैल को इनके जन्मदिवस पर News Number की ओर से सादर नमन।