भारत की संप्रभुत्ता को अमेरिकी चुनौती ! क्या भारत सरकार पर चीन के विरूद्ध युद्ध में जाने के लिए यह किसी अनैतिक दबाव का हिस्सा है या अमेरिकी DO MORE नीति की शुरुआत ?

गत दिनों भारत की समुंद्री सीमा में क्वॉर्ड्स देशों द्वारा संयुक्त युद्धाभ्यास किया गया और उसने फ्रांस की नौसेना ने भी हिस्सा लिया यद्धपि फ्रांस इस समूह का हिस्सा नहीं है। युद्धभ्यास के बाद जहां एक ओर अन्य युद्धपोत भारतीय जल क्षेत्र से बाहर निकल गए वहीं अमेरिकी जलपोत भारत के लक्षद्वीप समूह के तटो की ओर बढ़ गया। अंडमान निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्ष्यद्वीप समूह भारत ही नहीं अपितु हिन्द महासागर में अहम सामरिक महत्व रखते है और विश्व व्यापार के इस महत्वपूर्ण रास्ते की निगरानी एवम् सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी काफी अहमियत वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय नियमो के अनुसार तट से 12 नॉटिकल मील तक उसी देश की सीमा मानी जाती हैं जिसका तट हो तथा 200 मील तक उसका आर्थिक क्षेत्र माना जाता है। कुछ इसी प्रकार का विवाद साउथ चाइना सी में भी है जहां चीन द्वारा निर्मित कृत्रिम द्वीप समूह को अमेरिका एवम् उसके सहयोगी देश मान्यता नहीं देते वहीं चीन नाइन डेश लाइन पर कायम है। ( चीन द्वारा बनाई गई काल्पनिक सीमा रेखा ) यद्धपि कहा जा रहा है कि भारत सरकार को 6 अप्रैल को ही अमेरिका द्वारा सीमा के अतिक्रमण की सूचना प्राप्त हो गई थी लेकिन भारत सरकार के विदेश या रक्षा मंत्रालय द्वारा आश्चर्य जनक रूप से चुप्पी साधे रखी गई। इसी बीच अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा खुद इसका खुलासा किया गया और भारत के सोशल मीडिया के माध्यम से यह विवाद न केवल जोर शोर से उठाया गया अपितु इस विषय पर सरकार एवम् प्रधानमंत्री की आलोचना भी हुई जिसके बाद भारत सरकार ने अमेरिका से औपचारिक विरोध जताते हुए एक पत्र जारी किया जिसकी भाषा कूटनीतिक दृष्टिकोण से अत्यन्त सॉफ्ट कही जा सकती है। दूसरी ओर चीन के ग्लोबल टाइम्स ने इसे प्रमुखता से उठाते हुए इसे अमेरिका द्वारा न केवल चीन अपितु भारत सहित अन्य एशियाई देशों को अप्रत्यक्ष धमकी करार दिया है। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिका द्वारा इस दुस्साहस पर कोई अफसोस नहीं जताया गया अपितु स्पष्ट किया गया है कि उसके द्वारा इस प्रकार के अतिक्रमण के लिए भारत सरकार से किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती न भविष्य में होगी।। इस संदर्भ में मोदी सरकार द्वारा अमेरिका से किए गए तीन समझौतों का उल्लेख भी जरूरी है जिसके अनुसार अमेरिका द्वारा कभी भी भारत के किसी भी सैनिक अथवा नागरिक अड्डे का उपयोग किया जा सकता है। कुछ विश्लेषकों द्वारा इस घटना की तुलना पाकिस्तान के मुशर्रफ़ समझौते से की जा रही है जिसके बाद आतंकवाद के नाम पर अमेरिकी ड्रोन विमानों द्वारा पाकिस्तान के नागरिकों पर अक्सर हवाई हमले किए जाते थे। कुल मिलाकर यह न केवल भारतीय संप्रभुता का उल्लंघन है अपितु अंतरराष्ट्रीय नियमो के भी विरूद्ध है और अक्सर ऐसे विवादों के बाद महाशक्तियां खाली पड़े टापुओं को अपने अड्डे बनाने के लिए कब्जाती रही हैं या दबाव बनाने के लिए विवादित क्षेत्र बनाती रही है इसीलिए कूटनीति में सभी अंडे एक टोकरी में डालने की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि कोई किसी का न स्थाई मित्र होता है न स्थाई सहयोगी।