धर्म, जाति, रंग और ऊंच नीच के आधार पर समाज में बढ़ती नफरतों के ज्वार में आज भी बाबा बुल्ले शाह जैसे दार्शनिक प्रासंगिक क्यों है ?

चल बुल्ल्या चल ऑथे चलिए, जीत्थे सारे अन्ने। ना कोई साड़ी जात पुच्छे, न कोई सानू मन्ने।।। ( बुल्ले शाह कहते है कि चलो वहां चलते हैं जहां सब अनजान रहते हो, जिससे न कोई उनकी उच्च जाति के बारे मे पूछे और न ही कोई जातिगत आधार पर सम्मान करे ) बाबा बुल्ले शाह का जन्म 1680 के आसपास माना जाता है और इनके जन्मस्थान को लेकर भी विवाद है क्योंकि कई इतिहासकार इनका जन्म जिला बहावलपुर के "उच्च गिलानियां" का मानते है तो कुछ जिला मुल्तान के निकट मलकवाल के साथ पांडो दी भट्टियां का मानते है किन्तु यह स्पष्ट है कि इनके पिता शाह मोहम्मद दरवेश और बुजुर्गो का सम्बन्ध सुर्ख बुखारा के सैयद परिवार से था जिनका सीजरा रसूल पाक के परिवार से भी जोड़ा जाता हैं। कुल मिलाकर इन्हे उच्च जाति का माना जा सकता है लेकिन इनके सूफी गुरु इनायत शाह अराइं कबीले से थे ( हिंदी भाषी क्षेत्रों में अहीर या यादव ) कहते है कि गुरु की तलाश में बाबा बुल्ले शाह जिनका असली नाम अब्दुल्लाह शाह था लाहौर आए और इनायत शाह के पास पहुंचे तो इनायत शाह प्याज की पौध लगा रहे थे। बुल्ले शाह ने बोला कि वो ईश्वर की तलाश में आए हैं तो इनायत शाह का जवाब था " बुल्लेयां रब दा की पौना! इदरो पुट्टो ते औदर लौना" अर्थात ईश्वर को क्या तलाश करना, मन दुनियादारी से हटा कर उधर लगाना मात्र है। इनके द्वारा इनायत शाह का शागिर्द होने पर परिवार एवम् समाज की ओर से काफी विरोध हुआ और स्वयं बुल्ले शाह एक काफी ( कविता ) में बताते हैं कि बुल्ले को बहने और भाभियां समझाने के लिए आईं। इनकी काफियों ( रचनाओं ) में दक्षिण पंजाब की भाषा का असर स्पष्ट नजर आता है और वैसे भी झंग के वारिस शाह सरकार भी इनके गुरु भाई थे जिन्होंने हीर वारिस शाह नामक महाकाव्य लिखा था। बुल्ले शाह का दर्शन मुख्यत सूफीज्म की उस विचारधारा को दर्शाता हैं जिसमे ईश्वर को स्वामी तथा भक्त या जीव को उसकी प्रेमिका समझा गया है। इसीलिए कुछ सूफी डेरो पर पीर ओ मुर्शीद जनाना लिबास भी पहनते है। यदि बुल्ले शाह की ऊंची जाति से नीची जाति का गुरु बनाने ( तत्कालीन सामाजिक परम्परा के अनुसार जातिगत अंतर लिखा गया है ) की घटना मीरा द्वारा रविदास जी को गुरु बनाने से करे तो अद्भुत समानता नजर आती हैं। इसके अतिरिक्त वर्तमान में भगवान कृष्ण और राधा भक्ति की विवेचना की जाए तो उसमें भी सूफीज्म की झलक स्पष्ट दिखाई देती हैं। यद्धपि यह किसी की आस्था को चुनौती नहीं है किन्तु राधा जी के पर कई विचारकों में मतभेद रहे है शायद इसके पीछे एक तर्क यह भी हो सकता है कि महाभारत में किसी स्थान पर भी राधा रानी का उल्लेख नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त वर्तमान परम्परा की कृष्ण भक्ति जो बृज क्षेत्र या उससे जुड़े हुए राजस्थान में सर्वाधिक मिलती हैं क्या हिंदुस्तान में सूफीज्म के प्रभाव के बाद लोकप्रिय हुई ? कृष्ण भक्ति करने वाले संप्रदायों में एक संप्रदाय के पुरुष भी स्त्रियों वाले वस्त्र धारण करते हैं तो क्या इनका भी कोई सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है ? इसके अतिरिक्त कई मुस्लिम कवियों द्वारा कृष्ण भक्ति और प्रेम के विषय पर रचनाएं मिलती हैं तथा यह भी स्पष्ट है कि मुगल काल में सूफी संतों का प्रभाव हिंदुस्तान में व्यापक रहा है तो क्या राधा कृष्ण भक्ति लहर का सूफीज्म दर्शन से प्रभावित होना सत्य माना जा सकता है ? यह शोध का विषय है किन्तु बाबा बुल्ले शाह जैसे सूफी संतों का धर्म के नाम पर चल रहे व्यापार एवम् पाखंड के विरूद्ध आवाज़ बुलंद करना जरूर एक कड़वी हकीकत है। इस प्रकार इस्लाम और सूफीज्म को साथ साथ लेकर इंसानियत तथा सकल जगत के लिए प्रेम भावना की शिक्षा देते हुए बाबा बुल्ले शाह 1757 या 59 में कसूर शहर में दुनियां ए फ़ानि से पर्दा कर गए। कसूर स्थित इनकी दरगाह पर आज भी होली के दिन रंग खेला जाता है तथा उर्स के मौके पर धमाल होता है। शायद पंजाबी के इस लोकगीत का भी कोई आध्यात्मिक अर्थ निकल सकता है जिसमे गायिका गा रही है " जुत्ती कसूरी, पैरी ना पूरी, हाय रब्बा वे मैनू टूरणा पाया, हाय रब्बा वे मैनू टूरना पया"