करोना लहर और किसान आंदोलन ! सरकार एवम् किसान "तू डाल डाल मै पात पात" के खेल में है, देखे कौन किसको मात देता है ?

अचानक भारतीय मीडिया उन खबरों और चर्चाओं से लबरेज हो गया जिसमे केवल और केवल करोना की दूसरी लहर का फैलना दिखाया, बताया और इसकी भयंकर होती स्थिति समझाई जा रही है। यदि विश्व में किसी भी देश के मीडिया की खबरों का भारतीय मीडिया की खबरों से तुलना की जाए तो निसंदेह भारत में करोना से "हालात बहुत बिगड़ चुके है" धीरे धीरे ताला बन्दी का शिकंजा कसा जा रहा है और शायद पूर्ण लॉकडाउन की ओर जा भी सकता है। फिलहाल तो जिन क्षेत्रों में चुनाव नहीं है वहां न करोना है न लॉकडॉउन या ताला बन्दी है। पिछले वर्ष दो विवादित कानूनों की चर्चा हुई थी और उनके विरूद्ध जनमत खड़ा हो गया था जिसकी शुरुआत शाहीन बाग़, दिल्ली; की चंद महिलाओ ने की थी लेकिन धीरे धीरे वो आंदोलन पूरे देश में फ़ैल गया था और विभिन्न शहरों में शाहीन बाग़ बन गए थे। उस आंदोलन को कुचलने या समाप्त कराने के लिए मोदी सरकार अथवा प्रशासन द्वारा वो सभी हथकंडे अपनाए गए जिन्हे अभी किसान आंदोलन के समय भी दोहराया गया। जैसे आंदोलन को किसी विशेष धर्म के साथ जोड़ कर प्रोपेगेंडा फैलाना, विदेशी हाथ बताना, हिंसा या भड़काने की कोशिश करना अन्यथा मीडिया से गायब करा देना तथा धीरे धीरे थकने देना। किन्तु किसान आंदोलनकारी नेताओ के सामूहिक निर्णयों के समले सभी कोशिशें नाकाम हो गई। अन्तिम प्रयत्न जिसमे प्रशासन शाहीन बाग़ के सामने सफल हुआ था वो था करोना के नाम पर आंदोलन कुचल देना। प्रश्न यही है कि क्या किसान आंदोलन के साथ भी ऐसा सम्भव है ? यदि सरकार सोचती है कि वो सफल हो जाएगी तो शासन के सलाहकारों को अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए क्योंकि लॉक डाउन की आड़ में सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होने, सभा करने पर तो रोक लगाई जा सकती है, मन्दिर, मस्जिद बन्द कराई जा सकती है, तबलीगी जमात पर शिकंजा कसा जा सकता है किन्तु गुरुद्वारों, लंगर और अन्नदाता पर बन्दिशे लगाने का अर्थ इतिहास में कालिख से जनता को भूखे मारने वाली सरकार का दर्जा मिलना पत्थर पर लकीर होगा। वैसे भी लॉक डाउन में किसी को इसके घर में रहने से तो नहीं रोका जा सकता और फिलहाल किसान आंदोलन स्थल पर अधिकांश ट्रॉलियों को घरों के रूप में बदल दिया गया है। टिकरी बॉर्डर एरिया में तो लगभग स्थाई कुटिया तथा एक कमरे के बांस बल्ली के घर खड़े किए जा चुके हैं। यदि किसानों को घरों से निकालने का कोई अधिकार सरकार बहादुर के पास है तो जमीनों से बेदखल करने का भी हो सकता है। यह तर्क किसान नेता धर्मेंद्र मालिक एवम् सुरेश ढका द्वारा News Number से बातचीत के समय सामने आए। उनके अनुसार निसंदेह इस समय किसान केवल दस से पंद्रह दिन के पौज़ पर है किन्तु इसके बाद पहले से भी कई गुना जोर शोर से हल्ला बोला जाएगा और जैसी की आशा है कि चुनाव प्रिय राजनेता उससे पहले लॉक डाउन लगाकर या बल प्रयोग करके चल रहे चुनावों में अपनी साख बर्बाद नहीं कर सकते अथवा राजनीतिक आत्महत्या नहीं कर सकते।। News Number परिवार की ओर से हम तो सभी किसानों को उनके पर्यावरण अनुकूल प्रकृति के सहयोग से बनाए गए नए बसेरों की शुभकामनाए ही दे सकते है।

किसान आंदोलन स्थल से संगीत समारोह

दिल्ली की विभिन्न सरहदों पर आंदोलन कर रहे किसानों को नैतिक समर्थन देने के लिए पंजाब के विख्यात गायक कंवर ग्रेवाल ने अपनी संगीत और गायन से हिस्सेदारी सुनिश्चित की है। कल सींघू बॉर्डर के बाद आज दिल्ली यूपी स्थित गाजीपुर बॉर्डर पर उनकी टीम द्वारा गीत संगीत समारोह का आयोजन किया गया। निसंदेह पंजाबी गायक होने के कारण हिंदी भाषी किसानों के बीच में पंजाबी गीत गाते हुए उन्हें हिचक हो रही थी लेकिन सबको समझ भी आ रहा था और दर्शको ने बहुत आंनद प्राप्त किया। वाहे वाहे गुरू का जाप शुरू करा कर उसी के साथ राधे राधे श्याम मिला दे और अल्लाह हू का नारा लगवा कर सर्व धर्म समभाव की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की। दिलिये ये कठ परेशान करेगा, फसलां दे फैसले किसान करुगा" उनके द्वारा रचित और संगीतबद्ध इस गीत को बार बार सुनने की इच्छा दर्शको द्वारा जताई गई। इस समारोह में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता श्री राकेश टिकैत स्वयं उपस्थित रहे। कल इनका कार्यक्रम टिकरी बॉर्डर पर आयोजित होगा और उसके बाद हरियाणा राजस्थान सीमा पर स्थित आंदोलन स्थल पर कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। ...